मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक ऐसी कहानी सामने आई है जिसने मानवता और इंसानियत के असली चेहरे को उजागर किया है। यह कहानी है बुजुर्ग महिला लता बाई की है जिन्होंने अपने जीवन में अपनी पूरी जमा पूंजी और जेवर बेचकर एक फ्लैट खरीदा था, ताकि अपने बेटों के साथ सुखी जीवन बिता सकें।
लेकिन, जब वह अंतिम यात्रा पर निकलीं, तो उनके अपने ही उनके अंतिम संस्कार में शरीक नहीं हुए। इस दर्दनाक घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। वहीं, एक समाजसेवी संस्था ने अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए उनकी अंतिम इच्छा पूरी की और उन्हें सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई दी। यह कहानी न केवल एक महिला की जिंदगी का संघर्ष है, बल्कि मानवता के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी प्रतीक है।
इंदौर की सिलिकॉन सिटी में बुजुर्ग महिला का संघर्ष
बता दें कि मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की सिलिकॉन सिटी क्षेत्र में रहने वाली लता बाई ने जिंदगी भर की कमाई से एक फ्लैट खरीदा था। उनके इस प्रयास का मकसद था कि वे अपने बच्चों के साथ सुख-दुख बांट सकें। लेकिन, दुर्भाग्यवश, उनके एक बेटे ने कथित तौर पर उस फ्लैट को अपने नाम करवा लिया और बुजुर्ग महिला को घर से बाहर निकाल दिया।
वृद्धावस्था में जब उन्हें अपने ही बच्चों का सहारा सबसे ज्यादा चाहिए था, तब उन्हें बहुत ही कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनके जीवन का यह दर्दनाक अध्याय तब शुरू हुआ जब वे अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर थीं।
वृद्धाश्रम में बिताए आठ महीने
बुजुर्ग महिला लता बाई की स्थिति की जानकारी जब समाजसेवी अजय नागदा के पास पहुंची, तो उन्होंने तत्काल मदद का हाथ बढ़ाया। मेडिकल जांच के बाद उन्हें जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिया गया। वहां आठ महीने तक उनकी देखभाल की गई, जहां उन्हें परिवार का प्यार और देखभाल मिली।
वृद्धाश्रम ने न केवल उनका जीवन आसान बनाया, बल्कि उन्हें अपने अंतिम समय में भी सहारा दिया। यह उदाहरण समाजसेवा और मानवता का परिचायक है, जिसने वृद्ध महिलाओं के प्रति हमारी जिम्मेदारी को उजागर किया है।
अंतिम संस्कार में बेटे नहीं आए, संस्था ने निभाया फर्ज
अंतिम समय में जब लता बाई की तबीयत बिगड़ी और उनका निधन हो गया, तो उनके बेटों को सूचित किया गया। ब्रह्मकुमारी ज्योति दीदी के माध्यम से उनके बेटों को खबर पहुंचाई गई, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, उनके चारों बेटे अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए। उन्होंने यहां तक कि अपनी मां को मुखाग्नि देने से भी इनकार कर दिया। इसकी खबर सुनकर पूरे समाज में हाहाकार मच गया।
इसके बाद, ‘प्रियो फाउंडेशन’ और ‘जानकी वृद्धाश्रम’ ने मिलकर उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी ली। रीजनल पार्क मुक्तिधाम में पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान मौजूद लोगों ने कहा कि इस घटना ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है। जीवन भर अपने बच्चों के लिए जीने वाली महिला को अंतिम यात्रा में उनके ही बेटे कंधा नहीं दे सके।
समाजसेवी संस्थाओं का मानवीय कदम
लता बाई की मौत के बाद भी उनकी आत्मा को शांति मिले, इसके लिए समाजसेवी संस्थाओं ने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होकर उन्होंने यह साबित किया कि मानवता अभी भी जिंदा है। इन संस्थाओं का यह कदम न केवल समाज के लिए एक उदाहरण है, बल्कि यह उन लाखों वृद्ध व्यक्तियों के लिए भी संदेश है, जो परिवार की उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।

























