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मोशी कचरा डंप हादसे का अंत, 9 की मौत, अंतिम शव बरामद

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस हादसे का प्रमुख कारण लगातार तीन दिनों तक हुई भारी बारिश थी, जिसकी मात्रा 650 मिलीमीटर से अधिक थी। भारी बारिश के चलते पानी कचरे के ढेर के भीतर रिस गया, जिससे मलबे के अंदर गैसों का दबाव बढ़ गया।

मलबे से अंतिम शव मिलने पर राहत और शोक की लहर दौड़ी

HIGHLIGHTS

  • 83 घंटे चले रेस्क्यू के बाद खत्म, भारी बारिश बनी बड़ी वजह
  • कचरे के पहाड़ तले दबे 23 कर्मचारी, मौत का खौफनाक मंजर
  • बृहद रेस्क्यू ऑपरेशन में सेना और एनडीआरएफ का अद्भुत प्रयास
  • भारी बारिश से खतरा बढ़ा, मलबे के अंदर गैसों का रिसाव
  • हादसे की वजह बनी कचरे की स्थिरता और प्रबंधन में खामियां

महाराष्ट्र के पुणे के समीप स्थित पिंपरी चिंचवाड़ इलाके में स्थित मोशी कचरा डिपो में पिछले चार दिनों से चल रहा महा-रेस्क्यू अभियान रविवार तड़के समाप्त हो गया है। लगभग 83 घंटे के कठिन और जोखिम भरे खोजी कार्य के अंत में, रविवार रात लगभग 1 बजे अंतिम लापता कर्मचारी का शव मलबे से बाहर निकाला गया। इस दुर्घटना में अब तक कुल नौ लोगों की मौत हो चुकी है, और शवों के बरामदगी के साथ ही राहत और बचाव का कार्य पूरा हो गया है। आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।

हादसे का कारण और घटनाक्रम

यह हृदय विदारक दुर्घटना बुधवार दोपहर लगभग 1.30 बजे हुई, जब मोशी कचरा डिपो के वेस्ट-टू-एनर्जी (WTE) प्लांट के प्रशासनिक कार्यालय की तीन मंजिला इमारत, जिसमें ग्राउंड प्लस टू मंजिलें थीं, अचानक कचरे के विशाल ढेर के फिसलने से ढह गई। उस वक्त अधिकांश कर्मचारी कैंटीन में दोपहर का भोजन कर रहे थे। जैसे ही कचरे का भारी पहाड़ इमारत पर गिरने लगा, तत्काल पांच कर्मचारी वहां से भागने में सफल रहे। परंतु, मलबे में कुल 23 कर्मचारी दब गए।

दमकल और एनडीआरएफ की टीमों ने कड़ी मेहनत और सावधानी के साथ 14 लोगों को जीवित बाहर निकाला, जबकि 9 कर्मचारी मलबे में ही फंसे रह गए। इस हादसे के दौरान, कई कर्मचारी अपने जीवन की जंग लड़ रहे थे, और रेस्क्यू टीमों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

रेस्क्यू अभियान और चुनौतियां

इस बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन में भारतीय सेना, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), पीएमआरडीए (PMRDA), फायर ब्रिगेड, स्थानीय पुलिस और पीसीएमसी की आपदा प्रबंधन टीमों ने समन्वय से काम किया। मलबे को हटाने के लिए जेसीबी, उत्खनन मशीनें और उन्नत डिमोलिशन उपकरण का प्रयोग किया गया। हालांकि, मलबे का विशाल आकार और अस्थिर ढांचा रेस्क्यू कार्य को अत्यंत खतरनाक और धीमा बना रहा था।

गैस रिसाव की आशंका और मलबे के फिर से धंसने का खतरा भी रेस्क्यू ऑपरेशन की कठिनाइयों को बढ़ा रहा था। खासकर, मीथेन जैसी जहरीली गैसें मलबे से निकल रही थीं, जो किसी भी समय और अधिक खतरे का संकेत थीं। इस कारण, बचाव कार्यों में विशेष सावधानी बरतनी पड़ रही थी।

बारिश और मौसम की भूमिका

प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस हादसे का प्रमुख कारण लगातार तीन दिनों तक हुई भारी बारिश थी, जिसकी मात्रा 650 मिलीमीटर से अधिक थी। भारी बारिश के चलते पानी कचरे के ढेर के भीतर रिस गया, जिससे मलबे के अंदर गैसों का दबाव बढ़ गया। इस दबाव के कारण, बड़े हिस्से का कचरा अचानक से खिसककर प्रशासनिक भवन पर गिर गया।

मौसम की इस स्थिति ने राहत और बचाव कार्यों को और भी जटिल बना दिया। बारिश के कारण कार्य स्थल पर फिसलन और अस्थिरता बढ़ गई थी, जिससे टीमों का काम और भी खतरनाक हो गया था।

प्रबंधन और प्रशासनिक जांच

यह हादसा, जो 81 एकड़ में फैले मोशी कचरा डिपो के कचरे के प्रबंधन, कचरे के ढेर की स्थिरता और इस खतरनाक जगह के इतने करीब प्रशासनिक भवन के निर्माण को लेकर गंभीर सवाल उठाता है। क्या इस तरह की संरचनाएं पूर्व में अनुमति दी गई थीं? क्या कचरे का सही ढंग से प्रबंधन किया जा रहा था? इन सवालों पर अब उच्चस्तरीय जांच का आदेश दिया गया है।

हालांकि, प्रशासन ने इसे एक प्राकृतिक आपदा करार दिया है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए विस्तृत जांच आवश्यक है। इस हादसे ने कचरा प्रबंधन की खामियों और नियामक व्यवस्था की करारा परीक्षा ली है।

Sandhya Samay News

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