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जेल की दुनिया: कैदियों का रहन-सहन और खाने का जाने पूरा सच

Prisoner Life:भारत की अधिकांश जेलों में कैदियों का दिन बहुत जल्दी शुरू हो जाता है। आमतौर पर सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच उन्हें जगा दिया जाता है। दिन की शुरुआत सबसे पहले हाजिरी या गिनती से होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी कैदी अपनी निर्धारित जगह पर मौजूद हैं।

जेल प्रशासन कैदियों की दिनचर्या को कैसे करता है नियंत्रित (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • कैदियों की लाइफस्टाइल से जुड़े रोचक तथ्य
  • कैदियों का पूरा डेली रूटीन
  • सुबह की चाय से रात तक
  • जेल में दिनभर क्या करते हैं कैदी
  • जेल में सुबह कितने बजे उठते हैं कैदी

Prisoner Life:जेल का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठने लगते हैं। अक्सर लोग यह जानना चाहते हैं कि जेल के अंदर कैदियों की जिंदगी कैसी होती है, उनका दिन कैसे बीतता है और उन्हें खाने में क्या दिया जाता है। फिल्मों और टीवी सीरियल्स में जेल की जो तस्वीर दिखाई जाती है, वास्तविक जीवन में स्थिति उससे काफी अलग होती है। जेल के अंदर हर गतिविधि तय नियमों और अनुशासन के तहत संचालित होती है। कैदियों की दिनचर्या सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक पूरी तरह निर्धारित होती है और जेल प्रशासन हर गतिविधि पर नजर रखता है।

भारत की जेलों का उद्देश्य केवल अपराधियों को सजा देना नहीं है, बल्कि उन्हें सुधारना और समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए तैयार करना भी है। यही वजह है कि जेलों में अनुशासित जीवनशैली, कामकाज, शिक्षा और कौशल विकास जैसी कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

सुबह जल्दी शुरू होता है कैदियों का दिन

भारत की अधिकांश जेलों में कैदियों का दिन बहुत जल्दी शुरू हो जाता है। आमतौर पर सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच उन्हें जगा दिया जाता है। दिन की शुरुआत सबसे पहले हाजिरी या गिनती से होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी कैदी अपनी निर्धारित जगह पर मौजूद हैं।

हाजिरी के बाद कैदियों को व्यक्तिगत साफ-सफाई के लिए समय दिया जाता है। कई जेलों में कैदियों को अपने बैरक और आसपास के परिसर की सफाई भी स्वयं करनी पड़ती है। इससे उनमें जिम्मेदारी और अनुशासन की भावना विकसित करने की कोशिश की जाती है।

सुबह करीब 5 बजे या उसके आसपास चाय दी जाती है। इसके कुछ समय बाद नाश्ता कराया जाता है। जेलों में नाश्ता साधारण लेकिन पौष्टिक रखने की कोशिश की जाती है। अलग-अलग राज्यों की जेलों में नाश्ते का मेन्यू अलग हो सकता है। कहीं दलिया, पोहा, चना, ब्रेड या खिचड़ी दी जाती है तो कहीं अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं।

नाश्ते के बाद शुरू होता है कामकाज

नाश्ता खत्म होने के बाद अधिकांश कैदियों को उनके निर्धारित कार्यस्थलों पर भेज दिया जाता है। जेलों में विभिन्न प्रकार के कार्य संचालित किए जाते हैं, जिनमें बढ़ईगिरी, सिलाई, बुनाई, हस्तशिल्प, बागवानी, कृषि कार्य और छोटे उद्योगों से जुड़े काम शामिल होते हैं।

इन गतिविधियों का उद्देश्य केवल समय बिताना नहीं बल्कि कैदियों को रोजगार संबंधी कौशल सिखाना भी होता है। कई जेलों में कैदियों द्वारा बनाए गए उत्पाद बाजार में बेचे जाते हैं। इसके बदले उन्हें मेहनताना भी दिया जाता है। यह राशि वे अपने परिवार को भेज सकते हैं या जेल के भीतर अपनी आवश्यकताओं पर खर्च कर सकते हैं।

इसके अलावा जो कैदी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं, उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था भी की जाती है। कई जेलों में साक्षरता अभियान, स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और व्यावसायिक प्रशिक्षण भी चलाए जाते हैं। इससे कैदियों को रिहाई के बाद बेहतर जीवन जीने में मदद मिल सके।

दोपहर में मिलता है लंच

कामकाज के बीच दोपहर का भोजन आमतौर पर 11:30 बजे से 12 बजे के बीच दिया जाता है। लंच का समय जेल प्रशासन द्वारा निर्धारित होता है और सभी कैदियों को उसी समय भोजन करना होता है।

हालांकि विभिन्न राज्यों और जेलों के अनुसार खाने का मेन्यू बदल सकता है, लेकिन सामान्य रूप से दोपहर के भोजन में दाल, सब्जी, रोटी और चावल शामिल होते हैं। कुछ जगहों पर मौसमी सब्जियां भी परोसी जाती हैं। जेल प्रशासन इस बात का ध्यान रखने की कोशिश करता है कि भोजन संतुलित और पोषणयुक्त हो, ताकि कैदियों का स्वास्थ्य बना रहे। लंच के बाद कैदियों को कुछ समय आराम करने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद वे दोबारा अपने निर्धारित कार्यों में लग जाते हैं।

शिक्षा और सुधार कार्यक्रमों पर भी दिया जाता है जोर

आधुनिक जेल व्यवस्था में सुधार और पुनर्वास को विशेष महत्व दिया जाता है। कई जेलों में पुस्तकालय की सुविधा होती है, जहां कैदी किताबें पढ़ सकते हैं। कुछ जेलों में कंप्यूटर प्रशिक्षण, योग, ध्यान और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

इसके अलावा धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से भी कैदियों को सकारात्मक सोच की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम कैदियों के मानसिक और भावनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शाम को मिलती है थोड़ी राहत

दिनभर काम करने के बाद शाम का समय अपेक्षाकृत हल्का होता है। इस दौरान कैदियों को टहलने, व्यायाम करने और कुछ खेल गतिविधियों में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाती है। यह समय उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

कई कैदी इस दौरान अपने साथियों से बातचीत करते हैं, किताबें पढ़ते हैं या धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं। कुछ जेलों में निर्धारित नियमों के तहत परिवार से मुलाकात या बातचीत की सुविधा भी उपलब्ध होती है, जिससे कैदी अपने परिजनों के संपर्क में बने रह सकें।

रात के खाने में क्या मिलता है?

शाम को एक बार फिर कैदियों की हाजिरी ली जाती है। इसके बाद रात का भोजन परोसा जाता है। अधिकांश जेलों में डिनर का समय शाम 6 बजे से 7 बजे के बीच होता है।

रात के खाने में आमतौर पर दाल, रोटी, सब्जी और कई बार चावल भी शामिल किए जाते हैं। भोजन साधारण होता है, लेकिन उसे पौष्टिक बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। कुछ विशेष अवसरों या त्योहारों पर खाने के मेन्यू में बदलाव भी किया जाता है।

भोजन के बाद सभी कैदियों को उनके बैरक में भेज दिया जाता है। निर्धारित समय के बाद बैरक बंद कर दिए जाते हैं और कैदियों को वहीं रात बितानी होती है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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