बिहार की राजधानी पटना समेत पूरे राज्य में शनिवार को जो नजारे देखने को मिले, वे किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्मनाक और चिंताजनक दोनों हैं। एक तरफ नीट (NEET) परीक्षा के पेपर लीक मामले में अपने भविष्य से समझौता करने को तैयार नहीं छात्र सड़कों पर उतरे हैं, तो दूसरी तरफ उनकी आवाज को कुचलने के लिए राज्य प्रशासन ने पूरे ‘पुलिस राज’ (Police State) का रूप धारण कर लिया है। दिल्ली के जंतर-मंतर और पटना में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज के विरोध में छात्र संगठन आइसा (AISA) के आह्वान पर बुलाए गए बिहार बंद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि जब युवाओं का धैर्य टूटता है, तो उसकी ताकत किसी भी सरकार के लिए चुनौती बन जाती है।
लेकिन इस आंदोलन को समझने के लिए हमें सतही घटनाओं से परे जाकर बिहार और देश की शिक्षा व्यवस्था की गहराइयों में झांकना होगा। यह मात्र एक परीक्षा का पेपर लीक होना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी पीढ़ी की चीख है, जिसे लगातार ठगा जा रहा है।

शिक्षा माफिया और सरकारी निष्क्रियता का घातक मिश्रण
बिहार जैसे राज्य में प्रतियोगी परीक्षाओं का क्या महत्व है, इसे समझने के लिए आर्थिक और सामाजिक संरचना को पढ़ना पड़ता है। यहां का युवा संसाधनों की कमी और आर्थिक तंगी के बावजूद अपनी मेहनत के बलबूते परीक्षाओं की तैयारी करता है। उसके लिए नीट यूपीएससी या रेलवे की परीक्षा सिर्फ एक एग्जाम नहीं, बल्कि गरीबी की जंजीरों को तोड़ने का एकमात्र जरिया है। लेकिन जब यही परीक्षा माफिया के लिए एक ‘बिजनेस मॉडल’ बन जाती है, जहां करोड़ों के लेन-देन से पेपर सॉल्व कराया जाता है, तो इसका सबसे बड़ा शिकार वही मेहनती छात्र होता है, जिसके पास खर्च करने के लिए पिता की थकी हुई कमाई होती है।
पिछले कई वर्षों से बिहार से लेकर दिल्ली तक परीक्षा घोटालों का एक सिलसिला चल रहा है। चाहे रेलवे भर्ती घोटाला हो, बिहार पंचायत चुनाव में नकल का खेल हो, या फिर नीट और सीईटी (CET) का पेपर लीक हो—हर बार तस्वीर लगभग एक जैसी रही है। सरकारें शुरुआत में घोटाले को खारिज करती हैं, फिर जब जनता का दबाव बढ़ता है, तो सीबीआई (CBI) या ईडी (ED) जैसी एजेंसियों की जांच का ढिंढोरा पीटा जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन जांचों का उद्देश्य सच्चाई सामने लाना नहीं, बल्कि समय निकालना और मीडिया का ध्यान भटकाना होता है। इसी निष्क्रियता और सोची-समझी रणनीति ने छात्रों के मन में गहरा आक्रोश पैदा किया है।
लाठीचार्ज: न्याय की मांग पर प्रशासन का अता-पता खो जाना
जंतर-मंतर और पटना में छात्रों पर लाठीचार्ज किसी प्रशासनिक कार्रवाई से कम और किसी तानाशाही रवैये से ज्यादा था। लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार है। जब छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो उनकी मांग सरकार का तख्तापलट करने की नहीं होती, बल्कि वे अपने भविष्य की सुरक्षा चाहते हैं। वे चाहते हैं कि जो लोग उनके सपनों पर पानी फेर रहे हैं, उन्हें सजा मिले। लेकिन सरकार के पास इस आक्रोश को समझने की न तैयारी थी और न ही इच्छा। बल्कि, प्रशासन ने जवाब देने के बजाय सवाल करने वालों को ही कत्ल करने की ठान ली।
पटना के डाक बंगला चौराहे पर शनिवार को जब छात्रों ने बैरिकेडिंग तोड़कर वीआईपी इलाके की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस ने फिर से लाठियां भांजीं। यह दृश्य तब और भी दुखद हो जाता है, जब आप देखते हैं कि डाक बंगला चौराहे पर प्रदर्शनकारियों की तुलना में पुलिस बल की संख्या कहीं ज्यादा थी। इससे स्पष्ट संदेश जाता है कि सरकार छात्रों से बातचीत करने के मूड में नहीं है, बल्कि उसे डटकर दमन करना है।
‘पुलिस राज’ की हालत में बदला बिहार
बिहार बंद के दौरान प्रशासन द्वारा किए गए सुरक्षा प्रबंध और छापेमारियां किसी आतंकवादी हमले के बाद देखने को मिलते हैं, न कि किसी छात्र आंदोलन के दौरान। पटना विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष मनीष यादव के घर पर छापेमारी करना, छात्रावासों और लॉजों की देर रात तक खानापूर्ति करना, और पूरे शहर में पुलिस की घेराबंदी करना—ये सब एक भयावह संकेत हैं। यह प्रशासनिक कायरता है कि आप असली अपराधियों—जिन्होंने पेपर लीक किया—को पकड़ने की बजाय, उन छात्र नेताओं को घेर रहे हैं जो उस अपराध का विरोध कर रहे हैं।
राज्य भर में 14 कंपनियों की अर्धसैनिक बलों की तैनाती, एसएसबी (SSB) और अन्य पैरा मिलिट्री फोर्स का इस्तेमाल, 300 पीटीसी जवानों और 500 अतिरिक्त होमगार्ड को ड्यूटी पर लगाना दर्शाता है कि सरकार युवाओं के गुस्से से कितनी भयभीत है। मुख्य सचिव का निर्देश कि “किसी भी असामाजिक तत्व को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी”—यह अपने आप में एक व्यंग्य है। असामाजिक तत्व वही है जो परीक्षा का पेपर लीक करके लाखों छात्रों के साथ धोखाधड़ी करे, या वह छात्र जो न्याय की गुहार लगा रहा है? सरकार की परिभाषा के अनुसार तो न्याय मांगने वाला ही ‘असामाजिक’ बन गया है।

जिलों का पन्ना: आक्रोश की अलग-अलग अभिव्यक्ति
बिहार बंद के दौरान राज्य के विभिन्न जिलों में जो स्थितियां देखने को मिलीं, वे यह बताती हैं कि यह आंदोलन कोई पटना केंद्रित घटना नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें गांव-गांव में फैली हुई हैं।
दरभंगा के बिरौल में भगत चौक से कोठी पुल तक निकाला गया प्रतिवाद मार्च और बक्सर के किला मैदान से निकला विशाल जुलूस दर्शाता है कि छात्र समुदाय अब अपने घरों में बैठने वाला नहीं रहा। बक्सर में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठना इस बात का सूचक है कि अब छात्र सिर्फ पेपर लीक के आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे राजनीतिक जवाबदेही भी चाहते हैं।
वहीं, सीवान, छपरा और सासाराम जैसे जिलों में आक्रोश का रूप थोड़ा उग्र हो गया। सीवान में जेपी चौक को जाम करना, छपरा में नगरपालिका चौक के पास पुलिस पर पत्थरबाजी करना और सासाराम में पोस्टऑफिस चौक पर झड़पें—ये स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं हैं जब किसी सरकार के पास सुनने के लिए कान नहीं होते। जब शांतिपूर्ण मार्च पर लाठियां चलती हैं, तो कुछ असंतुलित तत्वों द्वारा पथराव की घटनाएं होना अफसोसजनक तो है, लेकिन अप्रत्याशित नहीं। इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार वह प्रशासनिक मानसिकता है, जो बातचीत के बजाय बल प्रयोग पर जोर देती है।
दूसरी ओर, मोतिहारी और जहानाबाद जैसे जिलों में बंद का असर कम दिखना भी एक विचारणीय बिंदु है। यह इसलिए नहीं कि वहां के लोग पेपर लीक से खुश हैं, बल्कि इसलिए कि लगातार हो रहे बंदों और हड़तालों से आम जनता और व्यापारियों में ‘बंद थकान’ (Bandh Fatigue) आ चुकी है। लोग समझ चुके हैं कि सड़क जाम करने और दुकानें बंद करवाने से पेपर लीक के माफिया तक सरकार नहीं पहुंच पाएगी। फिर भी, यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में ड्रोन के जरिए निगरानी करना और इंटरनेट सेवा बंद करना सरकार की घबराहट को उजागर करता है।
राजनीतिक दलों का समर्थन
इस बंद को राजद (RJD), वीआईपी (VIP), भाकपा माले (CPI-ML) और माकपा (CPI-M) समेत कई विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। राजनीतिक दलों का किसी भी जन आंदोलन में शामिल होना लोकतंत्र में सामान्य है, लेकिन इसके दो पहलू हैं। एक तरफ इन दलों के समर्थन से आंदोलन को ताकत मिलती है और सरकार पर दबाव बढ़ता है, लेकिन दूसरी तरफ इससे छात्र आंदोलन की शुद्धता पर सवाल उठते हैं।
क्या यह आंदोलन अब भी केवल छात्रों का आंदोलन है, या इसे विपक्षी दलों ने नीतीश सरकार और केंद्र की मोदी सरकार को घेरने के लिए एक ‘राजनीतिक हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है? इस सवाल का जवाब भविष्य में मिलेगा, लेकिन अभी तक के संकेत कुछ अलग ही दिख रहे हैं। अररिया में स्टूडेंट फ्रंट के धरने के दौरान स्पष्ट तौर पर यह कहा गया कि अगर छात्रों के साथ दमन जारी रहा, तो अब मांग सिर्फ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस्तीफे की मांग उठेगी। यह बयान दर्शाता है कि छात्र नेतृत्व राजनीतिक दलों की गोलीबारी में शामिल होने के बजाय, अपनी ही अलग रणनीति बनाने की कोशिश में है।
शिक्षा व्यवस्था पर बने सवालिया निशान
बिहार बंद का एक और गंभीर पहलू यह रहा कि इसका असर शिक्षा के कामकाज पर भी पड़ा। बीआरए बिहार यूनिवर्सिटी (BRABU) में यूनानी मेडिसिन की परीक्षा स्थगित करनी पड़ी। 72 छात्रों की यह परीक्षा 2 अगस्त तक के लिए टल गई। यह स्थिति अत्यंत दुखद है कि जो छात्र पढ़ाई बचाने के लिए सड़कों पर हैं, उन्हीं के कारण दूसरे छात्रों की परीक्षाएं प्रभावित हो रही हैं।
लेकिन इसका दोष छात्रों को देना उचित नहीं होगा। जब कोई परीक्षा पारदर्शिता के दायरे से बाहर हो जाती है, तो उस परीक्षा को लेकर विश्वास खत्म हो जाता है। बीआरएबीयू प्रशासन ने छात्रों को असुविधा न हो इसलिए परीक्षा स्थगित की, लेकिन यह भी सच है कि प्रशासन बंद के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहा होता, तो भी परीक्षा नहीं हो पाती। यह एक गिरते हुए तंत्र की कहानी है, जहां एक समस्या का समाधान करने के बजाय उससे जुड़ी दूसरी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री और जवाबदेही का संकट
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा निशाने पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं। पटना के डाक बंगला चौराहे पर छात्रों द्वारा उनके इस्तीफे की मांग बिल्कुल वैध है। नीट एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है और इसमें इतने बड़े पैमाने पर धांधली होना सीधे-सीधे शिक्षा मंत्रालय की विफलता है। एनटीए (NTA) जैसी संस्था को जब लाखों छात्रों के भविष्य की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और कड़े सुरक्षा नियम होने चाहिए। लेकिन पेपर लीक होने के बाद एनटीए और शिक्षा मंत्रालय ने पहले तो मामले को दबाने की कोशिश की और जब बात बढ़ी, तो छात्रों पर ही कथित रूप से शंकाओं को बढ़ाने का आरोप लगाया।
लोकतंत्र में जवाबदेही (Accountability) का सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण होता है। अगर किसी विभाग में भ्रष्टाचार होता है, तो उस विभाग का मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देता है। लेकिन भारत में यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है। धर्मेंद्र प्रधान का अब तक पद से इस्तीफा न देना और केवल जांच के आदेश देकर कन्नी काटना दर्शाता है कि सत्ता में बैठे लोगों को जनता की नाराजगी की कोई परवाह नहीं है। जब तक शीर्ष स्तर पर कोई जिम्मेदारी नहीं तय होगी, तब तक नीचे के स्तर पर अफसर और माफिया मिलकर खेल खेलते रहेंगे।
संवाद की राजनीति की जरूरत
बिहार बंद और इसके दौरान हुई घटनाओं ने सरकारों के लिए एक चेतावनी की घंटी बजा दी है। अगर अभी भी कोर्स करेक्शन नहीं किया गया, तो यह आंदोलन और उग्र हो सकता है। बिहार और यूपी जैसे राज्यों के युवाओं की जनसांख्यिकी डिविडेंड (Demographic Dividend) को जनसांख्यिकी आपदा (Demographic Disaster) में बदलने से रोकने के लिए तत्काल कुठारात्मक कदम उठाने होंगे।
सबसे पहले, सरकार को अपना ‘दमन का चश्मा’ उतारकर ‘संवाद का चश्मा’ पहनना होगा। छात्र नेताओं के घरों पर छापेमारी करने और उन्हें हिरासत में लेने के बजाय, मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री को सीधे छात्र प्रतिनिधियों से बैठक करनी चाहिए। छात्रों की मांगों को सुनना होगा।
दूसरा, केंद्र सरकार को नीट के पेपर लीक मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच (जैसे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में SIT) का आदेश देना होगा, जिससे छात्रों के मन में जांच प्रक्रिया को लेकर भरोसा पैदा हो सके। केवल CBI जांच का नारा अब काम नहीं आएगा, क्योंकि CBI की गति और स्वतंत्रता को लेकर आज देश में गंभीर सवाल खड़े हैं।
तीसरा, परीक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार करने होंगे। पेपर लीक रोकने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे कि एक साथ देशभर में परीक्षा कराना या डिजिटल मोड को अपनाना। लेकिन तकनीक भी तब तक फेल होगी, जब तक मनुष्य भ्रष्ट है। इसलिए परीक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों और शिक्षा माफिया के बीच की कड़ियों को तोड़ना जरूरी है।























