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47 डिग्री की आग में झुलसता भारत

The Terror of the Heatwave: आंकड़े जितने भयावह हैं, उतने ही शर्मनाक हैं हमारी तैयारियां। अब तक पूरे देश में लू के कारण 150 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से अकेले महाराष्ट्र की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा है। विदर्भ के नागपुर, चंद्रपुर, अमरावती, यवतमाल और मराठवाड़ा के कई जिलों में हालात तो ऐसे हैं कि सड़कों पर, पुलों के नीचे और फुटपाथों पर लावारिस लाशें बिल्कुल अनजान वस्तुओं की तरह पड़ी मिल रही हैं।

तपती धरती, बेबस इंसान: लू बनी राष्ट्रीय आपदा

HIGHLIGHTS

  • लू के थपेड़ों में दम तोड़ती जिंदगी
  • जब सड़कें बन गईं मौत का मैदान
  • जलवायु परिवर्तन की भट्टी में जलता देश
  • नवतपा का कहर और प्रशासन की नाकामी
  • गर्मी की मार सबसे ज्यादा गरीब पर

The Terror of the Heatwave: इस साल की गर्मी ने सिर्फ तापमान के रिकॉर्ड ही नहीं तोड़े, बल्कि इंसानी जीवन की सहनशीलता की भी परीक्षा ली है। महाराष्ट्र सहित पूरे देश में पिछले दो महीनों से जो कहर बरपा है, वह ‘मौसम’ कहलाने के बजाय ‘विपदा’ की श्रेणी में रखा जाना अधिक उचित है। आमतौर पर गर्मी के चार महीनों में केवल 8 से 15 दिनों तक ही लू (उष्णता की लहर) का सामना करना पड़ता था, लेकिन इस बार लगातार ६० दिनों से चल रही इस भीषण लू ने पूरे उत्तर और मध्य भारत को एक विशाल भट्टी में तब्दील कर दिया है। विदर्भ और मराठवाड़ा तो ऐसे झुलस रहे हैं कि मानो धरती से आग निकल रही हो।

आंकड़े जितने भयावह हैं, उतने ही शर्मनाक हैं हमारी तैयारियां। अब तक पूरे देश में लू के कारण 150 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से अकेले महाराष्ट्र की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा है। विदर्भ के नागपुर, चंद्रपुर, अमरावती, यवतमाल और मराठवाड़ा के कई जिलों में हालात तो ऐसे हैं कि सड़कों पर, पुलों के नीचे और फुटपाथों पर लावारिस लाशें बिल्कुल अनजान वस्तुओं की तरह पड़ी मिल रही हैं। नागपुर में पिछले आठ दिनों में 26 अज्ञात लोगों की मौत, अमरावती में 24 घंटे में सात लोगों की मौत और यवतमाल में तीन दिनों में 11 लोगों के दम तोड़ने की खबरें किसी युद्ध की पराजय की कहानियां हैं, जो प्रकृति के आगे हमारी नाकामी का प्रतीक हैं।

चंद्रपुर के ब्रह्मपुरी में 47.6 डिग्री सेल्सियस का तापमान दर्ज किया गया, जो इस सीजन का देश का सर्वोच्च तापमान है। विदर्भ में ‘नवतपा’ (सबसे तपते नौ दिन) के पहले दिन ही पारा 47 डिग्री के पार निकल गया। यह अकेला महाराष्ट्र का संकट नहीं है। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दुनिया के सबसे गर्म 50 शहरों की सूची में शामिल सभी 50 शहर आज भारत के ही हैं, जिनमें से आधे से अधिक उत्तर प्रदेश के हैं। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, तेलंगाना, हरियाणा और मध्य प्रदेश के शहर भी इस सूची में शामिल हैं। यह आंकड़ा भारत को जलवायु परिवर्तन के गर्म होते मोर्चे पर सबसे अधिक नुकसान उठाने वाले देशों में स्थापित करता है।

पर इस सबके बीवच सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि इस प्राकृतिक आपदा का सबसे ज्यादा शिकार वह वर्ग बन रहा है, जिसके पास बचाव के संसाधनों की कमी है। एसी, कूलर और फ्रिज रखने वाले संपन्न परिवार अपने घरों में सुरक्षित हैं, लेकिन खेतों में कड़ी धूप में अनाज उगाने वाले किसान, सड़कों पर मजदूरी करने वाले राहगीर, बेघर और लावारिस लोग इस भयंकर तपन का सीधा शिकार बन रहे हैं। जो लोग रातों को पुलों के नीचे या फुटपाथ पर सोते हैं, उनके लिए रात की ठंडी हवाएं भी अब गर्म चल रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर राज्य और स्थानीय प्रशासन ने इन जरूरतमंदों के लिए क्या इंतजाम किए थे?

मौसम विभाग ने लू की चेतावनी देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह भी सच है कि 28 मई या उसके बाद तक यह दौर जारी रहने का अनुमान है और मानसून के आने तक यह तपन बनी रहेगी। लेकिन चेतावनी देने भर से कोई नहीं बचता। प्रश्न यह है कि चेतावनी के बाद ‘हीट एक्शन प्लान’ (गर्मी राहत योजना) को धरातल पर उतारा गया या नहीं?

मजदूरों और निर्माण श्रमिकों पर सख्ती

सरकारों और नगरपालिकाओं को इस समय तीन स्तर पर तत्काल काम करना चाहिए। पहला—दोपहर के समय (12 बजे से 5 बजे के बीच) खुले में काम करने वाले मजदूरों और निर्माण श्रमिकों पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। दूसरा—शहरों और गांवों में मुफ्त ठंडे पानी (प्याऊ) के स्टॉल लगाए जाएं, जिनमें ओआरएस (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन) की व्यवस्था भी हो। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण—बेघर और लावारिस लोगों के लिए रात में ठंडे पंखों, पानी और आश्रय के साथ अस्थायी शरणालय (शेल्टर होम) खोले जाएं। अगर किसी भी जिले में ऐसा नहीं हो रहा है, तो उसका दोष मौसम विभाग का नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन और सरकार का है।

यह लू का प्रकोप कोई एकमुश्त घटना नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन की दलदल में धीरे-धीरे धंसता भारत है। हमारे शहरों की बेरोकटोक बढ़ती कंक्रीटीकरण, झीलों और तालाबों की अवैध भराई, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और ग्लोबल वार्मिंग ने मिलकर यह विनाशकारी स्थिति पैदा की है। ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (शहरी ताप द्वीप) प्रभाव के कारण शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों से 2 से 4 डिग्री अधिक रह रहा है। पुणे जैसे इलाके, जिन्हें पहले अपेक्षाकृत ठंडा माना जाता था, उसमें भी रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज होना इस बात का संकेत है कि अब कोई इलाका सुरक्षित नहीं है।

मानसून की बादल गरज

जब तक मानसून की बादल गरज नहीं लेते और धरती पर ठंडी फुहारें नहीं छिड़कतीं, तब तक इस तपन से बचने का कोई जादुई उपाय नहीं है। लेकिन मानसून के आने का मतलब यह भी नहीं है कि हम राहत की सांस लेकर सो जाएं। मानसून के बाद भी हमें इस ‘न्यू नॉर्मल’ (नए सामान्य) से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। हमें अपने शहरों को हरे-भरे रखने, जल संसाधनों को संरक्षित करने और जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचे के विकास पर तत्काल ध्यान केंद्रित करना होगा।

प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। ब्रह्मपुरी के 47.6 डिग्री सेल्सियस और सड़कों पर पड़ी लावारिस लाशें एक मौन चीख हैं। अगर आज हमने इसे सिर्फ एक मौसमी घटना मानकर अनदेखा कर दिया, तो कल यह स्थिति और भी विकराल होगी। सरकारों को चाहिए कि वे अब रिपोर्ट बनाने और आंकड़े जुटाने का काम छोड़कर धरातल पर उतरें। इंसानी जान की कीमत आंकड़ों से कहीं ज्यादा होती है और गर्मी से बचाव केवल एसी और कूलर खरीदने की ताकत रखने वालों का अधिकार नहीं हो सकता। यह सुनिश्चित करना राज्य की सबसे बुनियादी जिम्मेदारी है कि कोई भी नागरिक अपनी जान की जंग सड़क किनारे हार कर न मरे।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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