Discover the sweetness of Rakhi and the bitterness of sugar: भारतीय संस्कृति में त्योहारों का अपना एक अलग महत्व है। ये त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं होते, बल्कि ये भावनाओं, परिवारों के जुड़ने और खुशियों के प्रतीक हैं। और इन खुशियों का केंद्र बिंदु होता है ‘मिठास’। चाहे राखी का त्योहार, गणेश चतुर्थी का मोदक हो, दशहरे के अवसर पर बांटी जाने वाली शुभ संदेश की बर्फी हो, या फिर दीपावली की रौनक को चार चांद लगाने वाले काजू कतली और मोतीचूर के लड्डू—सबकी नींव कहीं न कहीं चीनी से ही जुड़ती है। लेकिन, इस बार इस मिठास में कड़वापट घुलता दिख रहा है। महज एक महीने पहले तक जिस चीनी को हम 45 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से आसानी से अपनी रसोई में ला रहे थे, आज वही चीनी 60 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर पहुंचकर आम आदमी की जेब पर भारी बोझ बन गई है।
यह अचानक उछाल किसी एक वजह से नहीं हुआ है, बल्कि यह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही कई आर्थिक, मौसम और नीतिगत गलतफहमियों का एक जटिल परिणाम है। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने भले ही इस मुद्दे पर एक विस्तृत बयान जारी कर अपनी सफाई पेश की हो, लेकिन जमीनी हालात उस आधिकारिक भाषा से कहीं अलग और चिंताजनक बयां कर रहे हैं। आइए, इस संकट की परतों को एक-एक करके खोलते हैं और समझते हैं कि आखिर चीनी की कीमतों का यह ‘उबाल’ क्यों ठंडा नहीं हो रहा।

मौसम की मार और कृषि संकट का दोहरा झटका
चीनी के दाम बढ़ने की सबसे प्राथमिक और प्रत्यक्ष वजह मौसम और फसलों को हुआ नुकसान है। भारत में गन्ने की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों पर निर्भर है। पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से मानसून का रुख अप्रत्याशित होता जा रहा है। इस साल गन्ने के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में या तो भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बनी, या फिर सूखे का प्रकोप देखने को मिला।
इसके साथ ही, फसलों में बीमारियों का प्रकोप भी कम नहीं रहा। गन्ने की फसल पर ‘रेड रॉट’ (लाल सड़क) जैसी बीमारी ने जो कहर ढाया है, वह किसी से छिपा नहीं है। इस बीमारी ने गन्ने के अंदरूनी हिस्से को सड़ा दिया, जिससे गन्ने में मिठास कम हो गई और चीनी निकालने की दर (Recovery Rate) गिर गई। जब कच्चे माल की ही उपलब्धता कम हो और उसकी गुणवत्ता भी खराब हो, तो अंतिम उत्पाद (चीनी) के दाम बढ़ना तय है। मंत्रालय ने भी अपने बयान में इस बात को स्वीकार किया है कि मौसम की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान हुआ है और उत्पादन अनुमान से कम रहा है।
जाने क्या बदल गई है सरकार की प्राथमिकताएं?
यहां से मामला थोड़ा और जटिल हो जाता है। अक्सर जब भी चीनी के दाम बढ़ते हैं, तो एक सवाल सबके जहन में उठता है—क्या यह इथनॉल (Ethanol) से जुड़ा है? सीधा जवाब है—’हां, बहुत हद तक’।
पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार की ऊर्जा नीति में एक बड़ा बदलाव आया है। पेट्रोलियम आयात बिल को कम करने और पर्यावरण को बचाने के नाम पर सरकार ने इथनॉल मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blending Programme) को तेजी से आगे बढ़ाया है। 2025 तक 20 प्रतिशत (E20) इथनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा गया है। चीनी मिलों के लिए गन्ने से सीधे चीनी बनाने से ज्यादा फायदेमंद इथनॉल का उत्पादन बन गया है।
गन्ने से जो बी-हेवी मोलासेस (B-Heavy Molasses) और सी-हेवी मोलासेस (C-Heavy Molasses) निकलता है, उसे चीनी बनाने के बजाय डिस्टिलरीज (शराब और इथनॉल बनाने वाले संयंत्रों) में भेज दिया जाता है। इसके दो फायदे मिल रहे हैं—पहला, तेल कंपनियों से इथनॉल खरीदने पर मिलों को तुरंत कैश मिलता है, जबकि चीनी बेचने में लंबा समय लगता है और किसानों का बकाया (Cane Arrears) चढ़ जाता है। दूसरा, सरकार को इथनॉल के जरिए ईंधन का आयात बिल कम करने में मदद मिलती है।
लेकिन, इस नीतिगत बदलाव की कीमत कौन चुका रहा है?—आम उपभोक्ता। जब चीनी का उत्पादन घटेगा, तो स्वाभाविक रूप से उसकी कीमतें बढ़ेंगी। इसलिए यह सवाल बहुत वाजिब है कि क्या सरकार की प्राथमिकता ‘खाद्य सुरक्षा’ से हटकर ‘ऊर्जा सुरक्षा’ की ओर शिफ्ट हो गई है? एक संतुलित नीति की जरूरत इसलिए है, ताकि न तो किसानों और मिलों को नुकसान हो, और न ही रसोई गैस का बजट आम आदमी के सिर फूटे।

वैश्विक अर्थव्यवस्था का डोमिनो इफेक्ट
उपभोक्ता मंत्रालय ने अपने बयान में एक और महत्वपूर्ण बिंदु को उठाया है कि चीनी की सप्लाई में कमी एक वैश्विक घटना है। यह सच भी है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। लेकिन, अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो हालात बने हैं, वे भारत को भी प्रभावित कर रहे हैं।
दुनिया के सबसे बड़े चीनी निर्यातक देश ब्राजील में भी मौसम का प्रकोप देखने को मिला है। वहां अत्यधिक बारिश और सूखे की चक्रीय समस्या ने गन्ने की फसल को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके अलावा, थाईलैंड जैसे अन्य प्रमुख उत्पादक देशों में भी उत्पादन कम होने की खबरें हैं। ‘एल नीनो’ (El Nino) जैसे मौसमी चक्रण ने पूरी दुनिया में चीनी के उत्पादन के अनुमानों को गिरा दिया है।
जब वैश्विक बाजार में सप्लाई कम होती है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतें छलांग मारती हैं। भारत ने घरेलू कीमतों को स्थिर रखने के लिए चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है, फिर भी वैश्विक बाजार का मनोवैज्ञानिक दबाव भारतीय थोक व्यापारियों पर पड़ता है। व्यापारी यह सोचकर स्टॉक रोक लेते हैं कि भविष्य में कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है।
त्योहारी मांग और ‘जमाखोरी-सट्टेबाजी’ का जहरीला मिश्रण
अगस्त से नवंबर के बीच पड़ने वाले त्योहार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम होते हैं। इस दौरान चीनी और मिठाइयों की मांग में अचानक 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जाती है। मंत्रालय ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि त्योहारों के मौसम से पहले बढ़ी हुई मांग ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है।
लेकिन, मांग बढ़ना एक सामान्य प्रक्रिया है, हर बार त्योहार आते हैं। सवाल यह है कि इतनी असामान्य कीमत वृद्धि क्यों? इसका जवाब मंत्रालय के बयान के आखिरी शब्दों में छुपा है—”इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी”।
चीनी उद्योग का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो किसी भी अनिश्चितता का फायदा उठाने में माहिर है। जब भी बाजार में ऐसी खबरें आती हैं कि उत्पादन कम है या मौसम खराब रहा, तो थोक व्यापारी और कुछ मिल मालिक जानबूझकर सप्लाई चेन को रोक देते हैं। वे गोदामों में चीनी का भंडारण कर लेते हैं और बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करते हैं। जब त्योहारों की मांग अपने चरम पर होती है, तो वे अपने तय किए गए उच्च भावों पर चीनी उतारते हैं। यह सट्टेबाजी (Speculation) किसी भी आवश्यक वस्तु के बाजार को बर्बाद करने के लिए काफी है। सरकार के आंकड़े भले ही बताते हों कि अक्टूबर तक पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, लेकिन अगर वह स्टॉक गोदामों में कैद रहे और बाजार तक न पहुंचे, तो उपभोक्ता को उस स्टॉक का कोई लाभ नहीं मिलता।
सरकारी दावे और जमीनी हकीकत का टकराव
सरकार के बयान में एक और दिलचस्प बात सामने आई है। मंत्रालय का कहना है कि “अनुमान से कम उत्पादन के बावजूद, अक्टूबर में नया पेराई का मौसम शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।”
यदि यह दावा सच है, तो फिर 60 से 70 रुपये प्रति किलो की कीमत किसकी मंजूरी है? यहीं पर सरकारी तंत्र की विफलता साफ नजर आती है। स्टॉक पर्याप्त होने का मतलब है कि कोई आपूर्ति संकट नहीं है, तो कीमतें बढ़ने का तर्क केवल ‘मांग और भर्ती’ या ‘जमाखोरी’ को इंगित करता है।
जब सरकार को पता है कि स्टॉक मौजूद है और कुछ लोग जमाखोरी कर रहे हैं, तो उसके लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए थे। भले ही सरकार ने स्टॉक लिमिट की घोषणा की हो और मिलों से ज्यादा चीनी रखने पर रोक लगाई हो, लेकिन भारत में ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि केवल कागजी आदेशों से जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग पर अंकुश नहीं लगता। जब तक सख्त जांच, छापेमारी और जमाखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई (जैसे कि उनका स्टॉक जब्त कर खुले बाजार में नीलाम करना) नहीं होती, तब तक कीमतें नीचे नहीं आतीं। सरकार का इस मामले में नरम रुख अपने आप में चिंताजनक है।
छोटे कारोबारियों और आम घर का बजट
चीनी के इस उछाल का सबसे बुरा प्रभाव किस पर पड़ रहा है?—छोटे मिठाई बनाने वाले ‘हलवाइयों’ और आम मध्यमवर्गीय परिवारों पर। बड़ी फैक्ट्रियों वाले ब्रांडेड मिठाई निर्माता अपनी पैकेजिंग और ब्रांड वैल्यू के चलते कीमतें बढ़ा सकते हैं और उनकी बिक्री पर ज्यादा असर नहीं पड़ता। लेकिन मोहल्ले के उस हलवाई की क्या गति होगी, जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है?
अगर वह चीनी का दाम बढ़ाएगा और मिठाई महंगी करेगा, तो उपभोक्ता उसकी दुकान से हटकर कम गुणवत्ता वाली या कृत्रिम मिठास वाले उत्पादों की ओर भागेगा। इससे उसका रोजगार और कारोबार चौपट होने के कगार पर आ जाएगा। वहीं, आम घर में रोजमर्रा की चाय-नाश्ते का बजट बिगड़ जाएगा। एक ऐसा देश, जहां चाय को ‘चाय पर चर्चा’ की संस्कृति का हिस्सा माना जाता है, वहां चीनी का महंगा होना सीधे जनजीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।























