Street Politics: देश में चिकित्सा शिक्षा का सपना देखने वाले लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी नीट (NEET) परीक्षा को लेकर इस वर्ष जो घटनाक्रम सामने आया, वह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए अत्यंत शर्मनाक रहा। पेपर लीक की कथित बातें, उत्तर पुस्तिकाओं में अनियमितताएं और परीक्षा केंद्रों पर सवालिया निशान उठने के बाद देशभर में एक अजीब गुस्सा देखने को मिला। स्वाभाविक रूप से, जब किसी विभाग में इतनी बड़ी चूक होती है, तो जनता और विपक्ष की नजरें उस मंत्रालय के प्रभारी मंत्री की ओर टिक जाती हैं। इस मामले में निशाना केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान बने। सड़कों से लेकर संसद की गलियारों तक, विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने एक स्वर से उनके इस्तीफे की मांग उठाई। संसद मार्च, भूख हड़ताल और धरने-प्रदर्शन के रूप में इस आक्रोश को जाहिर किया गया।
हालांकि, इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो रुख अपनाया है, वह राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत और कूटनीतिक दृष्टि से अत्यधिक परिपक्व माना जा रहा है। उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने से साफ इनकार कर दिया। यह कोई जल्दबाजी या घबराहट में लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की बुनियादी राजनीतिक विचारधारा, अतीत के अनुभवों से निकले सबक और भविष्य की रणनीति का एक गणितीय परिणाम है। यह समझना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरियां या रणनीतिक कारण हैं, जिन्होंने पीएम मोदी को विरोध की इस लहर को अनसुना करने के लिए मजबूर किया है।

सड़कों से शासन नहीं
सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है भाजपा की मूल राजनीतिक फिलॉसफी। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार का स्पष्ट मानना है कि अगर किसी भी मंत्री का इस्तीफा सड़क पर उतरे हुए प्रदर्शनकारियों या विपक्ष के दबाव में लिया गया, तो इसे लोकतंत्र में एक बुरा संदेश माना जाएगा। यह इस बात का संकेत होगा कि सरकार “सड़क के राज” के आगे झुक गई है। अगर ऐसा होता है, तो भविष्य में हर छोटे-बड़े मुद्दे पर विपक्ष यह फॉर्मूला आजमाएगा। इस्तीफे की मांग को लेकर देशभर में उग्र प्रदर्शन होंगे और सरकार को ब्लैकमेल किया जाएगा। मोदी सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नीतिगत फैसले विरोध के कारण नहीं, बल्कि तथ्यों और जांच के आधार पर लिए जाएं।
भाजपा की यह नीति किसी आकस्मिक विचार का नतीजा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दशक (2004-2014) से निकला है। यूपीए सरकार के कालखंड में भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले सामने आए। 2G स्पेक्ट्रम, कोयला खनन, रेलगाड़ी घोटाले जैसे मामलों में जब जनता और विपक्ष ने सड़कों पर हल्ला बोला, तो कांग्रेस नेतृत्व ने घबराकर अपने कई कैबिनेट मंत्रियों को इस्तीफा देने को मजबूर किया। उस दौरान भाजपा ने ही यूपीए पर यह हमला बोला था कि यह सरकार निर्णयहीन है और आंदोलनों के सामने घुटने टेकती है। मोदी सरकार उसी ‘कमजोर’ छवि को दोहराने से बचने के लिए किसी भी सूरत में तैयार नहीं है।
धर्मेंद्र प्रधान सिर्फ एक मंत्री नहीं, संघ परिवार के ‘संगठन मैन’
धर्मेंद्र प्रधान की शख्सियत को समझना इस पूरे राजनीतिक गणित का अहम हिस्सा है। वे किसी राजनीतिक दल में बाहर से आए हुए नेता नहीं हैं, बल्कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की अखाड़े में पले-बढ़े कद्दावर नेता हैं। उनका संगठन से इतना गहरा रिश्ता है कि संघ और भाजपा के बीच तालमेल बिगड़ने पर वे ‘पुल’ का काम करते हैं। संगठनात्मक चुनौतियों को सुलझाने की जो अदृश्य कला उन्हें आती है, वह बहुत कम नेताओं में देखने को मिलती है। प्रधानमंत्री मोदी को अच्छी तरह पता है कि विरोध के नाम पर एक संगठन परक और विश्वसनीय नेता को काटना, पार्टी के आंतरिक ढांचे को कमजोर कर सकता है।
राजनीति में हर नेता की कीमत उसके हालिया प्रदर्शन से तय होती है। 2024 के लोकसभा और ओडिशा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जो ऐतिहासिक प्रदर्शन किया, उसका श्रेय सीधे तौर पर धर्मेंद्र प्रधान की कुशलता को जाता है। ओडिशा ऐसा राज्य था, जहां लगभग दो दशकों तक बीजू जनता दल (BJD) का किला अचूक माना जाता था। प्रधान ने वहां बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को जोड़ा, सामाजिक समीकरणों को साधा और ऐसी भूमिका निभाई जो इतिहास में दर्ज हो गई। अगर नीट विवाद के चलते प्रधानमंत्री उनका इस्तीफा लेते, तो ओडिशा के उन हजारों कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर जाता, जिन्होंने चुनावी जंग में खून-पसीना एक कर दिया था। यह संदेश जाता कि चुनाव जिताने वाले नेता को विवाद में फंसने पर तुरंत निकाल बाहर कर दिया जाता है। मोदी इस भूल को करने को तैयार नहीं हैं।
इस्तीफा लेना होगा ‘प्रशासनिक नैतिक हत्या’ का आत्मसमर्पण
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो इस्तीफा लेने का अर्थ होता है कि सरकार खुद को दोषी मान रही है। नीट परीक्षा का आयोजन ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ (NTA) करती है, जो कि एक स्वायत्तशासी निकाय है। शिक्षा मंत्रालय नीतियां बनाता है, लेकिन पेपर बनाने, उसकी सुरक्षा और परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था NTA के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अगर प्रधान इस्तीफा देते, तो विपक्ष तुरंत यह नैरेटिव गढ़ लेता कि “सरकार ने कबूल कर लिया कि पूरी व्यवस्था भ्रष्ट है और मंत्री जिम्मेदार हैं।” इसके बजाय, सरकार ने जो रास्ता अपनाया है—CBI जांच, उच्चस्तरीय समिति का गठन और NTA के शीर्ष प्रशासन में बदलाव—वह एक सटीक प्रशासनिक कदम है। यह दिखाता है कि सरकार दोषियों को सजा दिलाएगी, लेकिन संस्थागत स्तर पर सरेंडर नहीं करेगी।
राजनीति में आंदोलनों की गंभीरता का आकलन करना सबसे कठिन काम होता है। सरकार के आंतरिक सर्वे और खुफिया इनपुट्स से जो तस्वीर सामने आई है, उसके मुताबिक नीट विरोध को लेकर हुए प्रदर्शन जरूर भावनात्मक रूप से तीव्र थे, लेकिन वे भौगोलिक और जनसंख्यात्मक रूप से इतने व्यापक नहीं बन पाए, जिससे सरकार को खतरा महसूस हो। इन प्रदर्शनों में कुछ वामपंथी छात्र संगठनों और विपक्षी दलों की सक्रियता ज्यादा दिखी, जबकि ‘आम जनता’ का गुस्सा सीमित सोशल मीडिया तक रह गया। मोदी सरकार तब तक झुकती नहीं है, जब तक उसे लगता है कि आंदोलन ने उसकी मूल जनाधार (Core Voter Base) को छू लिया है। नीट का मुद्दा गंभीर जरूर है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह सरकार को गिराने वाला नहीं था।

मोदी का ‘ट्रस्ट फैक्टर’ और भाजपा की आंतरिक संस्कृति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मंत्रिमंडल के साथ एक अलग तरह का रिश्ता रखते हैं। जिस तरह उन्होंने 2014 में स्मृति इरानी के साथ रहकर उन्हें कई विवादों (जैसे रोहित वेमुला कांड) के बावजूद संभाला, उसी तरह धर्मेंद्र प्रधान उनके ‘विश्वसनीयों’ की सूची में शामिल हैं। मोदी का मानना है कि मंत्री की भूमिका संकट के समय पलटखाना मारने की नहीं होती, बल्कि मुश्किल घड़ी में साथ खड़े रहने की होती है। भाजपा की आंतरिक संस्कृति ही यह है कि वह “कट-एंड-रन” (Cut and Run) की राजनीति में विश्वास नहीं रखती। पार्टी का मानना है कि अगर किसी नेता पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप है, तो उसे जाना चाहिए (जैसे लक्ष्मीकांत बावचे या चैतन्य शर्मा के मामलों में हुआ), लेकिन प्रशासनिक चूक या नीतिगत विफलता के दोष में मंत्री को बलिदान का बकरा नहीं बनाया जा सकता।
अब जब सरकार ने तय कर लिया है कि धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत हटाया नहीं जाएगा, तो सवाल यह उठता है कि आगे क्या होगा? राजनीतिक गलियारों में एक मजबूत संभावना इस बात की चर्चा है कि सरकार ‘समय के साथ खेलने’की रणनीति पर काम कर रही है। जैसे-जैसे नीट का मुद्दा चुनावी यादों में धुंधला होगा और CBI जांच की रफ्तार पकड़ेगी, सरकार किसी अन्य समय का इंतजार करेगी।
भविष्य में संभावित कैबिनेट विस्तार या फेरबदल के दौरान धर्मेंद्र प्रधान का पोर्टफोलियो बदला जा सकता है। उन्हें शिक्षा मंत्रालय से हटाकर कोई अन्य भारी विभाग (जैसे पेट्रोलियम या भारी उद्योग, जिनका उन्हें अनुभव है) दे दिया जाए। एक और संभावना यह भी है कि 2024 के चुनावों के बाद भाजपा संगठन को नई ऊर्जा देने के लिए उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव या किसी अन्य प्रमुख संगठनात्मक भूमिका में लगाए, ताकि उनका अनुभव पार्टी के विस्तार में इस्तेमाल हो सके। यह कदम इस्तीफे जैसा ‘अपमानजनक’ नहीं होगा, बल्कि एक प्रकार से ‘सम्मानजनक विस्थापन’ साबित होगा।























