सत्य ऋषी
महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भगवान शिव की आराधना का फल तब और अधिक बढ़ जाता है, जब उसे शास्त्रोक्त समय (मुहूर्त) के अनुसार किया जाए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवरात्रि के दौरान कुछ खास समय पर महादेव और उनके गण विशेष रूप से सक्रिय होते हैं। शास्त्रों में इस बात का विस्तृत वर्णन मिलता है कि गृहस्थों और साधकों के लिए पूजा के समय में अंतर होता है।
प्रदोष काल: गृहस्थों के लिए सर्वोत्तम
गृहस्थ जीवन जीने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रदोष काल में शिव पूजा करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। इसे ‘गोधूलि वेला’ भी कहा जाता है। यह समय सूर्यास्त के साथ शुरू होकर अगले लगभग 1.5 से 2 घंटे तक रहता है। धार्मिक मान्यता है कि इस समय भगवान शिव अपने नंदी और गणों के साथ तीनों लोकों का भ्रमण करते हैं और अपने तीसरे नेत्र से संपूर्ण सृष्टि का अवलोकन करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, प्रलय काल के दौरान महादेव इसी समय तांडव करते हैं। इसलिए, महाशिवरात्रि पर प्रदोष काल में शिव की आराधना करने से वे शांत और प्रसन्न होते हैं, जिससे भक्तों के परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
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निशीथ काल: साधकों के लिए विशेष
जो भक्त किसी विशेष मनोकामना, तंत्र साधना या कठिन आध्यात्मिक अभ्यास में लीन हैं, उनके लिए निशीथ काल सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। यह रात्रि का आठवां मुहूर्त होता है, जिसे मध्य-रात्रि या अर्धरात्रि भी कहा जाता है। घड़ी के अनुसार यह समय आमतौर पर रात 12:00 बजे के आसपास प्रारंभ होता है। रुद्र यामल और तंत्रसार जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, यह समय भैरव, महाकाल और माता काली की साधना के लिए अचूक है। माना जाता है कि इस समय की गई साधना सिद्धियों को प्राप्त करने और जीवन की बाधाओं को नष्ट करने में अत्यंत सहायक होती है।























