दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों थाइलैंड, कंबोडिया, वियतनाम और पूर्वोत्तर भारत में पाई जाने वाली आनुवांशिक बीमारी हीमोग्लोबिन ई (एचबीई) ने अब कानपुर में भी दस्तक दे दी है। यह बीमारी मुख्य रूप से गर्भवती महिलाओं में अधिक देखी जा रही है, जो स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक चिंता का विषय बन गई है।
सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों में इस बीमारी का पता लगाने और रोकथाम के लिए जागरूकता एवं स्क्रीनिंग कार्यक्रमों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस लेख में हम एचबीई के लक्षण, कारण, प्रभाव, और उपचार के साथ ही इसकी रोकथाम के उपायों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
हीमोग्लोबिन ई (एचबीई) क्या है?
हीमोग्लोबिन ई (एचबीई) एक अनुवांशिक रक्त विकार है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन की संरचना में गड़बड़ी के कारण होता है। यह मुख्य रूप से बीटा-ग्लोबिन जीन में म्यूटेशन के कारण उत्पन्न होता है, जिससे शरीर में हीमोग्लोबिन की असामान्य संरचना बन जाती है।
यह बीमारी विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे थाइलैंड, कंबोडिया, वियतनाम और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सामान्य है। हाल ही में, भारत के कानपुर शहर में भी इसके मामले सामने आए हैं, जो इस बीमारी की व्यापकता को दर्शाते हैं।
एचबीई के लक्षण और प्रभाव
अधिकांश मामलों में, हीमोग्लोबिन ई के मरीजों को हल्के या कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में खून की कमी (एनीमिया) के लक्षण स्पष्ट हो सकते हैं, जैसे थकान, कमजोरी, सांस लेने में कठिनाई, और त्वचा का पीला पड़ना।
यदि यह बीमारी बीटा थैलेसीमिया जीन के साथ मिल जाती है, तो स्थिति गंभीर हो जाती है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से टूटने लगती हैं, और शरीर में खून की गंभीर कमी हो जाती है। इस स्थिति में नियमित खून चढ़वाने की आवश्यकता पड़ती है, जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
अध्ययन के निष्कर्ष और आंकड़े
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शोध अनुसार, कानपुर में किए गए अध्ययन में पाया गया कि 83 मरीजों में से लगभग 10.8 प्रतिशत यानी लगभग 9 मरीज हीमोग्लोबिन ई से पीड़ित पाए गए। इनमें से 70 प्रतिशत मरीज गर्भवती महिलाएं थीं, जो गर्भावस्था के दौरान इस बीमारी का पता चलने पर चिंता का विषय है।
अध्ययन में यह भी पता चला कि 50 मामलों में से 60.2 प्रतिशत मरीज बीटा थैलेसीमिया से भी पीड़ित थे। शोधकर्ता डॉ. पूजा सैनी, डॉ. सुनीता, और डॉ. लुबना खान के अनुसार, एचबीई के मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखना जरूरी नहीं है, जिससे इसकी पहचान और निदान में चुनौती पैदा होती है।
एचबीई का निदान एवं जांच
एचबीई की पहचान के लिए विशेष रक्त परीक्षण आवश्यक हैं। भारत में स्वचालित हेमोग्लोबिन टेस्टिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें हीमोग्लोबिन एचबीए2, एचबीएफ, और अन्य वैरिएंट्स की पहचान की जाती है। हेमोग्लोबिन ई की मौजूदगी का परीक्षण करने के लिए हीमोग्लोबिन ऑप्टिकल सेंसेसिंग (एचपीएलसी) जांच का प्रयोग किया जाता है, जो उच्च सटीकता प्रदान करता है।
यदि रक्त में अनियमितता या हीमोग्लोबिन विकार का संदेह हो, तो इसके पुष्टि के लिए दूसरी जाँचें भी कराई जानी चाहिए। विशेषज्ञता के साथ इन परीक्षणों का व्याख्या करना जरूरी है, ताकि सही निदान हो सके।
गर्भावस्था और शादी से पहले स्क्रीनिंग का महत्व
डॉ. संजय काला, प्राचार्य, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, का मानना है कि शादी से पहले और गर्भावस्था की शुरुआत में ही स्क्रीनिंग आवश्यक है। यदि किसी महिला में हीमोग्लोबिन ई ट्रेट पाया जाता है, तो उसके जीवनसाथी की भी जांच कराई जानी चाहिए ताकि बच्चे में हीमोग्लोबिन विकार का जोखिम समझा जा सके।
भारतीय चिकित्सा दिशा-निर्देश भी गर्भावस्था से पहले हीमोग्लोबिन वैरिएंट की स्क्रीनिंग का समर्थन करते हैं। इससे न केवल जन्म से पहले ही खतरे का पता चलता है, बल्कि इससे रोकथाम की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं।
हीमोग्लोबिन ई का उपचार और रोकथाम
हीमोग्लोबिन ई का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों और जटिलताओं को नियंत्रित किया जा सकता है। नियमित रक्त जांच और उचित पोषण के साथ ही, यदि आवश्यक हो तो ब्लड ट्रांसफ्यूजन या दवाओं का प्रयोग किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण है जागरूकता और स्क्रीनिंग, ताकि इस बीमारी का जल्दी पता चल सके और जटिलताओं से बचा जा सके।
रोकथाम के लिए जरूरी है कि शादी से पहले तथा गर्भावस्था के दौरान हीमोग्लोबिन वैरिएंट की स्क्रीनिंग कराई जाए। यदि दोनों माता-पिता में हीमोग्लोबिन ई या थैलेसीमिया जीन पाया जाए, तो बच्चे के जोखिम को समझकर उचित सलाह और प्रबंधन किया जा सकता है। इससे न केवल जीवन सुरक्षित होता है, बल्कि इस बीमारी की प्रसार दर को भी रोका जा सकता है।


























