डिजिटल युग में जहां एक ओर स्क्रीन ने हमारी जिंदगी पर कब्जा कर लिया है, वहीं दूसरी ओर कागज की अहमियत कम होने का नाम नहीं ले रही। स्कूली किताबें हों या ऑनलाइन ऑर्डर पर आने वाला डिब्बा, रेस्टोरेंट का टिश्यू हो या दफ्तर की फाइलें — कागज हर जगह हमारे साथ है। ऐसे में एक दिलचस्प सवाल उभरता है कि पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा कागज किस देश में बनता है, और इस बाजार में भारत कहां खड़ा है? जानिए पूरा विश्लेषण।
चीन है इस फील्ड का महाशक्ति
2024 के वैश्विक उत्पादन आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर एकदम साफ नजर आती है। कागज और पेपरबोर्ड के उत्पादन में चीन दुनिया में सबसे ऊपर है। अनुमान है कि वैश्विक उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी करीब 33 फीसदी है। आसान भाषा में समझें तो दुनिया भर में जितना कागज तैयार होता है, उसका लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले चीन के कारखानों से निकलता है।
इसके पीछे चीन की विशाल निर्माण क्षमता, सस्ता श्रम, आधुनिक मिलें और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों की जबरदस्त मांग प्रमुख कारण माने जाते हैं। पैकेजिंग से लेकर प्रिंटिंग तक — चीन का पेपर सेक्टर अपने प्रतिस्पर्धियों से काफी आगे है।
अमेरिका को मिला दूसरा स्थान
चीन के बाद दौड़ में अमेरिका दूसरे नंबर पर दिखाई देता है। 2024 में विश्व के कुल कागज और पेपरबोर्ड उत्पादन में अमेरिका का योगदान लगभग 15 फीसदी रहा। हालांकि चीन से इसका अंतर काफी बड़ा है, लेकिन अमेरिका अपनी तकनीकी रूप से समृद्ध मिलों और रिसाइक्लिंग पर जोर देने के चलते वैश्विक बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी बना हुआ है।
भारत की स्थिति: तीसरा या पांचवां?
अब बात आती है भारत की। कुछ FAO-आधारित रिपोर्ट्स और 2024 के आंकड़ों के अनुसार, भारत करीब 5 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दुनिया के टॉप-3 कागज उत्पादक देशों में शामिल है। जनसंख्या के हिसाब से देखें तो यह उपलब्धि निराली ही है।
लेकिन यहां एक बारीकी समझना जरूरी है। विभिन्न दस्तावेजों और रिपोर्ट्स में उत्पादन की श्रेणियों को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया जाता है। भारत सरकार के कुछ औद्योगिक आंकड़े बताते हैं कि पेपर, पेपरबोर्ड और न्यूजप्रिंट को मिलाकर देखा जाए तो भारत की रैंकिंग पांचवें स्थान पर आती है। यानी स्रोत के आधार पर भारत तीसरे या पांचवें नंबर पर गिना जा सकता है — दोनों ही स्थितियों में देश का योगदान लगभग 5 फीसदी ही अनुमानित है।
भारतीय कागज उद्योग की खासियत: रिसाइक्लिंग पर जोर
भारत में कागज बनाने का तरीका अपने आप में अनूठा है। यहां की इंडस्ट्री तीन प्रकार के कच्चे माल पर चलती है — पहला लकड़ी, दूसरा कृषि अवशेष जैसे चावल की पराली और गन्ने की खोई, और तीसरा सबसे बड़ा स्रोत यानी वेस्ट पेपर यानी बेकार हुआ कागज। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की पेपर मिलों में सबसे ज्यादा रिसाइकल किए गए फाइबर का ही इस्तेमाल होता है। यह न सिर्फ पर्यावरण के लिहाज से बेहतर है, बल्कि लागत भी घटाता है।
मांग क्यों बढ़ रही है? ई-कॉमर्स का बड़ा हाथ
आम धारणा है कि ऑनलाइन पढ़ाई और पेपरलेस ऑफिस के दौर में कागज की डिमांड गिर जाएगी, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट चल रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है ई-कॉमर्स का तेज विस्तार। हर दिन करोड़ों पार्सल डिलीवर होते हैं और उनमें इस्तेमाल होने वाले कार्टन, बबल रैप के साथ कागज आधारित पैकेजिंग की खपत आसमान छू रही है।
इसी के साथ रिटेल सेक्टर, खाद्य पैकेजिंग, डेयरी उत्पाद और हाइजीन प्रोडक्ट्स जैसे टिश्यू व डायपर की मांग भी इस उद्योग को लगातार बढ़ावा दे रही है। शिक्षा क्षेत्र में नोटबुक और टेक्स्टबुक की अच्छी-खासी खपत भी बनी हुई है।


























