जंतर-मंतर से सफदरजंग तक का दर्द:’एक जाएगा तो दूसरा आएगा’

सोनम वांगचुक को जबरदस्ती उठाकर ले जाया गया, तो वहां मौजूद कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने जो प्रतिक्रिया दी, वह राजनीतिक रणनीति से परे थी। मंच पर बैठे दीपके के भावुक होकर रो पड़ने का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।

सफदरजंग पहुंचे वांगचुक, तो भावुक होकर रो पड़े दीपके

HIGHLIGHTS

  • 21 दिन बाद सरकार जागी?
  • बच्चों की अनदेखी पर बवंडर
  • पुलिस की 'केयर' या जुल्म?
  • जंतर-मंतर पर नया विरोध
  • सीजेपी चीफ का इमोशनल वीडियो

दिल्ली का जंतर-मंतर भारतीय लोकतंत्र का वह ऐतिहासिक चौराहा रहा है, जहां सत्ता और जनता के बीच का संघर्ष सबसे प्रत्यक्ष रूप में दिखता है। यह वह मंच है जहां से आवाजें उठी हैं, आंदोलन जन्म लिए हैं और सरकारों को कूदना पड़ा है। लेकिन, हाल के दिनों में इस मंच की तस्वीर बदलती जा रही है। न तो यहां अब पुराने दौर का जुझार दिखता है और न ही सरकारें पुराने ढंग से डरती हैं।

लद्दाख के प्रख्यात शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर से जबरदस्ती उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने की घटना, इस बदलते राजनीतिक और प्रशासनिक चरित्र की सबसे करुण और चौंकाने वाली झलक है। इस कार्रवाई के बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, वह किसी एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं रह गया, बल्कि एक ऐसा विस्फोट बन गया जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रमुख अभिजीत दीपके के आंसूओं ने पूरी व्यवस्था की काली करतूतों को उजागर कर दिया।

आधुनिक लोकतंत्र की चाल

सोनम वांगचुक जैसे शांतिपूर्ण आंदोलनकारी को उनके ही अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल पहुंचाने की पुलिस की इस कार्रवाई को किसी ‘राहत’ या ‘स्वास्थ्य संबंधी चिंता’ के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। यह आधुनिक लोकतंत्र की वह चाल है, जिसमें लाठीयां नहीं चलतीं, बल्कि आंदोलनकारी को ‘बीमार’ घोषित करके उसकी आवाज को आइसोलेशन वार्ड में कैद कर दिया जाता है।

जब कोई व्यक्ति 21 दिनों से अनशन पर बैठा हो, तो उसका स्वास्थ्य बिगड़ना एक तार्किक और प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे आंदोलनकारी भलीभांति जानते हैं। लेकिन सरकार के लिए यह एक ढाल बन गया—’हमने उन्हें हटाया नहीं, हमने उनकी जान बचाई’। यह तर्क कितना ही सजावटी क्यों न लगे, उसके पीछे की नीयत साफ है: जंतर-मंतर के मंच को खाली कराना।

जब सोनम वांगचुक को जबरदस्ती उठाकर ले जाया गया, तो वहां मौजूद कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने जो प्रतिक्रिया दी, वह राजनीतिक रणनीति से परे थी। मंच पर बैठे दीपके के भावुक होकर रो पड़ने का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।

कुछ लोगों ने इन आंसुओं को नाटक करार दिया, तो कुछ ने इसे कमजोरी माना। लेकिन एक संवेदनशील पत्रकार और सचेत नागरिक के नजरिए से ये आंसू किसी नाटक के नहीं हैं। ये वह निराशा के आंसू हैं, जो तब सामने आते हैं जब कोई व्यक्ति सभी संवैधानिक और लोकतांत्रिक मार्गों के बंद हो जाने का अहसास कर लेता है।

अभिजीत दीपके के उस भावुक पल को समझने के लिए हमें उनके शब्दों पर गौर करना होगा। उन्होंने कहा, “मैं आज से अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर रहा हूं।” कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी जान की बाजी लगाने से पहले नहीं रोता, लेकिन जब वह देखता है कि सामने वाली व्यवस्था इतनी निर्लज्ज और संवेदनहीन है कि वह एक गंभीर मुद्दे को भी बेहद सनकी तरीके से दबाने पर आमादा हो चुकी है, तो आंखों से पानी आना स्वाभाविक है। दीपके के आंसू उस युवा वर्ग की निराशा का प्रतीक हैं, जिसे लगता है कि इस देश में न्याय का दरवाजा तो दूर, न्याय की आवाज तक सुनने वाला कोई नहीं बचा।

समाज में निराशा

दीपके ने अपने संबोधन में एक बहुत ही गहरी और चुभाने वाली बात कही है “इस हड़ताल में एक जाएगा तो दूसरा आएगा… कोर्ट और दिल्ली केंद्र सरकार कितनों को हटाएगी?” यह वाक्य वर्तमान भारतीय राजनीति के लिए एक चेतावनी की तरह है। पुलिस और प्रशासन यह समझ रहे हैं कि किसी आंदोलन को खत्म करने का सबसे आसान तरीका उसके नेता को हटा देना है। लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि 21वीं सदी का यह आंदोलन कोई पारंपरिक नेतृत्व-केंद्रित आंदोलन नहीं है। यह एक विचारधारा का संघर्ष है।

आज सोनम वांगचुक को हटाया गया, कल अभिजीत दीपके को उठा लिया जाएगा, लेकिन क्या पूरे देश से उठ रही उस असंतोष की लहर को कोई एम्बुलेंस में भरकर अस्पताल ले जा सकता है? सरकार को यह समझना होगा कि अस्पताल में शरीर को ठीक किया जा सकता है, लेकिन समाज में बैठी निराशा का कोई इंजेक्शन नहीं है।

इस मामले ने एक और बहुत गंभीर सवाल को जन्म दिया है, जिस पर दीपके ने बेबाकी से उंगली उठाई। उन्होंने पूछा, “21 दिन में सरकार ने बच्चों पर ध्यान नहीं दिया तो आगे क्या भाजपा सरकार सभी पर ध्यान देगी?” यहां ‘बच्चों’ से आशय केवल उम्र के हिसाब से छोटे लोगों से नहीं है, बल्कि उस आने वाली पीढ़ी से है, जिसका भविष्य—चाहे वह लद्दाख की पारिस्थितिक संतुलन की बात हो, या रोजगार का संकट हो—खतरे में है।

सत्ता में बैठे लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि आंदोलन किसी व्यक्तिगत ईगो की पूर्ति के लिए नहीं होते, बल्कि वे भविष्य की चिंता से पैदा होते हैं। जब सरकार 21 दिन तक किसी शांतिपूर्ण धरने को नजरअंदाज करती है, तो यह उसकी घमंडी चुप्पी होती है, जो अंततः असहिष्णुता का रूप ले लेती है।

अभिजीत दीपके के एक और कथन ने सारे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि यहां कोर्ट से लेकर पुलिस तक सभी लोग मोदी सरकार के सपोर्ट कर रहे हैं। यह बयान किसी आक्रमण से कम नहीं है। एक सचेत नागरिक और पार्टी के नेता के मुंह से यह बात निकलना दर्शाता है कि आम आदमी का भरोसा देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं से टूट रहा है।

लोकतंत्र में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच एक सूक्ष्म संतुलन होता है। जब जनता को लगने लगे कि न्यायालय भी सरकार के इशारों पर नाच रहे हैं और पुलिस सरकार की रक्षक बनकर जनता के विरोधी खड़ी हो गई है, तो ऐसी स्थिति में नागरिक का मार्गदर्शन कौन करेगा?

यह धारणा, चाहे वह पूरी तरह सत्य हो या आंशिक रूप से, लेकिन जनमानस में बैठना खतरनाक है। जब लोग सोचने लगते हैं कि “कोर्ट, केंद्र सरकार सिर्फ दिखावे के लिए है ना कि जनता के लिए”, तो वे व्यवस्था से अलग होने लगते हैं। यह अलगाव किसी बंदूक या बम से नहीं, बल्कि भूख हड़ताल, निराशा और संस्थाओं के प्रति विश्वासहीनता के रूप में सामने आता है।

सरकार को इस बात की गंभीरता से जांच करनी चाहिए कि आखिर ऐसा कौन सा माहौल बना जिसमें एक नागरिक को खुलेआम यह कहना पड़ रहा है कि सारी व्यवस्था एक तरफ है और आम जनता दूसरी तरफ।

भविष्य के अंधेरे के कारण आत्महत्या

दीपके ने एक और बहुत महत्वपूर्ण बिंदु को छुआ, “आम जनता का जो बच्चे सुसाइड किए हैं, उन पर सिर्फ पैसा दिखाया जाता है ना कि ध्यान दिया जाता है।” यह वाक्य आज के भारत की सबसे बड़ी त्रासदी को समझने की कुंजी है। आज देश में नौकरियों के अभाव, शैक्षणिक दबाव और भविष्य के अंधेरे के कारण युवाओं द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं बढ़ी हैं।

सरकारें इन घटनाओं पर संवेदना दिखाने के लिए मुआवजे की राशि (पैसा) का ऐलान कर देती हैं। लेकिन क्या किसी माता-पिता को उनके बच्चे की जान के बदले में कुछ लाख रुपये चाहिए? जनता चाहती है कि उसके बच्चों को सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और एक सम्मानजनक जीवन मिले। जब सरकार इन मूलभूत मांगों को नजरअंदाज करते हुए केवल आर्थिक सहायता के ढांचे में बधकर रह जाती है, तो यह साबित होता है कि शासन तंत्र में ‘मानवीय संवेदना’ की जगह ‘ब्यूरोक्रेटिक अनुशासन’ ने ले ली है।

अब बात करते हैं अभिजीत दीपके की पार्टी—’कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम की। सुनने में यह नाम अजीब, हास्यास्पद या अति-विद्रोही लग सकता है। लेकिन राजनीति विज्ञान के छात्र और समाजशास्त्री इसे बहुत गंभीरता से देखेंगे। जब किसी समाज में मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां जनता की आवाज नहीं सुनतीं, तो उस रिक्ति को भरने के लिए अति-सीमांत (Fringe) या प्रतीकात्मक नामों वाले दल उभरते हैं।

‘कॉकरोच’ शब्द का चयन स्वयं एक गहरे विरोध का प्रतीक है। कॉकरोच वह कीड़ा है जिसे मारने की कोशिश की जाती है, जहर दिया जाता है, लेकिन वह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। शायद दीपके यह कहना चाहते हैं कि आज जनता की आवाज इतनी कमजोर हो गई है कि उसे सत्ता की नजर में केवल एक कीड़े जैसी उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन यह आवाज मरेगी नहीं। यह नाम स्वयं मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर एक व्यंग्य है।

जब एक ऐसी पार्टी का नेता, जिसका नाम भी मुख्यधारा में शामिल नहीं है, जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ जाता है और रोता हुआ देश को संबोधित करता है, तो यह साबित करता है कि देश की राजनीतिक नली कितनी गंभीर रूप से चोक हो गई है। सत्ता पक्ष को यह नहीं सोचना चाहिए कि दीपके या उनकी पार्टी का कोई बड़ा जनाधार नहीं है, इसलिए उन्हें अनदेखा कर दिया जाए। इतिहास गवाह है कि कभी-कभी ऐसे ही किनारे के व्यक्तियों के आंसूओं ने बड़ी क्रांतियों की नींव रखी है।

इस पूरे प्रकरण को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। भारत एक ऐसा देश है जहां आंदोलनों की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन तक, जंतर-मंतर और रामलीला मैदान इन आंदोलनों के गवाह रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकारों का रवैया बदला है। अब सरकारें आंदोलनकारियों से संवाद करने के बजाय उन्हें ‘राष्ट्र विरोधी’, ‘अराजकतावादी’ या ‘विदेशी एजेंट’ करार देने की प्रवृत्ति रखती हैं। जब संवाद बंद हो जाता है, तो प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल होता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाना इसी संवादहीनता का परिणाम है।

सवाल यह भी है कि क्या सोनम वांगचुक की मांगें असंवैधानिक थीं? क्या उन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाया था? लद्दाख को छठी अनुसूची में लाने की मांग, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा की मांग पूरी तरह से लोकतांत्रिक और संवैधानिक है। फिर ऐसी मांगों पर चर्चा करने के बजाय उन्हें जबरदस्ती अस्पताल पहुंचाने का क्या तुक है? यदि सरकार लद्दाख को छठी अनुसूची में नहीं ला सकती, तो उसे अपने तर्क जनता के सामने रखने चाहिए। लेकिन तर्क देने की बजाय, आंदोलनकारी को ‘इलाज’ के नाम पर हटाना, एक मजबूत लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।

गेंद फिर से सरकार के पाले में

अब जब अभिजीत दीपके ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है, तो गेंद फिर से सरकार के पाले में आ गई है। क्या दीपके को भी कुछ दिनों बाद ‘स्वास्थ्य खराब होने’ के बहाने जबरदस्ती अस्पताल पहुंचाया जाएगा? यदि ऐसा हुआ, तो यह सिलसिला चलता रहेगा। “एक जाएगा तो दूसरा आएगा”—दीपके की यह बात सच साबित होगी।

यह एक ऐसा खेल है जिसमें सरकार ने खुद को घेर लिया है। अगर वह किसी को हटाती है, तो विपक्ष और जनता में उसके खिलाफ नाराजगी बढ़ेगी। और अगर वह किसी को नहीं हटाती, तो उसे मानना होगा कि उसकी पिछली कार्रवाई गलत थी।

सोनम वांगचुक के सफदरजंग अस्पताल में होने और अभिजीत दीपके के जंतर-मंतर पर रोते हुए बैठने की तस्वीरें एक साथ आती हैं, तो यह एक डरावनी कहानी कहती हैं। यह कहानी उस भारत की है जहां एक ओर विकास और डिजिटल भारत के ढोल बज रहे हैं और दूसरी ओर उन नागरिकों को अस्पतालों और जेलों में धकेला जा रहा है जो सिर्फ अपने अधिकारों की बात कह रहे हैं। दीपके के शब्दों में एक दर्द भरा सच छिपा है— “यह धरना इस बात का सबूत बनता जा रहा है कि कोर्ट, केंद्र सरकार सिर्फ दिखावे के लिए है ना कि जनता के लिए।”

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now