एनिमल लव या इंसानी जान: नीति में उलझा समाधान

इसके अलावा रेबीज से होने वाली मौतों के मामले में भारत दुनिया में सबसे ऊपर है — विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के अनुसार दुनिया की लगभग एक-तिहाई रेबीज मौतें अकेले भारत में होती हैं। और रेबीज की सबसे बड़ी शिकार बनने वाली जनसंख्या है — बच्चे।

पशु कल्याण अच्छा, पर इंसानी जान से ऊपर नहीं

HIGHLIGHTS

  • आवारा आतंक: गलियों में खौफ, तंत्र पर सवाल
  • नसबंदी कागजों में, आतंक सड़कों पर
  • लाखों काटे गए, नीति अब भी सुस्त
  • बच्चों की चीखें, व्यवस्था की चुप्पी

देश की गलियों, बाजारों और मोहल्लों में एक ऐसी समस्या ने धीरे-धीरे अपने पांव पसार दिए हैं, जो अब किसी आम शिकायत से कहीं बढ़कर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था का मुद्दा बन चुकी है।

हम बात कर रहे हैं आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी और उनके काटने की लगातार बढ़ती घटनाओं की। एक ओर जहां सरकारें और प्रशासनिक तंत्र ‘करुणा’ की दुहाई देकर इस समस्या को टालता नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता रोज एक नई दहशत के साए में जी रहे हैं।

सवाल यह नहीं कि आवारा कुत्तों के साथ मानवीय व्यवहार हो या नहीं — होना चाहिए — सवाल यह है कि क्या मानवीयता का मतलब इंसानी जान की कीमत पर कुत्तों को संरक्षण देना है?

आंकड़े जो चीख-चीखकर कह रहे हैं कि समस्या गंभीर है

सरकारी आंकड़ों को देखें तो तस्वीर बेहद चौंकाने वाली है। देशभर में हर साल 20 लाख से अधिक लोग आवारा कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं और कई वर्षों में तो यह संख्या 30 लाख के पार भी जा चुकी है। इसका मतलब है कि लगभग हर मिनट किसी न किसी को कुत्ता काट रहा है।

इसके अलावा रेबीज से होने वाली मौतों के मामले में भारत दुनिया में सबसे ऊपर है — विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के अनुसार दुनिया की लगभग एक-तिहाई रेबीज मौतें अकेले भारत में होती हैं। और रेबीज की सबसे बड़ी शिकार बनने वाली जनसंख्या है — बच्चे।

समाचार पत्रों के पन्ने पलटिए, हर रोज कहीं न कहीं ऐसी खबर मिलेगी जहां झुंड में आकर कुत्तों ने किसी मासूम बच्चे को काट डाला हो, किसी बुजुर्ग को घायल कर दिया हो, किसी स्कूल जाते बच्चे का रास्ता रोक लिया हो।

कई मामलों में तो बच्चों की मौत तक हो गई। इन घटनाओं के बाद हंगामा होता है, तख्तियां उठाई जाती हैं, अधिकारी आश्वासन देते हैं, और फिर सब कुछ वैसे का वैसा — यानी ‘ढाक के तीन पात’।

समस्या केवल शहरों की नहीं, पूरे देश की

आम धारणा यह बनती है कि आवारा कुत्तों की समस्या महानगरों तक सीमित है, लेकिन यह धारणा गलत है। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों और गांवों तक इनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है। गांवों में तो स्थिति और भी अधिक नाजुक है, क्योंकि वहां न एंटी-रेबीज टीके आसानी से उपलब्ध होते हैं, न ही शवेत रोग (रेबीज) के बारे में जागरूकता है। कई गांवों में कुत्ते काटने के बाद लोग झाड़-फूंक पर ज्यादा भरोसा करते हैं और टीकाकरण की अनदेखी कर देते हैं, जिसका परिणाम घातक साबित होता है।

इसके अलावा सड़कों पर इधर-उधर भटकते आवारा कुत्ते दुर्घटनाओं का भी एक बड़ा कारण बने हुए हैं। हाईवे पर अचानक सामने आ जाने वाले कुत्तों से बचने के चक्कर में चालक वाहन से बाहर गिर पड़ता है और कई बार जान चली जाती है। दोपहर और रात के समय बाइक सवारों के लिए तो कुत्तों का झुंड किसी अदृश्य खतरे से कम नहीं है।

नसबंदी अभियान: कागजों पर, जमीन पर नहीं

आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने का सरकारी और न्यायिक तरीका साफ है — जन्म नियंत्रण यानी एनीमल बर्थ कंट्रोल (ABC) के तहत नसबंदी और टीकाकरण। वर्ष 2023 में जारी हुए नए ABC नियमों के अनुसार नगर निकायों पर यह जिम्मेदारी है कि वे अपने-अपने क्षेत्र के सभी आवारा कुत्तों की नसबंदी कराएं और उन्हें रेबीज का टीका लगवाएं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देश के ज्यादातर नगर निकाय इस लक्ष्य को पूरा करने से कोसों दूर हैं।

कई नगर निकायों के पास न बजट है, न दक्ष पशु चिकित्सक, न वाहन और न ही इच्छाशक्ति। जहां काम होता भी है, वहां कागजों पर ऐसे आंकड़े दर्ज किए जाते हैं जैसे कि पूरे शहर के कुत्ते नसबंदी के बाद छोड़ दिए गए हों, जबकि सड़कों पर हालत वही पुरानी है।

एक अनुमान के अनुसार देश में आवारा कुत्तों की संख्या डेढ़ करोड़ से भी अधिक है, और अगर इसी रफ्तार से नसबंदी करानी हो तो इसमें दशकों लग जाएंगे। इस बीच हर साल लाखों नए पिल्ले सड़कों पर जुड़ते जा रहे हैं।

यहीं पर सबसे बड़ी विडंबना है — कोर्ट और सरकारें कहती हैं कि कुत्तों को नसबंदी करके उसी इलाके में छोड़ दिया जाए, लेकिन न नसबंदी हो रही है, न ही उनके हमलों पर कोई निगरानी। काटने वाले आक्रामक कुत्तों को पहचानने, उन्हें अलग करने और शेल्टर में रखने जैसी व्यवस्था प्रायः नाममात्र को ही है। शिकायत दर्ज कराने पर भी निकाय के लोग आते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और फिर फाइलें दर्जनों दफ्तरों के बीच घूमती रह जाती हैं।

अदालतें, सरकारें और जिम्मेदारी का बिसात

इस मुद्दे पर न्यायपालिका ने समय-समय पर कई दिशा-निर्देश दिए हैं। कई मौकों पर उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा है कि नगर निकाय आवारा कुत्तों को पकड़कर नसबंदी और टीकाकरण कराएं, तथा आक्रामक कुत्तों को शेल्टर में रखा जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि जिन अधिकारियों ने आदेशों की अनदेखी की, उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई तक हो सकती है।

दिल्ली-एनसीआर समेत कई राज्यों में इस विषय पर लंबी सुनवाई चली, जहां एक ओर मानव सुरक्षा के पक्षधरों ने कुत्तों को आवासीय क्षेत्रों से हटाने की मांग की, वहीं दूसरी ओर पशु-कल्याण संगठनों ने ‘करुणा और सह-अस्तित्व’ की बात की। अंततः आदेश यही निकला कि कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करके उन्हें वहीं छोड़ दिया जाए।

यहां एक गहरा विरोधाभास पैदा होता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को जीवन और सुरक्षा का अधिकार है और यही अधिकार अदालतों ने बार-बार अनेक मुद्दों पर रेखांकित किया है।

तो फिर जब कोई बच्चा गली में खेलते हुए डर के साए में जीने को मजबूर हो, जब बुजुर्ग रात के समय घर लौटने से घबराएं, जब महिलाएं अकेले निकलने से बचें — तो उनका अधिकार कहां खड़ा है? दूसरी ओर अनुच्छेद 51ए(ग) के तहत प्राणियों के प्रति दयालुता हमारा मौलिक कर्तव्य भी है।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि पशुओं को मनुष्य की सुरक्षा से ऊपर प्राथमिकता दी जाए। संतुलन चाहिए — न केवल संवेदना, न केवल कठोरता।

दुख की बात यह है कि नीतिगत स्तर पर जो संतुलन बनाना चाहिए, वह करने की कोशिश करने के बजाय जिम्मेदारियों की गेंद एक दूसरे के पाले में डाली जाती रही है। कोर्ट कहता है कि निकाय काम करें, निकाय कहता है कि बजट और आदेश चाहिए, सरकार कहती है कि नियमों का पालन होना चाहिए — और बीच में आम नागरिक काटता रहता है।

जंगल में छोड़ना समाधान है या नई उलझन?

बहुत से लोग सीधा-सा समाधान सुझाते हैं — आवारा कुत्तों को घने जंगलों में छोड़ दिया जाए। पहली नजर में यह विचार आकर्षक लगता है, क्योंकि शहरों की भीड़-भाड़ वाली जगहों पर रहना आवारा कुत्तों के लिए भी असहज है — वहां वे आवागमन में कुचलते हैं, भूखे रहते हैं, बीमार पड़ते हैं। लेकिन विशेषज्ञ इस विचार को व्यावहारिक नहीं मानते, और उनके तर्क सुनने योग्य हैं।

कुत्ता स्वभाव से भू-क्षेत्रीय (territorial) प्राणी है। उसे अपने इलाके से कहीं दूर छोड़ दें तो वह या तो लौटने की कोशिश करता है, या नई जगह स्थानीय वन्य जीवन के लिए खतरा बन जाता है। जंगल में बिना मानवीय संसाधन के छोड़े गए कुत्तों के सामने भूख और बीमारी का संकट है। साथ ही वे वहां के जंगली जानवरों, जैसे जंगली कुत्तों (डोल), लोमड़ियों आदि से रोग फैला सकते हैं, जिससे पूरा पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है। वर्तमान ABC नियम 2023 में भी आवारा कुत्तों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरित करने पर स्पष्ट रोक है। यानी ऐसा करना कानूनी रूप से भी गैरकानूनी माना जाएगा।

लेकिन यह भी सच है कि ‘सब कुत्ते समान नहीं होते’ — यह तथ्य कोई नकार नहीं सकता। ज्यादातर कुत्ते शांत रहते हैं और किसी से उलझते नहीं, लेकिन कुछ कुत्ते ऐसे होते हैं जो बार-बार इंसानों पर हमला करते हैं।

ऐसे आक्रामक कुत्तों को ‘आवारा’ समझकर वैसे ही सड़कों पर छोड़ देना निश्चित रूप से खतरनाक है। इन आक्रामक कुत्तों को पहचानकर उनके लिए अलग शेल्टर (आश्रय) बनाना ही व्यावहारिक और कानूनी रूप से भी संभावित समाधान है। न्यायालयों ने भी कई बार यही राय दी है कि जो कुत्ते बार-बार काटते हैं, उन्हें सामुदायिक क्षेत्रों में छोड़ने के बजाय शेल्टर में स्थानांतरित किया जाए।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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