New Gender Guidebook: देश में न्याय व्यवस्था और पुलिस की भाषा में बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जेंडर स्टीरियोटाइप और लैंगिक भेदभाव से निपटने के लिए नई गाइडबुक का प्रैक्टिकल ड्राफ्ट मंजूरी दी है। यह गाइडबुक देशभर की अदालतों, पुलिस और कानूनी संस्थानों में भाषा और व्यवहार में व्यापक बदलाव लाने का उद्देश्य रखती है, ताकि पीड़ितों के प्रति सम्मानजनक और संवेदनशील माहौल का निर्माण किया जा सके। आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।
न्यायिक और पुलिसी भाषा में मुख्य बदलाव
1. पीड़ितों के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग
गाइडबुक का सबसे बड़ा फोकस जेंडर स्टीरियोटाइप और लैंगिक पूर्वाग्रह को खत्म करने पर है। इसके तहत उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाएगा, जो पीड़ितों को जज करते हैं या उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते हैं। उदाहरण के तौर पर, “चरित्रहीन”, “शीलभंग” जैसे शब्दों का प्रयोग वकीलों, कोर्ट और पुलिस द्वारा नहीं किया जाएगा। इसके बजाय, कानून के तहत केवल अपराध और पीड़ित के कानूनी अधिकारों का उल्लेख किया जाएगा।
2. गैर-आलोचनात्मक और न्यूट्रल शब्दावली
वेश्या, कॉल गर्ल, हुकर जैसे शब्दों की जगह अब “सेक्स वर्कर” शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। यह शब्दावली अधिक सम्मानजनक और गैर-आलोचनात्मक है। इसी तरह, प्रॉसिक्यूट्रिक्स जैसे कानूनी शब्द की जगह “पीड़ित” या “सर्वाइवर” शब्द का प्रयोग किया जाएगा। इससे कानूनी दस्तावेज अधिक समझने में आसान और सम्मानजनक बनेंगे।
3. महिलाओं के लिए संवेदनशील भाषा
गाइडबुक में कहा गया है कि एक्स्ट्रा-मैरिटल रिलेशनशिप में शामिल महिलाओं के लिए “ख़ारिज”, “मिस्ट्रेस” जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इन शब्दों को अपमानजनक माना गया है। इसके बजाय, महिलाओं के लिए “हाउसवाइफ” की जगह “होम मेकर” का प्रयोग किया जाएगा, जो अधिक सम्मानजनक और समावेशी है।
न्याय प्रक्रिया में बदलाव
1. पीड़ित केंद्रित न्याय प्रणाली
गाइडबुक में इस बात पर बल दिया गया है कि अपराधों के निपटारे में आरोपी से ज्यादा पीड़ित का सम्मान और उसकी गरिमा का ध्यान रखा जाए। जज, सरकारी वकील, और जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि पीड़ित के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार किया जाए। इससे न्याय प्रक्रिया अधिक संवेदनशील, भरोसेमंद और पीड़ित केंद्रित बन सके।

2. टू फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध
रेप और यौन उत्पीड़न मामलों में पहले इस्तेमाल किए जाने वाले टू फिंगर टेस्ट को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह प्रक्रिया अब अवैज्ञानिक, अपमानजनक और कानूनी रूप से अप्रासंगिक मानी जाती है। गाइडबुक का यह निर्देश अदालतों को याद दिलाता है कि यौन उत्पीड़न का पता लगाने के लिए इस टेस्ट का कोई वैध सबूत नहीं है और इसे पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए।
3. गवाहों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार
अदालती कार्यवाही के दौरान गवाहों के प्रति सम्मान और गरिमा का पालन जरूरी है। गाइडबुक के मुताबिक, गवाहों को धमकाने या डराने वाले सवाल नहीं पूछने चाहिए। बल्कि, उन्हें सम्मानित महसूस कराना चाहिए, ताकि वे बिना डर के अपने बयान दर्ज करा सकें। यह कदम न्याय व्यवस्था को अधिक निष्पक्ष और भरोसेमंद बनाने में मदद करेगा।
नई जेंडर गाइडबुक का उद्देश्य न्यायिक और पुलिसी भाषा को अधिक संवेदनशील, सम्मानजनक और पीड़ित केंद्रित बनाना है। इससे न केवल लैंगिक भेदभाव और स्टीरियोटाइप को खत्म करने में मदद मिलेगी, बल्कि पीड़ितों को न्याय पाने में भी आसानी होगी। इन बदलावों के जरिए देश की न्याय व्यवस्था में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा, जहां हर व्यक्ति को उसकी गरिमा के साथ सम्मानित किया जाएगा। यह कदम समाज में लैंगिक समानता और सम्मान का संदेश फैलाने के साथ ही, कानूनी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

























