ऋषी तिवारी
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक ऐसा तूफान खड़ा हुआ है, जिसकी लहरें दिल्ली तक पहुंचने लगी हैं। प्रयागराज के माघ मेले में शुरू हुआ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच का विवाद अब सिर्फ एक प्रशासनिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़ी ‘सियासी साजिश’ का हिस्सा माना जा रहा है। सियासी गलियारों में जोर-शोर से चर्चा हो रही है कि इस पूरे विवाद का इस्तेमाल सीएम योगी को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर करने के लिए किया जा रहा है।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
पूरा मामला मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज के संगम तट से शुरू हुआ। माघ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्नान के लिए जा रहे थे, लेकिन मेला प्रशासन और पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इस दौरान शंकराचार्य के शिष्यों और पुलिसकर्मियों के बीच जमकर झड़प हुई। आरोप साफ था कि पुलिस ने शिष्यों और बटुक ब्राह्मणों की शिखा पकड़कर खींचा और उनकी पिटाई की। इस घटना ने पूरे माहौल को तोड़ दिया और नाराज शंकराचार्य धरने पर बैठ गए।
योगी का ‘कालनेमि’ और प्रशासन का नोटिस
विवाद बढ़ता गया जब मेला प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर उनके शंकराचार्य होने पर ही सवाल उठाए। वहीं, सीएम योगी आदित्यनाथ ने सोनीपत में एक कार्यक्रम के दौरान ‘कालनेमि’ का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोग धर्म की आड़ में सनातन को कमजोर कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने नाम नहीं लिया, लेकिन विधानसभा में उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं लिख सकता।” इस बयान ने आग में घी का काम किया।
डिप्टी सीएम का ‘खुला’ रुख और अंतर्कलह के संकेत
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला रुख सरकार के दोनों उपमुख्यमंत्रियों का रहा। जहां एक तरफ सीएम योगी सख्त रुख में नजर आ रहे थे, वहीं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अविमुक्तेश्वरानंद को ‘पूज्य’ और ‘शंकराचार्य’ संबोधित करते हुए उन्हें मनाने की कोशिश की। वीडियोज सामने आए जिसमें वे उन्हें सम्मान दे रहे थे। दूसरे उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने भी बटुक ब्राह्मणों को अपने आवास पर बुलाकर सम्मानित किया और प्रशासन की कार्रवाई की खुलकर आलोचना की। यह स्पष्ट संकेत था कि सत्ता पक्ष के भीतर एकरूपता नहीं है।
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अमित शाह का बयान और सियासी पहेली
इस पूरे सियासी ताने-बाने को समझने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 27 जनवरी के बयान को देखना जरूरी है। गुजरात के गांधी नगर में शाह ने कहा था, “सनातन का अपमान करने वाले दोबारा सत्ता में नहीं आते।” अब सवाल उठ रहा है कि जब शंकराचार्य सनातन के प्रतीक हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार का आरोप योगी सरकार पर है, तो क्या अमित शाह का यह निशाना अपने ही मुख्यमंत्री पर था?
सियासी जानकार बताते हैं कि केशव प्रसाद मौर्य को अमित शाह का करीबी माना जाता है। जून 2025 में एक कार्यक्रम में शाह ने योगी के सामने ही केशव को ‘मित्र’ कहकर संबोधित किया था। ऐसे में केशव का शंकराचार्य के पक्ष में खड़ा होना केंद्र की मर्जी के विरुद्ध नहीं माना जा सकता।
क्या योगी का होगा ‘शिवराज’ जैसा हाल?
सियासी विश्लेषक इसे पीएम पद के उत्तराधिकारी की लड़ाी से जोड़कर देख रहे हैं। रणनीतिक रूप से अमित शाह को ‘फिट’ तो माना जाता है, लेकिन लोकप्रियता के मामले में योगी आदित्यनाथ को ‘उपयोगी’ माना जाता है। चर्चा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले योगी को फ्रंटलाइन से हटाना चाहता है। अगले साल यूपी चुनाव होने हैं और यह मौका योगी को शिवराज सिंह चौहान की तरह केंद्रीय मंत्री बनाकर सत्ता की मुख्य सीट से दूर करने का हो सकता है। अगर ऐसा होता है, तो पीएम पद की दौड़ में अमित शाह की राह आसान हो सकती है।

























