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दुनिया के किस कोने में हैं सबसे ज्यादा शरणार्थी? वर्ल्ड रिफ्यूजी डे पर विशेष

World Refugee Day 2026:आज के समय दुनिया में 11.7 करोड़ (117 मिलियन) से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो विस्थापन का शिकार हो चुके हैं। यह संख्या कई देशों की कुल आबादी से भी कहीं ज्यादा है। इनमें सूडान, यूक्रेन, अफगानिस्तान, सीरिया, म्यांमार और कांगो जैसे देशों के लाखों परिवार शामिल हैं, जिनका जीवन सिर्फ बचने की लड़ाई बनकर रह गया है।

अपने ही देश में विस्थापित होने वालों को आईडीपी कहते

HIGHLIGHTS

  • हर साल बीस जून को पूरे विश्व में यह मनाया
  • संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मनाने का फैसला लिया
  • साल दो हजार छब्बीस की थीम बहुत खास होती है
  • दुनिया में ग्यारह दशमलव सात करोड़ लोग विस्थापित हो चुके
  • संयुक्त राष्ट्र की सन पचास एक संधि बहुत जरूरी है

World Refugee Day 2026: दुनिया भर में हर साल 20 जून को ‘वर्ल्ड रिफ्यूजी डे’ (World Refugee Day) मनाया जाता है। यह दिन केवल एक दिनचर्या या अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर पर एक तारीख नहीं है, बल्कि यह उन लाखों-करोड़ों लोगों के साहस, अटूट हिम्मत और जीवन संघर्ष को सलाम करने के लिए समर्पित है, जिन्हें अपनी मर्जी के खिलाफ अपना घर, अपनी जमीन और अपना देश छोड़ना पड़ा है। युद्ध, नफरत, हिंसा, उत्पीड़न या भयानक प्राकृतिक आपदाओं ने इन्हें ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया, जहां से वापसी का रास्ता बंद हो गया।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2000 में एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया था। तब से लेकर आज तक हर साल इस दिन को एक नई थीम के साथ मनाया जाता है। साल 2026 के लिए इसकी थीम “Until Everyone Is Safe” (जब तक हर व्यक्ति सुरक्षित नहीं है) रखी गई है। इस थीम का संदेश साफ है—जब तक दुनिया का एक भी इंसान युद्ध या आपदा के डर में नहीं जी रहा, तब तक वैश्विक समुदाय की जिम्मेदारी पूरी नहीं मानी जा सकती।

दुनिया भर में कितने लोग शरणार्थी हैं?

संयुक्त राष्ट्र के ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आज के समय दुनिया में 11.7 करोड़ (117 मिलियन) से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो विस्थापन का शिकार हो चुके हैं। यह संख्या कई देशों की कुल आबादी से भी कहीं ज्यादा है। इनमें सूडान, यूक्रेन, अफगानिस्तान, सीरिया, म्यांमार और कांगो जैसे देशों के लाखों परिवार शामिल हैं, जिनका जीवन सिर्फ बचने की लड़ाई बनकर रह गया है।

‘रिफ्यूजी’ या शरणार्थी आखिर किसे कहते हैं?

अक्सर लोग शरणार्थी, प्रवासी और विस्थापित शब्दों को एक ही मान लेते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में इसकी एक स्पष्ट परिभाषा है। संयुक्त राष्ट्र की 1951 की रिफ्यूजी कन्वेंशन के अनुसार, शरणार्थी वह व्यक्ति है जो अपनी नस्ल, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह का होने या राजनीतिक राय के कारण उत्पीड़न के डर से अपना देश छोड़ने पर मजबूर हो गया हो, और जिसे वापस जाने में अपनी जान का खतरा हो।

इसके अलावा, विस्थापन की कुछ अन्य अहम श्रेणियां भी हैं:

  • शरण चाहने वाले (Asylum Seekers): वे लोग जिन्होंने दूसरे देश में शरण की गुहार लगाई है, लेकिन उनके दावे पर अभी अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।
  • Internally Displaced Persons (IDPs): वे लोग जो युद्ध या आपदा के कारण अपना घर तो छोड़ देते हैं, लेकिन अपने ही देश की सीमाओं के अंदर किसी दूसरी जगह शरण लेते हैं।
  • राज्यविहीन व्यक्ति (Stateless Persons ): ऐसे लोग जिनकी किसी भी देश की कानूनी नागरिकता नहीं होती।
  • वापसी करने वाले (Returnees): वे शरणार्थी जो लंबे समय बाद जब स्थिति सामान्य होती है, तो अपने मूल देश लौट जाते हैं।

किस देश में रहते हैं सबसे ज्यादा रिफ्यूजी?

जब बात शरणार्थियों को शरण देने की आती है, तो दुनिया के कुछ देश अन्य देशों की तुलना में कहीं ज्यादा जिम्मेदारी उठाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, विश्व में सबसे ज्यादा शरणार्थी ईरान, तुर्की, कोलंबिया, जर्मनी और पाकिस्तान में निवास करते हैं।

  • तुर्की: सीरिया के लंबे और खूनी गृहयुद्ध के कारण तुर्की दुनिया में सबसे ज्यादा शरणार्थियों को पनाह देने वाला देश बना हुआ है।
  • पाकिस्तान और ईरान: ये दोनों देश दशकों से अफगानिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों को अपनी जमीन पर रखे हुए हैं।
  • कोलंबिया: वेनेजुएला की आर्थिक और राजनीतिक तबाही के चलते लाखों वेनेजुएलाई नागरिकों ने कोलंबिया को अपना ठिकाना बनाया है।
  • जर्मनी: यूरोप का सबसे बड़ा अर्थव्यवस्था वाला यह देश यूक्रेन सहित यूरोप और एशिया के कई देशों से आए शरणार्थियों के लिए एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।

बाढ़ और सूखे ने बढ़ाई शरणार्थियों की संख्या

आज के दौर में सिर्फ युद्ध और गोलियां ही शरणार्थियों की सबसे बड़ी वजह नहीं हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ा खतरा बन चुका है। प्रतिष्ठित संगठन ऑक्सफैम (Oxfam) के विश्लेषण के अनुसार, एशिया समेत दुनिया के कई हिस्सों में जलवायु संकट ने भयंकर विस्थापन को जन्म दिया है।

भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, मलेशिया और फिलीपींस जैसे देशों में अकाल से लेकर भयानक बाढ़ तक की घटनाओं ने लाखों लोगों को बेघर किया है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2013 में लगभग 35 लाख लोग जलवायु संबंधी कारणों से विस्थापित हुए थे, जो 2023 तक बढ़कर करीब 79 लाख के आंकड़े को छू गया।

सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में सोमालिया शामिल है, जहां 2023 के दौरान बाढ़ और सूखे की 223 घटनाएं दर्ज की गईं। वहीं फिलीपींस में 74 बार, ब्राजील में 79 बार और मलेशिया में 127 बार बाढ़ ने तबाही मचाई। यह आंकड़ा साबित करता है कि पिछले एक दशक में जलवायु आपदाओं ने किस तरह से ‘जलवायु शरणार्थियों’ की एक नई फौज खड़ी कर दी है।

रिफ्यूजी के मामले में भारत का नंबर क्या है?

जब शरणार्थियों की संख्या की बात आती है, तो अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि भारत इस लिस्ट में कहां खड़ा है? तो स्पष्ट जवाब है कि शरणार्थियों की कुल संख्या के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों (टॉप 10) में शामिल नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2022 तक भारत में लगभग 46 हजार से ज्यादा मान्यता प्राप्त शरणार्थी रह रहे थे। हालांकि, यह संख्या कम लगे, लेकिन भारत ने इतिहास में हमेशा से दूसरे देशों से आए हुए उत्पीड़ित लोगों को अपनी जमीन पर शरण दी है।

भारत में रहने वाले इन शरणार्थियों का डेटा बेहद दिलचस्प है:

  • श्रीलंका: कुल शरणार्थियों में सबसे ज्यादा 43 प्रतिशत लोग श्रीलंका से आए हैं। वहां के गृहयुद्ध और आर्थिक संकट के कारण ये लोग यहां बसे।
  • तिब्बत: 34 प्रतिशत शरणार्थी तिब्बत से हैं, जो चीन के अत्याचारों से बचकर भारत आए और यहां धर्म-संस्कृति को संजोए हुए हैं।
  • म्यांमार: 14 प्रतिशत शरणार्थी म्यांमार (म्यानमार) से भागकर भारत में शरण लेने वाले रोहिंग्या और अन्य समुदाय के लोग हैं।
  • अफगानिस्तान: 7 प्रतिशत लोग तालिबान शासन और पिछले दशकों के युद्ध से बचकर अफगानिस्तान से यहां पहुंचे हैं।
  • अन्य देश: लगभग 2 प्रतिशत लोग दुनिया के अन्य विभिन्न देशों से आकर भारत में रह रहे हैं।

भारत में रहने वाले इन हजारों शरणार्थियों को संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) की ओर से विशेष सहायता, राशन कार्ड और आवासीय सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।

विश्व शरणार्थी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शरणार्थी बनना किसी की इच्छा नहीं होती। यह एक ऐसी परिस्थिति है जो किसी भी देश के नागरिक को रातों-रात बेघर कर सकती है। “Until Everyone Is Safe” की थीम सिर्फ नारा नहीं, बल्कि एक वैश्विक चेतावनी है कि जब तक दुनिया में कोई भी इंसान असुरक्षित है, तब तक पूरी मानवता असुरक्षित है।

Sandhya Samay News

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