दुनिया का अनोखा मंदिर, विभीषण की पूजा और होलिका दहन की अनोखी परंपरा

5000 वर्ष पुराना मंदिर अपनी अनोखी मान्यता (फाइल फोटो)

संध्या समय न्यूज


राजस्थान के कोटा जिले के ऐतिहासिक कस्बे कैथून में स्थित एक 5000 वर्ष पुराना मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और रहस्यमयी इतिहास के कारण चर्चा में है। यह दुनिया का इकलौता मंदिर है जहां रावण के भाई विभीषण की पूजा होती है। इस मंदिर की खासियत सिर्फ विभीषण की मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां होलिका दहन के बाद हिरण्यकश्यप के पुतले को जलाने की अनूठी परंपरा भी है, जो देश में कहीं और नहीं देखी जाती।

हिरण्यकश्यप के पुतले का होता है दहन

आमतौर पर होली पर होलिका दहन किया जाता है, लेकिन कैथून में इसके बाद की परंपरा बेहद रोचक है। मान्यता है कि जब होलिका जल गई थी, तो क्रोधित हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए दौड़ा था। तब भगवान विष्णु ने उसका वध कर अपने भक्त की रक्षा की थी। इसी घटना को याद करते हुए यहां होलिका दहन के दूसरे दिन यानी धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है। हाल ही में राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने इस मेले के दौरान आतिशबाजी के बीच हिरण्यकश्यप के पुतले को अग्नि को समर्पित किया।

सिर्फ धड़ का ऊपरी हिस्सा दिखता है

मंदिर में स्थापित विभीषण की प्रतिमा भी कम आकर्षण का केंद्र नहीं है। यहां मूर्ति का केवल धड़ से ऊपर का भाग ही दिखाई देता है, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाता है। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1770 से 1821 के बीच महाराव उम्मेदसिंह प्रथम ने करवाया था।

कैसे बना यह मंदिर?

इस मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कहानी है। कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद भगवान शिव ने मृत्युलोक की सैर की इच्छा जताई। विभीषण ने शिव और हनुमान को कांवड़ पर बिठाकर यात्रा शुरू की। शिवजी ने शर्त रखी थी कि जहां कांवड़ जमीन को छुएगी, यात्रा वहीं समाप्त होगी।

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कैथून पहुंचते समय विभीषण का पैर जमीन पर पड़ गया और कांवड़ नीचे आ गई। इस तरह यात्रा यहीं खत्म हुई। कांवड़ का एक सिरा 12 किलोमीटर दूर चौरचौमा और दूसरा कोटा के रंगबाड़ी में गिरा। इसके बाद जहां विभीषण का पैर पड़ा, वहां विभीषण मंदिर, चौरचौमा में शिव मंदिर और रंगबाड़ी में हनुमान मंदिर की स्थापना हुई।

मंत्री ने कहा- धर्म का साथ देना सीखो

विभीषण मेले के उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि विभीषण जी परम धर्मात्मा थे। उन्होंने अपने भाई रावण का साथ छोड़कर धर्म के पथ पर चलते हुए प्रभु श्री राम का साथ दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मेले हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं और समाज में आपसी मेल-जोल बढ़ाने का काम करते हैं।

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