ऋषी तिवारी
बिहार की राजनीति में भाजपा ने पिछले दो दशकों में जिस रणनीति के साथ अपनी पकड़ मजबूत की है, वह ‘कछुआ चाल’ और ‘लंबी छलांग’ का अनूठा मिश्रण है। नीतीश कुमार को आगे रखकर दो दशक तक उनके पीछे-पीछे चलने के बाद, अब भाजपा ने बिहार की सत्ता में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। नीतीश कुमार के दो-दो बार गठबंधन छोड़ने के बावजूद, भाजपा ने उन्हें मजबूरन साथ लिया और अंततः दूसरी बार साथ मिलने पर उन्हें अपनी शर्तों पर नचा दिया।
‘साम-दाम-दंड-भेद’ से नीतीश को दिल्ली का रास्ता
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर जैसे विश्लेषकों के अनुमान सच साबित होते दिख रहे हैं। भाजपा ने नीतीश कुमार को बिहार की सत्ता से हटाकर राज्यसभा के जरिए दिल्ली शिफ्ट करने में काफी मेहनत और रणनीति लगाई। ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की राजनीति का इस्तेमाल करते हुए भाजपा ने नीतीश के कमजोर पड़ने का इंतजार किया। नतीजतन, एक ऐसा मौका आया जब नीतीश कुमार को गृह मंत्रालय छोड़ना पड़ा और बीजेपी के नेता सम्राट चौधरी ने यह महत्वपूर्ण विभाग अपने हाथ में ले लिया। यह उस नए दौर का संकेत था, जहां जेडीयू अब बराबरी की बजाय जूनियर पार्टनर की भूमिका में दिख रही थी।
वाजपेयी से मोदी युग: गठबंधन धर्म से वर्चस्व तक
वाजपेयी-आडवाणी के दौर में भाजपा गठबंधन धर्म को बड़ी शिद्दत से निभाती थी। पिछड़ी जातियों के समर्थन के लिए उन्हें नीतीश जैसे नेताओं की जरूरत थी, इसलिए वह जूनियर पार्टनर बनकर भी संतोष व्यक्त करती थी। लेकिन मोदी-शाह के आगमन के साथ ही तस्वीर बदल गई। हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं और ‘डबल इंजन’ के स्लोगन के साथ बीजेपी ने बिहार समेत कई राज्यों में अपने सहयोगियों पर दबदबा बनाना शुरू कर दिया।
2015 में नीतीश कुमार द्वारा अक्सर दोहराए जाने वाले कबीर के दोहे— “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय… माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय”—को भाजपा ने अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया। जहां नीतीश का ध्यान सिर्फ एक चुनाव पर था, वहीं बीजेपी धीरे-धीरे लंबी राजनीतिक फसल पकाने में जुट गई।
सीटों का बदलता गणित और चिराग कार्ड
2005 में जेडीयू (88) के मुकाबले बीजेपी (55) की स्थिति कमजोर थी। 2010 में भी जेडीयू (115) आगे रही और भाजपा को 91 सीटें मिलीं। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने तस्वीर बदल दी। नीतीश कुमार के अलग होने के बावजूद बीजेपी ने बिहार में 22 सीटों पर जीत दर्ज की।

दुनिया का अनोखा मंदिर, विभीषण की पूजा और होलिका दहन की अनोखी परंपरा
2020 का विधानसभा चुनाव निर्णायक मोड़ साबित हुआ। चिराग पासवान की रणनीति ने नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचाया और भाजपा का वोट शेयर (19.46%) जेडीयू (15.39%) से अधिक हो गया। इसका नतीजा यह रहा कि भाजपा 74 सीटों के साथ जेडीयू (43 सीटों) से बड़े भाई के रूप में उभरी। 2025 के चुनाव में यह अंतर और स्पष्ट हुआ, जहां भाजपा ने 89 सीटें जीतीं और जेडीयू को 85 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
नीतीश की विरासत और जेडीयू का भविष्य
नीतीश कुमार के बिहार छोड़ने की घोषणा के बाद जेडीयू का भविष्य अनिश्चितता के घेरे में है। भाजपा के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती उस खालीपन को भरना है, जिसे नीतीश ने छोड़ा है। ‘पलटूराम’ की राजनीति से बचने के लिए भाजपा ने निशांत कुमार को साथ लेने की रणनीति बनाई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थाई समाधान केवल जेडीयू का भाजपा में विलय हो सकता है।
विलय से भाजपा को सवर्ण मतदाताओं के साथ ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोयरी) समीकरण और ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) का वोट बैंक एक साथ मिल जाएगा। हालांकि, इसका जोखिम भी है। जो मतदाता नीतीश कुमार के कारण एनडीए के साथ रहते हैं, वे विलय के बाद विपक्ष की तरफ मुड़ सकते हैं। ऐसे में भाजपा फिर से कबीर के ‘धीरे-धीरे’ वाले सूत्र पर ही चलने को मजबूर है, ताकि बिहार की सत्ता पर उसका दबदबा न केवल बने रहे, बल्कि वह और मजबूत भी हो।
























