2026 का चुनावी महासंग्राम: जाने तीन राज्य, तीन स्थितियां और मुस्लिम वोटर्स की अहम भूमिका

मुस्लिम वोटर्स की नजर में कौन बड़ा खिलाड़ी? (फाइल फोटो)

संध्या समय न्यूज


देश की सियासी बिसात पर साल 2026 बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक साबित होने जा रहा है। जहां एक तरफ पांच राज्यों में चुनाव की शहनाई बजने वाली है, वहीं सियासी पंडितों की निगाहें उन तीन राज्यों—पश्चिम बंगाल, असम और केरल—पर टिकी हैं, जहां जम्मू-कश्मीर के बाद सबसे अधिक मुस्लिम आबादी निवास करती है। इन तीनों राज्यों में ‘राजा’ भले ही कोई बने, लेकिन ‘किंगमेकर’ (राजा बनाने वाले) की भूमिका मुस्लिम वोटर्स निभाते आए हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में यह ताकत किसके साथ खड़ी दिखेगी, यह राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल है।

आंकड़ों की जीत: कहां है मुस्लिम वोट की ‘चाबी’?

देश के स्तर पर मुस्लिम आबादी 14-15 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन इन तीनों राज्यों में स्थिति पूरी तरह भिन्न है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, केरल में 27 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी और असम में 35 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इसी वजह से इन राज्यों में मुस्लिम संगठन और दल अपनी सियासी पकड़ मजबूत करने के लिए बेताब नजर आ रहे हैं। यह आबादी न केवल चुनाव परिणामों को निर्धारित करती है, बल्कि सत्ता की कुंजी भी इन्हीं के हाथ में होती है।

पश्चिम बंगाल: ममता का गढ़ या ‘तीसरे विकल्प’ का उभार?

पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से करीब 120 सीटों पर मुस्लिम वोटर्स निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर्स ने ममता बनर्जी पर पूरा भरोसा दिखाया था, जिसके नतीजे स्वरूप कांग्रेस और लेफ्ट का मुस्लिम बहुल सीटों पर सफाया हो गया था। तब ममता को लगभग 86 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे।
लेकिन 2026 का चुनाव ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं होने वाला। फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’ (ISF) और हुमायूं कबीर की ‘जनता उन्नयन पार्टी’ ने मैदान में पल्ला झाड़ लिया है। हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने का ऐलान कर जोरदार सियासी हलचल मचाई है। वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के प्रवेश की भी तेज अटकलें हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मुस्लिम वोटर्स ममता के साथ वफादारी निभाएंगे या बंगाल में भी ‘तीसरे विकल्प’ की राजनीति को जन्म देंगे? अगर वोट बंटा तो यह ममता के लिए बड़ा झटका हो सकता है।

असम: डिलिमिटेशन और अजमल की ‘करो या मरो’ की लड़ाई

पड़ोसी राज्य असम में मुस्लिम आबादी करीब 35 फीसदी है, जो चुनावी गणित को प्रभावित करती है। बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF का इतिहास रहा है। 2006 में 10 सीटों से शुरुआत करने वाली पार्टी 2011 में 18 सीटों तक पहुंच गई थी। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में अजमल को अपनी गढ़ धुबरी में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा, जिसने उनकी सियासी पकड़ को कमजोर किया है।
2026 का चुनाव अजमल के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई साबित हो सकता है। सबसे बड़ा मुद्दा डिलिमिटेशन (निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण) है, जिसने राज्य की सियासत का समीकरण ही बदल दिया है। जहां पहले 32 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक था, अब डिलिमिटेशन के बाद यह सीटें घटकर 22 रह गई हैं। इसके अलावा, इस बार कांग्रेस और AIUDF अलग-अलग लड़ाई लड़ रहे हैं, जिससे मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना बनी हुई है। ऐसे में यह सवाल बहुत मायने रखता है कि क्या अजमल फिर से असम की सत्ता की कुंजी बन पाएंगे?

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केरल: IUML का मजबूत गढ़ और स्थिर सियासत

दक्षिण भारत में केरल वह राज्य है, जहां मुस्लिम सियासत सबसे व्यवस्थित और स्थिर दिखती है। 27 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) का दबदबा कायम है। 1962 से लगातार हर लोकसभा में पार्टी के कम से कम दो सांसद चुने गए हैं, जो उनकी संगठनात्मक ताकत दर्शाता है।

विधानसभा की 140 सीटों में से 43 सीटों पर मुस्लिम मतदाता चुनाव का रुख तय करते हैं। IUML कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF का मजबूत हिस्सा है और यहां बंगाल या असम की तरह मुस्लिम वोटों के बंटने की संभावना बहुत कम है। मलप्पुरम जैसे जिले लीग के गढ़ माने जाते हैं। 2026 में भी यह उम्मीद की जा रही है कि मुस्लिम लीग अपनी पकड़ बनाए रखेगी और UDF के प्रदर्शन में अहम भूमिका निभाएगी।

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