बदलते जमाने में भी बरकरार है पहाड़ी संस्कृति

संवत्सर सुनाने की परंपरा जो बताती है सालभर का हाल (फाइल फोटो)

संध्या समय न्यूज


Uttarakhand News : उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों में चैत्र मास का आगमन केवल बसंत के आगमन का संकेत नहीं है, बल्कि यहां की आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति में यह पूरे वर्ष के भाग्यफल और कृषि योजनाओं का आधार माना जाता है। यहां आज भी ‘संवत्सर सुनाने’ की परंपरा अपनी मौलिक पहचान बनाए हुए है, जिसके आधार पर ग्रामीण अपनी खेती और नववर्ष की तैयारियां करते हैं।

प्रकृति का यह ‘मौसम विभाग’

आज के आधुनिक युग में जहां मौसम विभाग अपने फोरकास्ट (पूर्वानुमान) के लिए उपग्रह और तकनीक का सहारा लेता है, वहीं पहाड़ों की यह परंपरा पूर्वजों के गहन अध्ययन और खगोलीय गणनाओं पर आधारित है। गांव के विद्वान पंडित संवत्सर के दौरान पूरे साल के मौसम, बारिश की स्थिति, खगोलीय गतिविधियों और राशियों के हाल का विस्तार से वर्णन करते हैं।
पहले के समय में जब न तो संचार के आधुनिक साधन थे और न ही मौसम विज्ञान की सटीक जानकारी, तब यह परंपरा पहाड़ी समाज के लिए एक विश्वसनीय गाइड का काम करती थी। ग्रामीण इसी के आधार पर यह तय करते थे कि कौन सी फसल बोनी है और किस समय खेती के लिए माहौल अनुकूल रहेगा।

बारिश और फसल का सटीक अनुमान

संवत्सर सुनाने के दौरान गांव के लोग एक जगह एकत्र होते हैं और बड़ी गंभीरता से पंडित जी द्वारा कही जाने वाली बातों को सुनते हैं। इसमें विशेष रूप से बताया जाता है कि इस साल इंद्र देव (वर्षा) मेहरबान रहेंगे या नहीं, किस अनाज की पैदावार अच्छी होगी, और किन राशियों वाले लोगों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। बुजुर्गों का मानना है कि पंचांग में कही गई बातें अक्सर धरातल पर सच साबित होती थीं, जिससे किसान अपने बड़े फैसले आसानी से ले पाते थे।

यह भी पढ़ें : पीएम मोदी पर केजरीवाल का सीधा हमला

आधुनिकता बनाम परंपरा

आज वक्त बदल चुका है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस दौर में सूचनाओं की बाढ़ आ गई है। हर कोई अपनी राय रखने लगा है, जिससे कई बार सही जानकारी के बजाय भ्रम और अंधविश्वास फैलने की संभावना बढ़ गई है। इस शोर-शराबे में परंपरा की असली अहमियत कहीं न कहीं धुंधली पड़ रही है। युवा पीढ़ी जब खुद को ज्ञानी समझने लगती है, तो पुरानी परंपराओं और विद्वानों पर विश्वास करना उनके लिए थोड़ा मुश्किल हो जाता है।

बुजुर्गों का भरोसा, पंचांग ही है सहारा

इस बदलाव के बीच भी गांव के बुजुर्ग इस परंपरा से जुड़े हैं। गांव की बुजुर्ग महिला पार्वती देवी कहती हैं, “पुराने समय में पंडित जी जो भी बताते थे, वह काफी हद तक सही निकलता था। हम अपनी बोनी (बुवाई) और कटाई तक की योजना उसी पंचांग के अनुसार बनाते थे। भले ही आज लोग इंटरनेट पर यकीन करते हों, लेकिन हमारे लिए यह परंपरा हमारी पहचान और संस्कृति का हिस्सा है।”

तकनीक के दौर में भी बरकरार है महत्व

भले ही आज विज्ञान और तकनीक का दौर है, लेकिन पहाड़ों में संवत्सर सुनाने की गूंज आज भी कम नहीं हुई है। यह परंपरा यह बताती है कि प्रकृति और सितारों की चाल को समझने में हमारे पूर्वजों का ज्ञान कितना गहरा और सटीक था। आधुनिकता के बीच भी यह परंपरा पहाड़ों की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है।

Sandhya Samay News

संध्या समय न्यूज़ – आपके विश्वास की आवाज़ संध्या समय न्यूज़ की स्थापना वर्ष 2018 में की गई, जो कि MSME में विधिवत रूप से पंजीकृत है। हमारा उद्देश्य समाज तक सटीक, निष्पक्ष और भरोसेमंद समाचार पहुँचाना है। हम देश-प्रदेश की ताज़ा खबरों, सामाजिक मुद्दों, और जनहित से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों को आपके सामने सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करते हैं। हम अपने सभी दर्शकों और पाठकों का दिल से आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने हमें लगातार देखा, समझा और अपना विश्वास बनाए रखा। आपकी यही सराहना और समर्थन हमें और बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। संध्या समय न्यूज़ हमेशा सत्य, निष्पक्षता और जनसेवा के मूल्यों पर कार्य करता रहेगा।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now