US-Pak Relations: ईरान-इजरायल तनाव के बीच जब दुनिया भर की निगाहें भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही थीं, तब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने पाकिस्तान की कूटनीतिक हैसियत को ही साधारण बना दिया। सर्वदलीय बैठक में पाकिस्तान की ओर से मध्यस्थता की कोशिशों का जिक्र होने पर जयशंकर ने तंज कसते हुए कहा कि यह सिलसिला 1981 से चल रहा है और अमेरिका ने पाकिस्तान को सालों से ईरान के साथ बातचीत में लगा रखा है।
क्या था 1981 का वह इतिहास?
बता दें कि बात 1979 की है जब ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया। इसके बाद 1980 में अमेरिका और ईरान के राजनयिक संबंध टूट गए। जनवरी 1981 में ‘अल्जीयर्स समझौते’ के तहत दोनों देशों ने तय किया कि एक-दूसरे के देश में तीसरे ‘तटस्थ’ देश के जरिए अपने हितों की देखभाल करेंगे। शुरुआत में अमेरिका में ईरान के हितों की जिम्मेदारी अल्जीरिया को दी गई थी, लेकिन 1992 में अल्जीरिया के गृहयुद्ध के बाद उसने यह जिम्मेदारी छोड़ दी। इसके बाद पाकिस्तान ने इस मौके का फायदा उठाया और वाशिंगटन में ईरान का संरक्षक बन बैठा।

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अमेरिका में पाकिस्तानी छतरी में चलता है ईरान का काम
आज भी वाशिंगटन में ईरान का आधिकारिक कामकाज पाकिस्तानी दूतावास की छतरी तले ही होता है। कानूनी और कूटनीतिक रूप से ईरान का वह कार्यालय पाकिस्तानी दूतावास का ही हिस्सा माना जाता है। पासपोर्ट रिन्यूअल से लेकर अन्य सरकारी कागजात का काम यहां होता है। जयशंकर ने पाकिस्तान की इसी भूमिका को ‘डाकघर’ और ‘दलाली’ करार दिया। यह पाकिस्तान की दोहरी नीति का प्रमाण है, जहां वह एक तरफ सऊदी अरब के सामने हाथ फैलाता है और दूसरी तरफ अमेरिका में ईरान का चैनल चलाता है।
3.2 अरब डॉलर और F-16 का सौदा
बता दें कि जयशंकर का 1981 का जिक्र सिर्फ ईरान के राजनयिक मामलों तक सीमित नहीं था। असल में, 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर हमले के बाद अमेरिका को इस क्षेत्र में एक ‘भाड़े का सैनिक’ चाहिए था। 1981 में रोनाल्ड रीगन के शासनकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बड़ा समझौता हुआ। अमेरिका ने पाकिस्तान को 3.2 बिलियन डॉलर का 5 साल का पैकेज दिया और पहली बार अत्याधुनिक F-16 लड़ाकू विमान दिए। इसके बदले पाकिस्तान ने अपनी जमीन अमेरिका के लिए खोल दी। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस ‘खरीद’ के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान के चल रहे परमाणु कार्यक्रम पर भी पूरी तरह से पर्दा डाल दिया। अमेरिका ने अपने ही परमाणु अप्रसार कानूनों को झुठलाते हुए पाकिस्तान को विशेष छूट दी।























