ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अंतरिम तौर पर निलंबित करने से इनकार किया, लेकिन चुनाव आयोग से जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि नियमों के विरुद्ध एकतरफा फैसले साबित हुए तो उन्हें रद्द किया जा सकता है।

SIR विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा आयोग का जवाब

HIGHLIGHTS

  • CEC को हटाने से इनकार, चुनाव आयोग को नोटिस
  • एकतरफा फैसले साबित हुए तो रद्द होंगे: सुप्रीम कोर्ट
  • ज्ञानेश कुमार को राहत, लेकिन सुप्रीम कोर्ट सख्त
  • चुनाव आयोग के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की पैनी नजर

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से तत्काल निलंबित करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। हालांकि, चुनाव आयोग के भीतर कथित तौर पर लिए गए एकतरफा फैसलों और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया से जुड़े आरोपों पर अदालत ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पहले चुनाव आयोग का पक्ष और संबंधित रिकॉर्ड सामने आने चाहिए। यदि जवाब से यह साबित होता है कि बहु-सदस्यीय आयोग की प्रक्रिया या नियमों की अनदेखी कर फैसले लिए गए, तो अदालत उन फैसलों को रद्द कर सकती है।

यह मामला चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़े कथित विवादों पर केंद्रित है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना किए गए। आयोग की ओर से जवाब मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट इन आरोपों की जांच आगे बढ़ाएगा।

CEC के निलंबन की मांग पर अंतरिम आदेश नहीं

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सुनवाई पूरी होने तक मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियां निलंबित करने या उनसे वापस लेने की मांग की। अदालत ने इस स्तर पर ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया। यानी ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहेंगे और फिलहाल उनकी शक्तियों पर अंतरिम रोक नहीं लगी है।

हालांकि, अदालत ने याचिका को खारिज कर मामला समाप्त नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर आरोपों पर उसका जवाब मांगा है। इस कदम से अब आयोग को अदालत के सामने अपनी निर्णय-प्रक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड का पक्ष रखना होगा।

पीठ का रुख यह रहा कि किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर गंभीर आरोपों की जांच रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर होनी चाहिए। केवल आरोप या मीडिया में आई रिपोर्ट के आधार पर तत्काल निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

“एकतरफा फैसले साबित हुए तो रद्द करेंगे”

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि चुनाव आयोग का जवाब आने के बाद अदालत यह देखेगी कि विवादित फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए थे। यदि रिकॉर्ड से सामने आता है कि फैसले तीन सदस्यीय आयोग की सर्वसम्मति या बहुमत के बिना एकतरफा तरीके से किए गए, तो अदालत उन्हें रद्द कर सकती है।

अदालत की टिप्पणी का अर्थ यह है कि फिलहाल किसी फैसले को अवैध घोषित नहीं किया गया है। पहले यह तय होना बाकी है कि आरोप सही हैं या नहीं, और संबंधित निर्णय लेते समय आयोग ने लागू नियमों का पालन किया था या नहीं।

मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई में यह भी कहा कि आयोग से निर्णय सर्वसम्मति से लेने की अपेक्षा होती है। यदि सर्वसम्मति न बने तो फैसला बहुमत के आधार पर किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि अभी याचिकाकर्ता मुख्य रूप से एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर अपनी दलीलें रख रहे हैं, इसलिए आयोग का जवाब और दस्तावेज देखना जरूरी है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

याचिकाओं के मुताबिक, एक खोजी समाचार रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट में कथित तौर पर यह भी कहा गया कि कुछ आदेश उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए।

याचिकाकर्ताओं ने इसी रिपोर्ट और उससे जुड़े आरोपों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनका कहना है कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले तय प्रक्रिया के अनुसार पूरे आयोग के स्तर पर लिए जाने चाहिए।

सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने समाचार रिपोर्ट को अंतिम प्रमाण मानने से परहेज किया। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट पूरी तरह सही, आंशिक रूप से सही या गलत भी हो सकती है। इसी कारण अदालत ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है, ताकि दावों की पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड से की जा सके।

मेनका गुरुस्वामी ने उठाए SIR और फॉर्म 6 के मुद्दे

इससे जुड़ी याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने फॉर्म 6 में किए गए बदलावों और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण में कथित खामियों का मुद्दा अदालत के सामने रखा।

गुरुस्वामी ने कहा कि चुनौती केवल किसी एक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय संस्था के रूप में चुनाव आयोग के कामकाज और उसकी निर्णय-प्रक्रिया से जुड़ी है। उन्होंने CEC के आचरण पर उठाए गए सवालों पर भी अपना पक्ष कायम रखा।

सुनवाई के दौरान उन्होंने निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों के माहौल को लेकर चिंता जताई। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत मामले से जुड़े तथ्यों और पृष्ठभूमि से परिचित है तथा वह अपना होमवर्क करती है। अदालत ने फिलहाल आरोपों पर अंतिम राय देने के बजाय आयोग का जवाब सुनने पर जोर दिया।

याचिकाओं में क्या आरोप लगाए गए हैं?

याचिकाकर्ताओं—राकेश कुमार सिंह और अन्य—ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़े कई आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप की अनदेखी करते हुए कुछ नीतिगत फैसले और सॉफ्टवेयर में बदलाव लागू किए।

याचिकाओं में पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए दावा किया गया है कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए 16.10 लाख से अधिक मतदाताओं के खिलाफ अपील दायर की गई, जबकि ऐसा करने से पहले अन्य दो चुनाव आयुक्तों और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को जानकारी नहीं दी गई थी। यह याचिकाकर्ताओं का आरोप है; इसकी स्वतंत्र पुष्टि या अदालत की ओर से इस पर कोई अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं आया है।

गोवा से जुड़े मामले में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 97 पात्र मतदाताओं को पोर्टल पर बहाल करने की सुविधा हटा दी गई थी। याचिका में कहा गया कि इस तरह के बदलाव और निर्देश पूरे आयोग की सहमति या निर्धारित प्रक्रिया के बिना लागू किए गए।

इन आरोपों के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से पूर्ण आयोग की सहमति के बिना जारी किए गए निर्देशों और फैसलों को असंवैधानिक तथा अमान्य घोषित किया जाए।

अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को केवल यह नहीं देखना है कि किसी फैसले से असहमति थी या नहीं। अहम सवाल यह है कि चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की लागू प्रक्रिया क्या है और विवादित फैसले उसी के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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