विदेश मंत्रालय (MEA) के एक वरिष्ठ अधिकारी के उस बयान ने देश में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, जिसमें कहा गया कि भारतीय पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज (Travel Document) के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि नागरिकता के पक्के और अंतिम सबूत के रूप में। 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर दिए गए इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भारी घमासान मच गया है। लोगों के मन में यह सवाल उभर रहा है कि अगर पासपोर्ट नागरिकता का सबूत नहीं है, तो आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज प्रमाणिक माना जाएगा? आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।
कानून और विदेश मंत्रालय का क्या कहना है?
विदेश मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट जारी होने से पहले कई तरह की जांच-पड़ताल और दस्तावेजों की बारीकी से पड़ताल की जाती है। लेकिन कानूनी नजरिए से इसका मुख्य मकसद अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाना है। दरअसल, इस पूरे मामले में ‘पासपोर्ट एक्ट, 1967’ की धारा 20 का जिक्र किया जा रहा है।
यह धारा भारत सरकार को अनोखी शक्ति देती है। धारा 20 के तहत, ‘पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने से जुड़े पिछले प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो, फिर भी केंद्र सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है, बशर्ते सरकार की राय में जनहित में ऐसा करना जरूरी हो।’ भारत सरकार की गाइडलाइन भी साफ करती है कि पासपोर्ट एक पहचान और यात्रा दस्तावेज है, और सरकार विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी यह जारी कर सकती है।
राजनीतिक और बौद्धिक हलचल
विदेश मंत्रालय के इस बयान पर विपक्षी नेताओं और जानी-मानी हस्तियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे ने सरकार के इस रुख पर सवाल उठाते हुए तीन बड़े सवाल पूछे:
- अगर पासपोर्ट नागरिकता का दस्तावेज नहीं है, तो पासपोर्ट देने से पहले पुलिस क्या वेरिफ़ाई करती है?
- क्या भारत सरकार गैर-भारतीयों को भी यात्रा दस्तावेज के तौर पर भारतीय पासपोर्ट देती है?
- क्या इस घोषणा से दूसरे देशों के मन में यह शक पैदा नहीं होगा कि गैर-भारतीयों के हाथ में भी भारतीय पासपोर्ट हो सकता है?
ठाकरे ने सरकार की विदेश नीति पर तंज कसते हुए इस परिभाषा को ‘बेतुका’ करार दिया। वहीं, वरिष्ठ पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने भी X (पूर्व में ट्विटर) पर इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। अख्तर ने लिखा कि विदेश मंत्रालय का कहना है कि पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का सबूत नहीं. सच में? तो क्या वे कुछ लोगों को यह यात्रा दस्तावेज इसलिए दे रहे हैं क्योंकि उन्हें पूरा यकीन नहीं है कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं?? यह बेतुका है।
अधिकारी का बयान बनाम विदेश मंत्री का बयान
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस विवादित बयान से कुछ ही दिन पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पासपोर्ट को लेकर एक अलग ही रुख अपनाया था। रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर्स कॉन्फ्रेंस में जयशंकर ने साफ तौर पर कहा था कि भारतीय पासपोर्ट राष्ट्रीय पहचान का एक जरिया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे सम्मान और भरोसे की नजर से देखा जाता है। उन्होंने कहा था कि पासपोर्ट केवल पन्नों की पुस्तिका नहीं, बल्कि आर्थिक गतिशीलता और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक शक्तिशाली साधन है। एक तरफ विदेश मंत्री इसे ‘राष्ट्रीय पहचान’ बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ मंत्रालय के अधिकारी इसे सिर्फ ‘यात्रा पत्र’ कह रहे हैं। इस विरोधाभास ने भ्रम को और बढ़ा दिया है।
पासपोर्ट सेवाओं का आधुनिकीकरण
इस पूरे विवाद के बीच, 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर विदेश मंत्री ने पासपोर्ट सेवाओं के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया। उन्होंने इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘कम से कम सरकार, ज़्यादा से ज़्यादा गवर्नेंस’ के विजन को दिया।
विदेश मंत्रालय ने डिजिटल क्षेत्र में अपग्रेडेड पासपोर्ट सेवा प्रोग्राम (PSP V2.0) और दुनिया भर में ग्लोबल पासपोर्ट सेवा प्रोग्राम (GPSP V2.0) को लागू करने की बात कही। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अब इंटरनेशनल स्टैंडर्ड को पूरा करने वाले चिप-आधारित ई-पासपोर्ट (e-Passports) की शुरुआत की जा रही है, जो सिक्योरिटी और ऑथेंटिकेशन को और मजबूत बनाएगी।























