Kerala Peruviruthy Malanada Temple: जब भी हम महाभारत का जिक्र सुनते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले नाम आता है कौरवों के बड़े भाई और महाकाव्य के सबसे बड़े खलनायक—दुर्योधन का। हिंदू धर्मशास्त्रों और लोककथाओं में उन्हें षड्यंत्र, अहंकार और अधर्म का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत के किसी कोने में दुर्योधन को ईश्वर के रूप में पूजा जा सकता है? और वह भी इस कदर कि सरकारी रिकॉर्ड में उनके नाम पर जमीन का टैक्स भरा जाए? आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।
केरल के पोरुवाझी में दुर्योधन हैं ‘अप्पुप्पा’ (दादा)
केरल के कोल्लम जिले के पोरुवाझी गांव में स्थित ‘पेरुविरुथी मालानाडा मंदिर’ की कहानी किसी जादू से कम नहीं है। यहां के स्थानीय निवासियों के लिए दुर्योधन कोई खलनायक नहीं, बल्कि एक उदार, दयालु और न्यायप्रिय शासक हैं। ग्रामीण उन्हें बहुत प्यार से ‘अप्पुप्पा’ कहते हैं, जिसका मलयालम में अर्थ होता है ‘दादा’। यह लगाव उस कदर है कि सदियों से चली आ रही परंपरा आज भी कायम है।
सरकारी फाइलों में जमीन का मालिक है दुर्योधन
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मंदिर की लगभग 15 एकड़ जमीन आधिकारिक तौर पर दुर्योधन के नाम पर पंजीकृत है। जब भी केरल सरकार का राजस्व विभाग इस भूमि का वार्षिक लैंड टैक्स वसूलता है, तो टैक्स की रसीद में संपत्ति के मालिक के नाम के सामने साफ-साफ ‘दुर्योधन’ लिखा होता है। भारत में धार्मिक संस्थानों को इनकम टैक्स में छूट मिल सकती है, लेकिन लैंड टैक्स से कोई नहीं बच सकता। ऐसे में एक पौराणिक चरित्र के नाम पर सरकारी खजाने में टैक्स जमा होना भारतीय प्रशासनिक इतिहास का एक अद्भुत और जीवंत उदाहरण है।
परंपरा के पीछे की कहानी: अज्ञातवास के दौरान का कनेक्शन
अब सवाल उठता है कि आखिर केरल दुर्योधन से कैसे जुड़ गया? स्थानीय मान्यताओं और पुरानी कथाओं के अनुसार, यह कनेक्शन महाभारत के उस समय से है जब पांडव अज्ञातवास (गुप्त निवास) में थे। कहा जाता है कि पांडवों की तलाश में दुर्योधन अपने सैनिकों और साथियों के साथ दक्षिण भारत की ओर निकल पड़े थे। उस दौरान आज के केरल के घने जंगलों से गुजरते हुए वे बहुत थक गए और उन्हें तीव्र प्यास लगने लगी। तभी वहां ‘कुरुवा’ समुदाय की एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें ताड़ी (पाम वाइन) पिलाई।
सबसे बड़ी बात यह थी कि उस युग में जातिगत भेदभाव का बोलबाला था, लेकिन दुर्योधन ने एक आदिवासी/ग्रामीण महिला के हाथों से बिना किसी संकोच के ताड़ी पी ली। उनके इस जातिवाद-रहित और समानता पर आधारित फैसले ने स्थानीय लोगों के दिलों में उनके लिए गहरा सम्मान जगा दिया। कहा जाता है कि ग्रामीणों की इस दयालुता और अतिथिसत्कार से इतना प्रभावित हुए कि दुर्योधन ने उनके कल्याण और समृद्धि के लिए वहां की कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा दान कर दिया, जो आज भी उनके नाम पर है।
मूर्तिपूजा नहीं, ‘गदा’ ही है आस्था का केंद्र
मंदिरों की बात करें तो हमारे दिमाग में भव्य इमारतें और सुंदर मूर्तियां आती हैं। लेकिन पोरुवाझी पेरुविरुथी मालानाडा मंदिर इस मामले में भी बेहद अलग है। यहां दुर्योधन की कोई मूर्ति नहीं है। मंदिर के गर्भगृह में एक ऊंचा मंच (पीठ) बना हुआ है, जिस पर दुर्योधन की गदा (मुंडक/गदा) विराजमान है। भक्त इसी मंच के सामने जाकर अपनी प्रार्थना करते हैं। यहां कोई ढोंग नहीं है, सिर्फ सीधी और सादी आस्था है।
प्रसाद में मिलती है शराब (ताड़ी)
भारत के ज्यादातर मंदिरों में प्रसाद के रूप में मिठाई, फल या खीर बांटी जाती है, लेकिन इस मंदिर की परंपरा अपने आप में अनूठी है। यहां दैनिक प्रसाद के रूप में ‘ताड़ी’ (शराब) चढ़ाई जाती है और भक्तों को बांटी भी जाती है।
यह प्रथा सीधे तौर पर उसी पौराणिक घटना से जुड़ी है, जब बुजुर्ग महिला ने प्यासे दुर्योधन को ताड़ी पिलाई थी। आज भी यहां ताड़ी को दुर्योधन की पसंदीदा चीज मानकर उन्हें अर्पित किया जाता है। भले ही आधुनिक काल में शराब पर कई तरह के प्रतिबंध हों, लेकिन इस मंदिर की धार्मिक परंपरा को इसके लिए विशेष छूट प्राप्त है।
























