मोदी-शाह की गायबी और युवाओं का दर्द

जंतर-मंतर पर नवीनतम आंदोलन के बाद से देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदलता हुआ दिख रहा है। एक तरफ जहां युवाओं का एक बड़ा तबका सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों और भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता अचानक से गायब नजर आ रहे हैं।

युवाओं पर राज्य आतंक और संघ की नींद (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • मोहन भागवत का ‘जेन-जी’ ड्रामा
  • माफी का ऐलान, पुलिस की पिटाई
  • संघ परिवार का ‘केमिकल लोचा’
  • गृहमंत्री के खिलाफ संघ की कायरता

Parent organization becomes the government’s ‘front’: भारतीय राजनीति के इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच का रिश्ता कभी छिपा हुआ नहीं रहा है। संघ को भाजपा की ‘मातृ-संस्था’ कहा जाता है और यह उपमा किसी आकस्मिक वाक्यांश से नहीं, बल्कि दशकों के वैचारिक, सांगठनिक और रणनीतिक संबंधों से निकली है। लेकिन, जब कोई मां अपने बच्चों के दुखों में साथ न दे, बल्कि उनके उत्पीड़कों का साथ दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आज देश के हर कोने में, हर चाय की दुकान पर और हर विश्वविद्यालय के चौराहे पर एक ही सवाल गूंज रहा है—’आखिर यह मां इस वक्त क्या कर रही है?’

जंतर-मंतर पर नवीनतम आंदोलन के बाद से देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदलता हुआ दिख रहा है। एक तरफ जहां युवाओं का एक बड़ा तबका सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों और भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता अचानक से गायब नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो आमतौर पर हर मुद्दे पर ट्वीट करते और राष्ट्र को संबोधित करते नजर आते हैं, और गृहमंत्री अमित शाह, जिनकी कुर्सी से ही पूरे देश का कानून-व्यवस्था का तंत्र चलता है, इस संकट के समय अपने आवासों में सिमटकर निष्क्रिय हो गए हैं। यह निष्क्रियता कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सरकार अपनी नाकामियों और क्रूरता को छिपाने के लिए ‘चुप्पी’ के हथियार का इस्तेमाल कर रही है।

एक नाटक या सच्ची चिंता?

सत्ता के इस अदृश्य होने के बीच, संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने एक अजीबो-गरीब और विरोधाभासपूर्ण कदम उठाया है। उन्होंने मुंबई में लगभग दो हजार युवाओं या ‘जेन-जी’ (Gen-Z) से संवाद करने का निर्णय लिया है। कागज पर यह एक सराहनीय और लोकतांत्रिक कदम लगता है, लेकिन जब इसे जमीनी हकीकत के दर्पण में देखा जाता है, तो यह एक बुरी तरह से प्लान्ड नाटक नजर आता है। सवाल यह है कि वे किस ‘जेन-जी’ से बात करने जा रहे हैं?

युवाओं के मन में जो आक्रोश है, जो खलबली मची है, वह किसी कृत्रिम चर्चा से शांत नहीं होगी। अगर भागवत जी के सामने संघ के स्वयंसेवकों के बच्चे, भाजपा पदाधिकारियों के पोते-पोतियों या संघ परिवार के करीबी लोग बैठे हुए होंगे, जिन्हें ‘जेन-जी’ के नाम पर बुलाया गया है, तो यह सिर्फ एक आत्म-मनोरंजन का कार्यक्रम होगा। ऐसा करना उन लाखों युवाओं का अपमान है, जिन्होंने जंतर-मंतर पर असली लोकतंत्र की परीक्षा दी है।

अगर सरसंघचालक को वास्तव में युवाओं का दर्द समझना है, तो उन्हें अपने आरामदायक मंचों को छोड़कर उन युवाओं के पास जाना चाहिए, जो सीधे आंदोलन के मैदान में उतरे थे और अमित शाह के आदेश पर पुलिस द्वारा किए गए बर्बर लाठीचार्ज में घायल हुए हैं। उन्हें मुंबई के आंदोलन में एक बेहद साहसी कदम उठाने वाली युवा नेता रिया अहीर से बात करनी चाहिए, जिसने पुलिस की गाड़ी रोककर गैर-कानूनी ढंग से हिरासत में लिए गए अपने साथियों को छुड़ाया था। लेकिन क्या संघ के इतने हौसले हैं कि वे असली आंदोलनकारियों को अपने मंच पर बुला सकें? शायद नहीं, क्योंकि ऐसा करने से उनकी अपनी सरकार की पोल खुल जाएगी।

राज्य आतंक और ‘माफी’ का विरोधाभास

देखे तो आंदोलन के बाद जो भयावह वातावरण बनाया गया है, वह किसी लोकतांत्रिक देश में सोचने से भी बदतर है। दहली हुई सरकार ने इन ‘जेन-जी’ से निपटने की पूरी तैयारी पहले से ही कर रखी थी। सरकार की पूरी ताकत, पुलिस, प्रशासन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े तमाम अनुषांगिक संगठनों को बच्चों के खिलाफ सक्रिय कर दिया गया। बजरंग दल जैसे संगठनों के कार्यकर्ताओं ने तो आंदोलनकारी युवाओं को धमकाना और पीटना तब तक शुरू कर दिया था, जब तक कि प्रशासन आधिकारिक रूप से कार्रवाई शुरू करता।

आंदोलन की अग्निपरीक्षा से गुजरी रिया अहीर का हाल ही इसका जीवंत उदाहरण है। पुलिस और भाजपा के भाड़े के टट्टुओं द्वारा उनका लगातार उत्पीड़न किया जा रहा है। उन्हें दो दिन पहले दिल्ली आकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से मिलना पड़ा और अपने साथ हुए पुलिसिया अत्याचार की पूरी आपबीती सुनानी पड़ी। रिया अकेली नहीं हैं; देशभर में अनगिनत लड़के और लड़कियां इसी तरह के शोषण का सामना कर रहे हैं।

इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने इस विरोधाभास को और गहरा कर दिया। उन्होंने घोषणा कर दी कि उन्होंने आंदोलनकारी युवाओं को ‘माफ’ कर दिया है। लोकतंत्र में नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं, तो सत्ता उन्हें ‘माफ’ करती है—यह अपने आप में एक तानाशाही की मानसिकता का परिचायक है। लेकिन सबसे बड़ा विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री की इस ‘माफी’ के एलान के बावजूद, पुलिस और भाजपा के नेता युवाओं को परेशान करना बंद नहीं कर रहे हैं।

यह स्थिति सरकार के भीतर की गहरी अराजकता और नीतिगत असमंजस को दर्शाती है। क्या गृहमंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री मोदी के आदेशों को नहीं मानते? प्रधानमंत्री जहां माफी का नाटक कर रहे हैं, वहीं गृह मंत्रालय ठीक उसके उलट रुख अपनाता हुआ नजर आ रहा है। युवा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं और पुलिस उनके घरों तक पहुंचकर उनके माता-पिता को डरा-धमका कर परेशान कर रही है। ऐसे में मोहन भागवत को अगर वास्तव में युवाओं से संवाद करना है, तो उन्हें इस राज्य आतंक को तुरंत रुकवाना चाहिए।

1975 की तानाशाही और 2024 का अधिनायकवाद

इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका सबसे अधिक निंदनीय और विडंबनापूर्ण है। संघ का इतिहास बताता है कि 1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया था, तो संघ ने इसका जमकर विरोध किया था। तब सरकार के खिलाफ संघर्ष, आंदोलन और हड़ताल पर पाबंदी लगी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उसे एक तरह की तानाशाही करार दिया था और जनता के अधिकारों की बात की थी। उस दौरान संघ के तत्कालीन नेताओं और हजारों स्वयंसेवकों को जेलों में डाला गया।

लेकिन आज की स्थिति क्या है? वे तथाकथित स्वतंत्रता सेनानी और आपातकाल के योद्धा आज सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हैं या उनके समर्थन से सत्ता में बैठी सरकारें हैं। आज मोदी और शाह की मनमानी का विरोध करने वाले युवाओं पर वही दमनचक्र चलाया जा रहा है, जो 1975 में देखा गया था। बल्कि, आज की स्थिति 1975 से भी ज्यादा खतरनाक है। तब संवैधानिक अधिकारों को अधिकारी तरीके से निलंबित किया गया था, लेकिन आज बिना आपातकाल लागू किए एक ‘अनौपचारिक आपातकाल’ चलाया जा रहा है।

भारतीय लोकतंत्र को मोदी और शाह ने धीरे-धीरे अधिनायकवाद में बदल दिया है। तमाम संवैधानिक संस्थाओं—चाहे न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो, या जांच एजेंसियां हो—को कंगालों की तरह ध्वस्त कर दिया गया है। राष्ट्रीय संपत्तियों को निजी हाथों में बेचा जा रहा है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था खतरे में है और मानवीय मूल्यों का घोर हनन जारी है। इस सबके खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आवाज उठाकर देशभक्ति का शंखनाद करना चाहिए था। लेकिन मोदी-शाह के इस ‘पापी मंगल मिलन’ में संघ खुद शामिल हो गया। जब भारत के युवा सड़कों पर उतरकर इस तानाशाही का धिक्कार कर रहे थे, तब संघ मौन व्रत धारण किए बैठा रहा। क्या मोहन भागवत को यह उचित लगता है?

‘देशद्रोही’ की छाप और परिवार का ‘केमिकल लोचा’

संघ के इस पक्षपाती रवैये को उनके अपने नेताओं के बयानों से और भी पुख्ता किया गया है। संघ के एक वरिष्ठ नेता अतुल लिमये ने तो आंदोलनकारी युवाओं को ‘देशद्रोही’ तक कह डाला। यह बयान किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत घृणित और चिंताजनक है। अगर जंतर-मंतर का आंदोलन और उसका समर्थन करने वाले देशभर के लाखों ‘जेन-जी’ देशद्रोही ठहराए जा रहे हैं, तो फिर सरसंघचालक उन्हीं युवाओं से संवाद करने के लिए मैदान में क्यों उतरे हैं?

अगर अतुल लिमये के मापदंडों से इन्हें देशद्रोही मान लिया जाए, तो ऐसे देशद्रोहियों से बात करने के जुर्म में कल अतुल लिमये जैसे लोग सरसंघचालक मोहन भागवत को भी ‘देशद्रोही’ करार दे देंगे। यह परिवार के भीतर का गंभीर ‘केमिकल लोचा’ है। एक ही परिवार के दो हिस्से एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत बयान दे रहे हैं।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और अन्य नेता ‘जेन-जी’ को खतरनाक वायरस और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताकर उन्हें अपराधी ठहराते नहीं थकते। सोशल मीडिया पर भाजपा की ‘ट्रोल आर्मी’ इन युवाओं, विशेषकर युवतियों को निशाना बनाकर उनका चरित्र हनन कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, भाजपा की मातृ-संस्था का प्रमुख उसी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से संवाद करने का नाटक कर रहा है। यह विरोधाभास समझने से बाहर है और इसी वजह से जनता के मन में ‘भाजपा की मां इस वक्त क्या कर रही है?’ इस सवाल की गूंज और तेज हो गई है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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