Storm before Parliament: संसद का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक एक दिन पहले बुलाई गई उस चर्चित सर्वदलीय बैठक ने ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया, जिसकी आशा शायद ही किसी को थी। मौजूदा सरकार और विपक्ष के बीच पहले से ही चल रहे तल्खी भरे रिश्तों के बीच, बैठक में कुछ ऐसे लोगों को निमंत्रण भेजा गया, जिसे लेकर पूरा विपक्ष एकजुट होकर खड़ा हो गया। विवाद का केंद्र बिंदु था— समाजवादी पार्टी (SP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बगावत करके भाजपा कैंप में शामिल हुए उन नेताओं को आधिकारिक तौर पर इस बैठक में बुलाया गया।
क्या है पूरा मामला और विपक्ष ने क्यों उठाई आपत्ति?
बता दें कि जब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की अध्यक्षता में यह बैठक शुरू हुई, तो उपस्थिति रजिस्टर में उन नेताओं के नाम दिखाई दिए जिन्होंने अपनी मूल पार्टी का दामन छोड़ दिया है। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने सबसे पहले इस बात पर आपत्ति जताई कि जब पार्टी के आधिकारिक सांसद मौजूद हैं, तो उनकी जगह पहले बागी नेताओं की सूची क्यों पेश की गई। इसे विपक्ष ने सदन की संसदीय परंपराओं का घोर अपमान और एक अलोकतांत्रिक कदम बताया।

जैसे ही मामला गर्माया, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी, सपा के धर्मेंद्र यादव, एनसीपी (शरद पवार गुट) की सुप्रिया सुले और TMC की महुआ मोइत्रा जैसे दिग्गज नेताओं ने तुरंत बैठक का बहिष्कार कर दिया। यह कोई सामान्य वॉकआउट नहीं था, बल्कि विपक्ष ने इसे सरकार की कूटनीति के खिलाफ एक ‘प्रतीकात्मक विरोध’ (Symbolic Walkout) का रूप दिया। बाहर निकलकर इन नेताओं ने संयुक्त रूप से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की। हालांकि, अपना पक्ष रखने के बाद ये सभी नेता फिर से बैठक कक्ष में वापस लौट आए, ताकि मानसून सत्र के एजेंडे पर बात हो सके।
महुआ मोइत्रा ने साधा निशाना, कहा- ‘यह गलत परंपरा है’
तृणमूल कांग्रेस की बोल्ड नेता महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने सीधे तौर पर सवाल किया कि जो लोग पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे चुके हैं या उन्हें पार्टी से निकाला जा चुका है, उन्हें सर्वदलीय बैठक में किस अधिकार और किस योग्यता के आधार पर बुलाया गया? दल-बदलू नेताओं को ऐसे आधिकारिक मंचों पर आमंत्रित करना भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए एक बहुत ही खतरनाक और गलत परंपरा है।
उन्होंने आगे बताया कि यह मात्र TMC का ही मुद्दा नहीं था। कांग्रेस, डीएमके, जेएमएम, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वामदलों और शिवसेना (UBT) सहित पूरे INDIA गठबंधन ने इस वॉकआउट में हिस्सा लिया। महुआ ने कानूनी पहलू पर जोर देते हुए बताया कि जिस गैर-मान्यता प्राप्त एनसीपी गुट (जिसमें बागी सांसद शामिल हैं) को बुलाया गया है, लोकसभा अध्यक्ष ने अभी तक उनके 20 सांसदों के विलय को वैधानिक मान्यता नहीं दी है। इतना ही नहीं, उनकी अयोग्यता संबंधी याचिकाएं भी अभी स्पीकर के पास लंबित हैं।
सपा नेता धर्मेंद्र यादव ने किया समर्थन
समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी इस पूरे प्रकरण को भाजपा की ‘पैदल सेना’ बढ़ाने की साजिश करार दिया। उन्होंने बताया कि बैठक के दौरान तृणमूल कांग्रेस ने जो बिंदु उठाया, वह बिल्कुल सही था। उन्होंने कहा कि जिस तरह से सरकार दल-बदल करने वाले लोगों को सम्मान देने की कोशिश कर रही है, वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
जेएमएम की राज्यसभा सांसद महुआ माझी ने बागी सांसदों के मुद्दे के साथ-साथ एक और बड़ा मुद्दा छेड़ा। उन्होंने कहा कि भाजपा को अभी भी लोकसभा में बहुमत के लिए ‘बाहर से’ सीटों की जरूरत पड़ रही है, इसलिए वह लगातार अन्य दलों के लोगों को तोड़ रही है।
महिला आरक्षण विधेयक पर बात करते हुए उन्होंने सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि विपक्ष महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में हमेशा से रहा है, लेकिन सरकार ने इसे जानबूझकर परिसीमन से जोड़ दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया गया, तो झारखंड जैसे राज्यों में अनुसूचित जनजाति (ST) की सीटों में भारी कमी आएगी, जो अस्वीकार्य है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट आश्वासन मांगा कि सीटें कम नहीं होंगी, तभी पार्टी इस पर अपना रुख तय करेगी।
किरेन रिजिजू ने दिया सकारात्मक जवाब
विपक्ष के गुस्से और आरोपों के बीच, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने शांति बनाए रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बैठक का एकमात्र उद्देश्य सोमवार से शुरू होने वाले मानसून सत्र को लेकर चर्चा करना था। रिजिजू ने एक अपील जारी करते हुए कहा कि सदन की गरिमा और कार्यवाही को सुचारू रूप सके चलाना सभी दलों की संयुक्त जिम्मेदारी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार विपक्ष की हर बात को ध्यान से सुनेगी और उम्मीद जताई कि विपक्ष भी इसी भावना से सरकार के प्रस्तावों पर विचार करेगा। उनका मानना है कि संसद का समय जितना अधिक जनता के मुद्दों पर बितेगा, देश का लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
यह पूरा प्रकरण इस बात का संकेत देता है कि मानसून सत्र किसी भी हालत में शांत नहीं रहने वाला है। विपक्ष ने बागी सांसदों के मुद्दे को लेकर जो रणनीति अपनाई— पहले वॉकआउट, फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस और फिर वापसी— उससे साफ है कि INDIA गठबंधन अब मुद्दों पर चुप नहीं रहने वाला और रणनीतिक रूप से और अधिक आक्रामक हो चुका है। अब देखना यह होगा कि सोमवार को सदन की कार्यवाही शुरू होने पर यह आग सड़कों से सदन के अंदर तक किस रूप में दिखती है।
























