Questions on the Street News: लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व और सिद्धांत यही है कि राज्य की सत्ता जनता के हाथ में होती है और सरकारी मशीनरी जनता की सेवा के लिए मौजूद होती है। भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना ‘जनता का सेवक होना’ है, लेकिन आज के दौर में यह सिद्धांत कहीं खोता सा नजर आ रहा है। हमारे देश में आम नागरिक और वीआईपी संस्कृति के बीच की खाई दिन-प्रतिदिन गहराती जा रही है। ताजा मामला कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से सामने आया है, जहां एक पति की बेबसी और गुस्से ने सड़क पर ऐसा नजारा पेश किया, जिसे देखकर हर कोई सोचने पर मजबूर हो गया। यह घटना केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की विफलता का एक करारा प्रमाण है, जहां एक गर्भवती महिला की तकलीफ को राज्यपाल के काफिले की सुरक्षा से ऊपर नहीं उठाया जा सकता था।
बेंगलुरु के व्यस्त इलाके ओल्ड एयरपोर्ट रोड की यह घटना हमारी सुशासन व्यवस्था के लिए किसी कोल्ड वॉटर शॉक की तरह है। राज्यपाल काफिले को गुजरना था और इसके लिए प्रशासन ने पूरी सड़क को अपने कब्जे में ले लिया। आम दिनों में भी यह रोड जाम की वजह से सुर्खियों में रहता है, लेकिन वीआईपी मूवमेंट के नाम पर जब आम आदमी को रोका जाता है, तो सवाल उठना लाजिमी है। इसी ट्रैफिक में एक शख्स अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर निकला था, शायद अस्पताल की ओर, लेकिन लंबे जाम और इंतजार के चलते कार के अंदर बैठी महिला की तबीयत बिगड़ने लगी।
युवक की बेबसी अनोखे ‘गांधीवादी’ में
यहां सवाल यह नहीं है कि क्या राज्यपाल को सुरक्षा चाहिए? बिल्कुल चाहिए। लेकिन क्या इस सुरक्षा का मतलब यह है कि किसी दूसरे नागरिक की जान को खतरे में डाला जाए? एक गर्भवती महिला कार के अंदर तड़प रही थी, लेकिन उनके आगे और पीछे की गाड़ियों का पहिया जाम था। न तो आगे बढ़ने का रास्ता था और न ही पीछे हटने की गुंजाइश। पत्नी की तकलीफ को देखकर पति सहम गया। उसने कई बार ट्रैफिक पुलिस से अनुरोध किया, लेकिन राज्यपाल के काफिले की वजह से पुलिस भी मदद के लिए बेबस नजर आई। यह बेबसी तब हताशा में बदल गई, जब उस पति ने सड़क पर बैठकर अपना विरोध दर्ज कराया।
युवक ने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया, न ही उसने पत्थरबाजी की। उसने अपनी बेबसी को एक अनोखे ‘गांधीवादी’ तरीके से प्रकट किया। वह अपनी कार से बाहर निकला और बीच सड़क पर जाकर पालथी मारकर बैठ गया। उसका इशारा साफ था—जब तक उसे रास्ता नहीं मिलता, वह यहां से नहीं हटेगा। उसके चेहरे पर बेबसी और गुस्से का मिला-जुला भाव साफ दिख रहा था। यह नजारा उस कहावत को चुनौती देता प्रतीत होता है, जहां हम कहते हैं कि ‘सत्यमेव जयते’, लेकिन यहां तो सत्ता की जय हो रही थी।
जैसे ही ट्रैफिक पुलिस के जवानों ने बीच सड़क पर एक व्यक्ति को बैठे हुए देखा, उनके होश उड़ गए। आखिरकार, राज्यपाल का काफिला किसी भी वक्त वहां से गुजर सकता था और एक शख्स का सड़क पर बैठना सुरक्षा के लिए खतरा भी माना जा सकता था। पुलिसकर्मी तुरंत उसे हटाने के लिए दौड़े। इस दौरान पुलिस और युवक के बीच जमकर बहस हुई। वीडियो में देखा जा सकता है कि युवक बार-बार पुलिसवालों को समझाने की कोशिश कर रहा है। वह अपनी उंगली कार की तरफ करते हुए कह रहा है कि उसकी प्रेग्नेंट पत्नी कार के अंदर तड़प रही है। उन्हें तुरंत अस्पताल या घर ले जाने की जरूरत है। वह पुलिस से पूछ रहा था कि क्या एक आम आदमी की पत्नी की जान राज्यपाल के काफिले से कम है?

भारत के लिए व्यवस्था पर सवाल
यह सवाल आज के भारत के लिए बहुत गहरा है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जो अपने नेताओं को भगवान से भी बड़ा बनाकर रखना चाहती है। हालांकि, पुलिस अपनी कर्तव्य की मर्यादा में बंधी हुई थी। उन्होंने युवक को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना। कुछ देर तक नाटकीय माहौल बना रहा। हालांकि, बाद में पुलिस ने समझाया और उसे वहां से हटाया। लेकिन इस पूरे वाकये ने सोशल मीडिया पर आग लगा दी है। लोग वीआईपी कल्चर पर सवाल उठा रहे हैं और युवक के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
यह पहला मामला नहीं है जब वीआईपी कल्चर या सत्ताधारी लोगों के कार्यक्रमों की वजह से आम जनता को परेशानी का सामना करना पड़ा हो। इससे ठीक कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था। वहां भाजपा मंत्री गिरिश महाजन को एक महिला के गुस्से का सामना करना पड़ा था। मंत्री गिरिश महाजन अपने समर्थकों के साथ किसी मुद्दे को लेकर सड़क पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इस विरोध-प्रदर्शन की वजह से सड़क पर भारी जाम लग गया था। इसी जाम में एक महिला अपने बच्चे को लेने स्कूल जा रही थी। लेकिन मंत्री के कार्यक्रम के कारण उसकी गाड़ी काफी देर तक वहां फंसी रही। महिला का धैर्य जवाब दे गया और वह गुस्से से लाल हो गई। उसने कार से उतरकर मंत्री और उनके समर्थकों को खूब खरी-खोटी सुनाई। उसने सवाल उठाया था कि क्या उनका बच्चा स्कूल से घर नहीं आना चाहिए? इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था और लोगों ने महिला का साथ देते हुए मंत्री पर निशाना साधा था।
राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री सड़क पर सवाल
बेंगलुरु और मुंबई की ये दोनों घटनाएं एक बार फिर उस सवाल को गंभीरता से रेखांकित करती हैं, जो अक्सर दब जाता है—क्या शक्ति के प्रतीक लोगों की सुविधा के लिए आम आदमी की बुनियादी जरूरतों और आपातकालीन स्थितियों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए? कानून व्यवस्था और सुरक्षा जरूर जरूरी है, लेकिन क्या इसका मतलब यह भी है कि किसी गर्भवती महिला को दर्द से तड़पने दिया जाए या मां को अपने बच्चे के इंतजार में घंटों खड़ा रहना पड़े?
हमें यह समझने की जरूरत है कि सुरक्षा व्यवस्था लोगों की जान बचाने के लिए होती है, उन्हें तकलीफ देने के लिए नहीं। जब किसी मरीज को अस्पताल ले जाने की जल्दी होती है, तो हर मिनट उसकी जान के लिए महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में अगर किसी वीआईपी के गुजरने की वजह से सड़कें बंद कर दी जाती हैं, तो यह कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के कई देशों में, भले ही राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री सड़क पर हों, लेकिन एम्बुलेंस या आपातकालीन सेवाओं को रोका नहीं जाता। वहां सुरक्षा के प्रोटोकॉल इतने कड़े होते हैं कि वीआईपी का काफिला भी जरूरत पड़ने पर रास्ता देता है। लेकिन भारत में हालात उल्टे हैं। यहां आम आदमी को समझाया जाता है कि ‘सहन’ करो, यह जिम्मेदारी है।
बेंगलुरु में जिस तरह युवक ने अपनी बेबसी दिखाने के लिए गांधीगिरी का सहारा लिया, वह आम नागरिक के गुस्से की एक कड़वी डोल तो है ही, लेकिन यह सिस्टम के लिए भी एक चेतावनी है। लोग अब समझदार हो रहे हैं। वे हिंसा नहीं चाहते, लेकिन उनकी पीड़ा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गांधीगिरी का यह तरीका इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि इसने बिना किसी हिंसा के सिस्टम की क्रूरता को उजागर किया है। यह दिखाता है कि जब बात अपने परिवार की जान और सम्मान की आती है, तो आम आदमी किसी भी हद तक जा सकता है।
प्रशासन मेडिकल इमरजेंसी— वीआईपी मूवमेंट सवाल
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन मेडिकल इमरजेंसी या गंभीर स्थितियों को देखते हुए वीआईपी मूवमेंट के दौरान भी एक ‘लेन’ खुला रखने की व्यवस्था नहीं कर सकता? हमारे पास आज तकनीक और संसाधन हैं। ट्रैफिक पुलिस आसानी से एम्बुलेंस या मेडिकल मरीजों की गाड़ियों को पहचान सकती है और उन्हें ग्रीन कॉरिडोर दे सकती है, भले ही वीआईपी का काफिला हो। लेकिन ऐसा नहीं होता। वीआईपी को ‘भगवान’ का दर्जा दे दिया जाता है, जिसके सामने सब कुछ छोटा हो जाता है। क्या इंतजार करने वाले उस पति या मां के तकलीफ को सिस्टम की खामियों की कीमत समझकर शांत बैठना होगा?
ये घटनाएं एक बार फिर याद दिलाती हैं कि सत्ता और संसाधन जनता के लिए हैं, न कि जनता सत्ता के लिए। रास्ता रोकने वालों को भी यह सोचना होगा कि अगर कल उनके अपने घर में कोई ऐसी आपात स्थिति आए, तो क्या वे उसी तरह की व्यवस्था को सहन कर पाएंगे? नेता और अधिकारी भी कभी आम नागरिक होते हैं। उन्हें भी अपने परिवार की चिंता होती है। उन्हें खुद को उस आदमी की जगह रखकर सोचना चाहिए।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि लाल बत्ती और सायरन की आवाज अब लोगों को परेशान करने लगी है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। बेंगलुरु का वह युवा जिसने सड़क पर बैठकर विरोध जताया, उसने न केवल अपनी पत्नी के लिए, बल्कि पूरी जनता की आवाज बुलंद की है। सरकार और प्रशासन को इस आवाज को समझना होगा। वीआईपी संस्कृति को लेकर अब कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन मानवता उससे भी ज्यादा जरूरी है। जब तक यह संतुलन नहीं बैठता, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और आम आदमी का विश्वास व्यवस्था से उठता जाएगा।






















