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एवरेस्ट का डेथ जोन: कब शुरू होती है सांस की असली जंग?

First Ascent of Mount Everest चढ़ाई के दौरान जब पर्वतारोही 5364 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 'एवरेस्ट बेस कैंप' तक पहुंचते हैं, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। यहां तक पहुंचते-पहुंचते ऑक्सीजन की उपलब्धता समुद्र तल की तुलना में लगभग आधी रह जाती है।

एवरेस्ट की ऊंचाई पर इंसानी शरीर क्यों देने लगता है जवाब

HIGHLIGHTS

  • 8000 मीटर के ऊपर मौत का इलाका: क्या है ‘डेथ जोन’?
  • माउंट एवरेस्ट पर हर सांस क्यों बन जाती है चुनौती
  • एडमंड हिलरी और तेनजिंग नॉर्गे की ऐतिहासिक जीत से डेथ जोन तक
  • एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचते ही आधी क्यों रह जाती है ऑक्सीजन?
  • दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर इंसान कैसे लड़ता है जिंदगी की जंग

First Ascent of Mount Everest: हर साल 29 मई को पूरी दुनिया ‘एवरेस्ट दिवस’ मनाती है। बता दे कि यह वह दिन है जब साल 1953 में पहल बार एडमंड हिलरी और तेनजिंग नॉर्गे शेरपा ने सबसे ऊंची चोटी, माउंट एवरेस्ट के शिखर पर कदम रखा था। तब से लेकर अब तक हजारों पर्वतारोहियों ने इस विशाल हिमालय को फतह हासिल किया है, देखा जाए तो एवरेस्ट की चुनौती केवल ऊंचाई नहीं है, बल्कि प्रकृति की वो क्रूरता है जो इसके हर कदम पर सांस रोकने को तैयार रहती है।

बता दें कि आम धारणा यह है कि सांस लेने में तकलीफ तब होती है जब पर्वतारोही चोटी के बिल्कुल करीब पहुंचते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। सच्चाई यह है कि शरीर पर ऊंचाई का प्रभाव काफी पहले, यानी चढ़ाई शुरू होते ही महसूस होने लगता है। आइए जानते हैं कि एवरेस्ट पर सांस कब फूलने लगती है और वह ‘डेथ जोन’ (मृत्यु क्षेत्र) क्या है, जहां जाना इंसान के लिए जीवन और मृत्यु के बीच चलने जैसा होता है।

2500 से 3500 मीटर: परेशानी की शुरुआत

जब कोई पर्वतारोही 2500 से 3500 मीटर की ऊंचाई के बीच पहुंचता है, तो वहां का माहौल धीरे-धीरे शरीर को परेशान करना शुरू कर देता है और इस ऊंचाई पर हवा काफी पतली होने लगती है, जिसका सीधा असर ऑक्सीजन की मात्रा पर पड़ता है। ऑक्सीजन कम होने के कारण शरीर में ‘हाइपोक्सिया’ (ऑक्सीजन की कमी) की स्थिति बनाना शुरु कर देती है।

इस दौरान चल रहे पर्वतारोहियों को सिर में तेज दर्द, चक्कर आना, अत्यधिक थकान और थोड़ी सी भी शारीरिक गतिविधि करने पर सांस फूलने जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यह शरीर का पहला संकेत होता है कि अब हवा का दबाव कम हो रहा है और फेफड़ों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है।

बेस कैंप (5364 मीटर): ऑक्सीजन का स्तर आधा

बता दें कि चढ़ाई के दौरान जब पर्वतारोही 5364 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘एवरेस्ट बेस कैंप’ तक पहुंचते हैं, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। यहां तक पहुंचते-पहुंचते ऑक्सीजन की उपलब्धता समुद्र तल की तुलना में लगभग आधी रह जाती है। इसका मतलब है कि हर सांस में शरीर को उतनी ऑक्सीजन नहीं मिलती जितनी उसे चलने-फिरने और जीवित रहने के लिए चाहिए।

इस बिंदु से आगे हर छोटी-छोटी शारीरिक गतिविधि काफी थकाने वाली हो जाती है। बेस कैंप में पर्वतारोहियों को कई दिन रुकना पड़ता है ताकि उनका शरीर वहां के माहौल के अनुसार खुद को ढाल (Acclimatize) सके। अगर शरीर ढाल नहीं पाता, तो ऊंचाई से जुड़ी खतरनाक बीमारियां जैसे कि ऊंचाई बीमारी (AMS), सिर में सूजन या फेफड़ों में पानी भरने जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जो जानलेवा साबित भी हो सकती हैं।

डेथ जोन: 8000 मीटर के ऊपर का इलाका

एवरेस्ट की चढ़ाई का सबसे खतरनाक और डरावना हिस्सा 8000 मीटर की ऊंचाई के ऊपर शुरू होता है। दुनिया भर में इस ऊंचाई के ऊपर के इलाके को ‘डेथ जोन’ यानी मृत्यु क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यहां की हवा इतनी पतली हो जाती है कि ऑक्सीजन का स्तर सामान्य वायुमंडलीय स्थितियों की तुलना में लगभग एक तिहाई रह जाता है।

डेथ जोन के अंदर बिना अतिरिक्त ऑक्सीजन (Supplementary Oxygen) के इंसान का जीवित रहना लगभग असंभव हो जाता है। इंसानी शरीर इतनी कम ऑक्सीजन में खुद को ढालने की क्षमता खो देता है। यहां शरीर के अंग कोशिकाओं, मांसपेशियों और आंतरिक अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाते, जिससे वे धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगते हैं।

शरीर पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव

डेथ जोन में पहुंचने के बाद शरीर केवल जीवित रहने के लिए संघर्ष करता है। यहां खाना खाना, सोना या फिर खोई हुई ऊर्जा वापस पाना भी लगभग नामुमकिन हो जाता है। पाचन तंत्र इतना कमजोर हो जाता है कि भोजन पच नहीं पाता, जिससे पर्वतारोही भोजन से विमुख हो जाते हैं और शरीर अपनी ही बची हुई ऊर्जा और मांसपेशियों को खाकर चलने को मजबूर हो जाता है।

इतनी ज्यादा ऊंचाई एक जानलेवा स्थिति पैदा करती है। ऑक्सीजन की भारी कमी के चलते दिमाग में सूजन (High Altitude Cerebral Edema – HACE) आने लगती है। साथ ही, फेफड़ों में भी खतरनाक तरल पदार्थ जमा होने लगता है (High Altitude Pulmonary Edema – HAPE)।

इन बीमारियों के कारण पर्वतारोहियों को मतिभ्रम (हॉल्यूसिनेशन) होने लगता है, भ्रम की स्थिति बनी रहती है, जोरदार खांसी आती है और शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। कई बार अचानक बेहोशी भी आ जाती है। अगर किसी कारणवश तुरंत नीचे नहीं उतरा जाए, तो मृत्यु निश्चित है।

कठोर मौसम और ठंडक का कहर

डेथ जोन में केवल ऑक्सीजन की कमी ही खतरा नहीं है, बल्कि यहां तापमान भी जीवन को ललकारता है। यहां तापमान अक्सर -30 डिग्री सेल्सियस से लेकर -40 डिग्री सेल्सियस के बीच गिर जाता है। इतनी भीषण ठंड में ऑक्सीजन की कमी से सोचने-समझने की शक्ति और फैसले लेने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है।

इस भयावह माहौल में निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है, जिससे गलतियां होने की संभावना बढ़ जाती है। शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए रक्त का प्रवाह मुख्य अंगों (दिल और दिमाग) की ओर हो जाता है, जिससे हाथ-पैर जम्दे चले जाते हैं। कुछ ही मिनटों के अंदर ‘फ्रॉस्टबाइट’ (शरीर के हिस्से जमना) हो जाता है, जो अंग हानि का कारण बन सकता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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