UP News: उत्तर प्रदेश के कानपुर में पुलिस ने साइबर अपराधियों के एक बेहद चौंकाने वाले तरीके का खुलासा किया है। आमतौर पर लोग खराब या बेकार पड़े मोबाइल फोन को कबाड़ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन साइबर ठग इन्हीं डिवाइसों का इस्तेमाल अपने अपराधों के लिए कर रहे हैं।पुलिस के अनुसार, ये संगठित गिरोह पुराने और खराब मोबाइल फोन को ठीक कर उनका उपयोग फर्जी कॉल, ऑनलाइन ठगी और अन्य साइबर अपराधों में कर रहा था। इस मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए पुलिस ने 20 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया है।
कैसे चलता था गिरोह का नेटवर्क?
पुलिस की जांच में सामने आया है कि मोहल्लों में फेरी लगाकर पुराने सामान के बदले बर्तन या अन्य चीजें देने वाले कबाड़ी, लोगों से उनके खराब और पुराने मोबाइल फोन इकट्ठा करते थे। इन फोनों को बाद में एक संगठित साइबर ठगी गिरोह तक पहुंचाया जाता था। यहां ठग इन कबाड़ फोनों से काम के पार्ट्स निकालकर ‘कस्टमाइज्ड मोबाइल’ तैयार करते थे, जिनका इस्तेमाल सीधे लोगों को निशाना बनाने और साइबर फ्रॉड को अंजाम देने में किया जाता था।
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20 अपराधी गिरफ्तार, भारी मात्रा में डिवाइस बरामद
कानपुर पुलिस ने इस नेटवर्क से जुड़े 20 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया है। इनके कब्जे से 17 एंड्रॉयड फोन, 4 कीपैड फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बरामद किए गए हैं। जब पुलिस ने इन डिवाइसों की तलाशी ली, तो पता चला कि इनमें से अधिकतर मोबाइल कबाड़ के पार्ट्स से जोड़कर बनाए गए थे। एजेंटों के जरिए इन कस्टम फोन को ठगों तक पहुंचाया जाता था, जिनकी बाजार में कीमत 5 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक होती थी। ठग इन्हीं फोन का इस्तेमाल कर कॉल, मैसेज या अन्य डिजिटल माध्यमों से लोगों को लूटते थे।
निजी डेटा भी रहा खतरे में
साइबर विशेषज्ञों ने एक और बड़ा खतरा बताया है। पुराने मोबाइल की मेमोरी में अक्सर डेटा पूरी तरह से डिलीट नहीं हो पाता। ठग आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से इस डेटा को रिकवर कर लेते हैं और फिर उसी निजी जानकारी (जैसे फोटो, कॉन्टैक्ट्स) का इस्तेमाल लोगों को ब्लैकमेल करने या ठगी का जाल बिछाने में करते हैं।
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पुलिस की चेतावनी और विशेषज्ञों की राय
एडीसीपी सुमित रामटेके ने इस खुलासे पर चिंता जताते हुए लोगों से अपील की है कि वे अपने पुराने मोबाइल फोन कभी भी फेरी वालों या कबाड़ी को बिना सावधानी के न दें। साइबर विशेषज्ञ अमित शर्मा के अनुसार, ठग इन कस्टम फोन में वीपीएन (VPN) और वर्चुअल मोबाइल नंबर देने वाले ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी असली लोकेशन का पता लगाना नामुमकिन हो जाता है। साथ ही, कुछ डिवाइस में एक साथ कई सिम कार्ड लगाने की सुविधा होती है, जिससे IMEI नंबर को ट्रेस करना भी बेहद चुनौतीपूर्ण बन जाता है।



























