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सुपर एल नीनो का खतरा! क्या 2026 बनेगा सबसे गर्म साल?

El Nino Effect on Indian Weather:जब प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है, तो वहां बादल बनते हैं और दक्षिण अमेरिका (पेरू, इक्वाडोर) में भारी बारिश होती है। लेकिन भारत पर इसका उल्टा असर पड़ता है। भारत में मॉनसून दक्षिण-पश्चिमी हवाओं (अरब सागर और हिंद महासागर से) से आता है।

गर्मी से हाहाकार! सुपर एल नीनो कैसे बदल देगा मौसम का मिजाज

HIGHLIGHTS

  • धरती बनेगी आग का गोला! सुपर एल नीनो से बढ़ेगा खतरा
  • रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का अलर्ट! भारत पर मंडरा रहा सुपर एल नीनो
  • ‘छोटा बच्चा’ बनेगा महाविनाश? जानिए क्या है सुपर एल नीनो
  • 150 साल का रिकॉर्ड टूट सकता है! मौसम वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी
  • भारत में सूखा और लू का डबल अटैक! वजह बनेगा सुपर एल नीनो

El Nino Effect on Indian Weather: इस साल गर्मी सिर्फ पसीना नहीं बहाएगी, बल्कि रिकॉर्ड तोड़ कर जान ले सकती है। मौसम विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले दिनों में ‘सुपर एल नीनो’ (Super El Niño) का प्रकोप देखने को मिल सकता है। यह एक ऐसा मौसमी खतरा है, जो धरती को एक भट्टी में बदल सकता है और पिछले 150 साल के तापमान के रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकता है।

आखिर है यह ‘छोटा बच्चा’ या ‘एल नीनो’?

एल नीनो स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘छोटा बच्चा’ या ‘बालक’। दक्षिण अमेरिका में स्पेनिश भाषा का प्रभाव (स्पेनिश उपनिवेशवाद के कारण) होने के चलते यह नाम वहां के मछुआरों ने दिया था। आम दिनों में प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से (दक्षिण अमेरिका के किनारे) का पानी ठंडा रहता है, जबकि पश्चिमी हिस्से (एशिया की तरफ) का पानी गर्म रहता है। ट्रेड विंड्स (व्यापारिक हवाएं) इस गर्म पानी को एशिया की ओर धकेलती रहती हैं।

लेकिन हर 2 से 7 साल में ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इससे गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिका की ओर बहने लगता है और पूरे प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री या उससे ज्यादा बढ़ जाता है। इसी घटना को एल नीनो कहते हैं।

दक्षिण अमेरिका में बाढ़, भारत में सूखा

जब प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है, तो वहां बादल बनते हैं और दक्षिण अमेरिका (पेरू, इक्वाडोर) में भारी बारिश होती है। लेकिन भारत पर इसका उल्टा असर पड़ता है। भारत में मॉनसून दक्षिण-पश्चिमी हवाओं (अरब सागर और हिंद महासागर से) से आता है। एल नीनो के चलते हवाओं का पैटर्न बदल जाता है, जिससे भारत की ओर आने वाली नमी लेकर वाली हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।

इसका नतीजा यह होता है कि अप्रैल-जून के महीनों में आकाश साफ रहता है, बादल नहीं छाते और सूरज की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं। खासकर उत्तर भारत, राजस्थान, दिल्ली, यूपी और मध्य प्रदेश में जमीन तेजी से गर्म होती है।

इस साल क्यों है खतरा? ‘सुपर एल नीनो’

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस साल एल नीनो केवल ‘छोटा बच्चा’ नहीं रहने वाला, बल्कि यह ‘सुपर एल नीनो’ बन सकता है। मध्य प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान बहुत तेजी से बढ़ रहा है और यह पहले ही +0.9 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है।

अगर यह तापमान 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा हो जाता है, तो इसे ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है। ऐसा 1950 के बाद केवल तीन बार हुआ है- 1982, 1997 और 2015 में। समुद्र के नीचे बहुत बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो चुका है, जो अब धीरे-धीरे सतह पर आ रहा है और हवा को और गर्म कर रहा है।

भारत के लिए मतलब

ग्लोबल वॉर्मिंग के इस दौर में अगर सुपर एल नीनो सक्रिय हो गया, तो भारत के लिए हालात चिंताजनक हो सकते हैं:

  1. मॉनसून की कमी: मॉनसून कमजोर हो सकता है, जिससे बारिश कम होने का खतरा है।
  2. सूखे की संभावना: कम बारिश से कई इलाकों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।
  3. भयंकर लू: उत्तर और मध्य भारत में हीटवेव (लू) की लहरें लंबी और तेज चल सकती हैं।

कुछ वैज्ञानिकों का तो यहां तक कहना है कि यह 150 साल में सबसे मजबूत एल नीनो हो सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो धरती पर जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो सकता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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