ABVP की जीत, राहुल गांधी पर सियासी हमला

परिणाम आते ही राजनीतिक माहौल में जो सबसे पहले और सबसे तेज़ नजर आया, वह था राहुल गांधी पर हमलावर रुख। भाजपा के नेताओं और प्रवक्ताओं ने इस जीत को राहुल गांधी की "नेगेटिव पॉलिटिक्स" और "प्रोपेगेंडा" के खिलाफ छात्रों के फैसले के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया।

ABVP की जीत, राहुल गांधी पर बवाल

HIGHLIGHTS

  • छात्र चुनाव, राष्ट्रीय राजनीति का नया पुल
  • राहुल की युवा रणनीति पर DUSU की मार
  • एक चुनाव, तीन सबक: कांग्रेस की आंतरिक परीक्षा
  • DUSU नतीजे: जीत-हार से बड़ा नैरेटिव

चुनावी राजनीति में हर हार और जीत अपने आप में एक संदेश होती है, लेकिन जब यह हार-जीत दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित परिसर से निकलती है, तो उसकी गूंज संसद की दीवारों तक पहुंच जाती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ यानी DUSU के चुनाव नतीजों ने इस बार भी वही परंपरा दोहराई है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने चार में से तीन बड़े पद—अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—अपने नाम किए, जबकि कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI का खाता तक नहीं खुला। सबसे दिलचस्प मोड़ यह रहा कि उपाध्यक्ष का पद भी किसी बड़े दल के हिस्से नहीं गया; NSUI को टिकट से वंचित निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने 30 हजार से अधिक वोट लेकर जीत दर्ज की।

परिणाम आते ही राजनीतिक माहौल में जो सबसे पहले और सबसे तेज़ नजर आया, वह था राहुल गांधी पर हमलावर रुख। भाजपा के नेताओं और प्रवक्ताओं ने इस जीत को राहुल गांधी की “नेगेटिव पॉलिटिक्स” और “प्रोपेगेंडा” के खिलाफ छात्रों के फैसले के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया। सवाल यह है कि आखिर एक छात्र संघ का चुनाव राहुल गांधी से कैसे जुड़ गया? और क्या यह निशाना सिर्फ राजनीतिक तंज है, या इसके पीछे गहरी रणनीति है? आइए समझते हैं।

DUSU क्यों है इतना अहम?

राष्ट्रीय राजनीति के बड़े दर्पणों में DUSU का अपना विशेष स्थान है। दिल्ली विश्वविद्यालय देश के सबसे बड़े और सबसे विविधतापूर्ण विश्वविद्यालयों में से एक है, जहां पूरे देश के कोने-कोने से आए लाखों छात्र पढ़ाई करते हैं। यहां का मतदाता किसी एक क्षेत्र, एक भाषा या एक वर्ग तक सीमित नहीं है। यही कारण है कि DUSU परिणामों को अक्सर युवा मतदाताओं के मूड का “थर्मामीटर” माना जाता है।

इतिहास गवाह है कि इस परिसर से निकले कई चेहरे आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचे। अरुण जेटली, विजय गोयल, अजय माकन, नरेंद्र सिंह तोमर जैसे नामों की छात्र राजनीति की जड़ें इसी परिसर में जुड़ी हैं। इसलिए जब DUSU का नतीजा आता है, तो वह केवल चार पदों की जीत-हार नहीं होता, बल्कि आने वाले समय की राजनीतिक तस्वीर का एक झलक भी होता है।

जाने राहुल गांधी निशाने पर क्यों?

राहुल गांधी पिछले कुछ समय से युवाओं और छात्रों से सीधा संवाद की कोशिशों में लगे हैं। “छात्रों की गूंज” जैसे कार्यक्रम, जंतर-मंतर पर आंदोलनों में हिस्सेदारी और शैक्षणिक मुद्दों—खासकर छात्रावास की कमी और शिक्षा का निजीकरण—पर आवाज उठाना, इन सबका उद्देश्य साफ है: युवा वोटर को कांग्रेस से जोड़ना। जम्मू-कश्मीर से बिहार तक “वोटर अधिकार यात्रा” के जरिए प्रथम-टाइम वोटर्स से जुड़ने की पहल भी इसी रणनीति का हिस्सा रही।

भाजपा के लिए यही कोशिश सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे पसंदीदा निशाना भी। भाजपा के प्रवक्ता सिद्धार्थ यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कहा, वह इसी रणनीति का खुला बयान था—कि डीयू के “मिजाज” ने राहुल गांधी की नकारात्मक राजनीति को खारिज कर दिया, और यह नतीजा उनकी राजनीति के लिए “लिटमस टेस्ट” था, जिसमें वे फेल हो गए।

सन्देशवाहक चुनाव की रणनीति

राजनीति में हर जीत को एक नैरेटिव (narrative) देने की कोशिश होती है। DUSU नतीजे भाजपा के लिए तीन काम कर रहे हैं। “Gen Z भाजपा के साथ है” का संदेश देना—यानी राहुल गांधी जिन युवाओं को अपना मतदाता बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वही युवा उनसे दूर जा रहे हैं।

राहुल गांधी की सबसे चर्चित पहलों—संसद में चुनावी सुधारों पर मांग, वोटर सूचियों पर सवाल, जाति जनगणना की मुहिम—को “प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज करने का एक चुनावी प्रमाण पेश करना।तीसरा, यह साबित करना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में छात्रों से संवाद और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सक्रियता सफल रही, यानी सत्ता पक्ष का जमीनी जुड़ाव विपक्ष से मजबूत है।

यानी राहुल गांधी का निशाना बनना यहां “आकस्मिक” नहीं, बल्कि सोचा-समझा राजनीतिक हिसाब है। जिस नेता को विपक्ष अपना सबसे बड़ा युवा-चेहरा मानता है, उसी को चुनावी हार से जोड़कर उसकी क्रेडिबिलिटी पर प्रश्नचिह्न लगाना—यह आज की राजनीति की पुरानी और परखी हुई तकनीक है।

संगठन की कमजोरी

NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने खुद स्वीकार किया कि “संगठन से जुड़ी कुछ कमियां थीं।” यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है। यह सच है कि NSUI में वह संगठनात्मक अनुशासन, जमीनी नेटवर्क और बूथ स्तर की तैयारी लंबे समय से दिखाई नहीं देती, जो ABVP में दशकों से बनी हुई है।

ABVP की ताकत केवल विचारधारा नहीं, उसका RSS-शैली का टिकाऊ संगठन ढांचा है, जो चुनाव के महीनों बाद से हॉस्टल, कॉलेज और डिपार्टमेंट स्तर पर काम करता है। NSUI अक्सर चुनाव के कुछ हफ्ते पहले सक्रिय नजर आता है।

टिकट बंटवारे की कीमत

उपाध्यक्ष पद पर NSUI कार्यकर्ता दीपांशु शौकीन को टिकट न मिलना और वह निर्दलीय बनकर जीत जाना—यह इस हार का सबसे बड़ा आत्मघाती पहलू है। सोचिए, जिस उम्मीदवार को पार्टी ने ठुकराया, वह अकेले 30,615 वोट ले गया।

यह आंकड़ा NSUI के लिए एक कड़वा संदेश है कि उसके अपने कार्यकर्ताओं में कितनी ताकत है और टिकट बंटवारे में कितनी चूक हो रही है। कांटे की टक्कर वाले चुनाव में यही वोट निर्णायक साबित हो सकते थे।

समानांतर छात्र राजनीति का उभार

संयुक्त सचिव पद पर समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव को 15,778 वोट मिले—ABVP के विजेता से महज 800 से कुछ अधिक वोट पीछे। यह आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि यह दिखाता है कि छात्र राजनीति अब केवल दो-ध्रुवीय नहीं रही।

वाम और समाजवादी धारा के छात्र संगठनों का वोट बैंक काफी हद तक NSUI से हटकर अपने उम्मीदवारों के पास गया। पहले यह वोट “विपक्ष” के रूप में किसी भी गैर-ABVP उम्मीदवार के पक्ष में टूटता था; अब वह बंट रहा है। इस बंटावर की सीधी कीमत NSUI को चुकानी पड़ी।

सत्ता पक्ष की तीन-स्तरीय मुहिम

इस चुनाव में सत्ता पक्ष की तैयारी भी एक सबक है। प्रधानमंत्री मोदी का डीयू कॉलेज में छात्रों से संवाद, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का सक्रिय प्रचार और सरकारी स्तर से छात्र-कल्याण योजनाओं का प्रचार—इन तीनों का असर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।

विनोद जाखड़ ने आड़े हाथों खुद कहा कि प्रधानमंत्री “स्टार प्रचारक की तरह” काम कर रहे थे। यह टिप्पणी व्यंग्य हो सकती है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषण की नजर से यह एक स्वीकृति भी है कि सत्ता पक्ष ने छात्र चुनाव को केंद्रीय महत्व दिया, जबकि विपक्ष की लगन उतनी दिखाई नहीं दी।

यहां एक गहरा सवाल भी खड़ा होता है: क्या राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का छात्र चुनाव में इतना सीधा हस्तक्षेप स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है? छात्र राजनीति परंपरागत रूप से मुद्दों और संगठनों की परीक्षा रही है। जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की पूरी ऊर्जा एक छात्र संघ चुनाव में झुक जाए, तो यह विपक्ष के लिए असंतुलन पैदा करता है, चाहे वह कितना भी वैध हो।

कांग्रेस के लिए चुनौती और सबक

कांग्रेस और NSUI के लिए यह हार अंत नहीं, आईना है। इस आईने में तीन चेहरे साफ दिखते हैं, NSUI को सिर्फ चुनावी मौसम में नहीं, पूरे साल परिसरों में जमीन पर उतरना होगा। छात्रावास, फीस, परीक्षा, नियुक्ति—हर मुद्दे पर संगठित हस्तक्षेप जरूरी है। राहुल गांधी के कार्यक्रमों की ऊर्जा को NSUI के जमीनी ढांचे में बदलना कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

दीपांशु शौकीन की जीत यह सिखाती है कि जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को अनदेखा करने की कीमत भारी होती है। वह पार्टी जो अपने ही युवा कार्यकर्ता को निर्दलीय बनकर जीतते देखती है, उसे अपनी आंतरिक लोकतंत्र पर गंभीर पुनर्विचार करना चाहिए।

समाजवादी छात्र सभा और वामपंथी संगठनों के वोट का बंटना विपक्ष की सामूहिक हानि है। INDIA गठबंधन की भावना को छात्र राजनीति में उतारने की कोशिश नहीं हो रही, और इसका फायदा सीधे ABVP को मिल रहा है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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