Stock Market: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान पर “बहुत जोरदार” हमले के संकेत ने गुरुवार को घरेलू शेयर बाजार को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया। बुधवार को 1.5 फीसदी की जबरदस्त तेजी के बाद आज बाजार ने अपने इस फायदे को पूरी तरह उड़ा दिया और खुलते ही धड़ाम हो गया। ट्रंप के बयान के बाद ग्लोबल मार्केट में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के दाम 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार पर दिखा।
सेंसेक्स-निफ्टी का तड़का
सुबह 09:16 बजे के करीब शेयर बाजार के आंकड़े कुछ भी राहत नहीं दे रहे थे। बीएसई का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 1,385.82 अंक यानी 1.89 प्रतिशत की भारी गिरावट के साथ 71,748.50 के स्तर पर ट्रेड कर रहा था। वहीं, एनएसई का निफ्टी 50 भी 426.40 अंक (1.88%) लुढ़ककर 22,253.00 पर आ गया।
बाजार के अंदरूनी हालातों पर नजर डालें तो मंदी का दौर साफ दिख रहा था। आज कारोबार में मात्र 566 शेयरों में हरे निशान की बढ़त देखने को मिली, जबकि 1823 शेयर लाल निशान के साथ धड़ाम हुए। इसके अलावा 130 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

ट्रंप की ‘वॉर रhetoric’ ने बिगाड़ा खेल
मार्केट में आई इस भारी गिरावट की असल वजह डोनाल्ड ट्रंप का ताजा बयान है। ट्रंप ने ईरान संघर्ष को खत्म करने का कोई रोडमैप या समयसीमा तो नहीं बताया, लेकिन स्पष्ट धमकी दी कि अगले दो से तीन हफ्तों के भीतर अमेरिका ईरान पर “बहुत जोरदार” हमला करेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस युद्ध में वॉशिंगटन के “मुख्य रणनीतिक उद्देश्य” पूरे होने के करीब हैं।
हालांकि, युद्ध बंद होने की कोई साफ तस्वीर पेश न होने के कारण निवेशकों में भारी घबराहट फैल गई और मार्केट का पूरा सेंटीमेंट नकारात्मक हो गया।
एशिया में भी बिकवाली, क्रूड ऑयल चली ऊपर
ट्रंप की इस टिप्पणी का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। पूरे एशियाई बाजारों ने इसका कड़ा जवाब दिया और एशियाई शेयर बाजारों में लगभग 1.2% की भारी गिरावट दर्ज की गई।
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वहीं, ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले की आशंका से ग्लोबल सप्लाई चेन पर खतरे के बादल मंडराने लगे। इसके चलते कच्चे तेल के दामों में आग लग गई और इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल ब्रेंट 105 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर को छू गया।
निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?
भारत जैसे देश के लिए कच्चे तेल का 105 डॉलर का पार करना बुरी खबर है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। तेल के दाम बढ़ने से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है, महंगाई (इन्फ्लेशन) बढ़ती है और रुपये में कमजोरी आती है। इसी डर से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भी बिकवाली का रुख अपनाया है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगले कुछ सत्रों तक बाजार की दिशा ईरान-अमेरिका टेंशन और कच्चे तेल की कीमतों को तय करेंगी। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे अभी ज्यादा लीवरेज लेने से बचें और अपने पोर्टफोलियो में हेजिंग (सुरक्षा) का ध्यान रखें।



















