The Untold History of the Harmonium: आज अगर आप किसी मंदिर, गुरुद्वारे, दरगाह या किसी शास्त्रीय संगीत की महफिल में जाएंगे, तो वहां एक ध्वनि ऐसी होगी जो इन सभी जगहों की रूह है—वह है हारमोनियम की सुरीली आवाज़. भारतीय संगीत के इस अभिन्न हिस्से को लेकर आम धारणा यह है कि यह किसी भारतीय ऋषि या संगीतज्ञ ने बनाया होगा। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है।
जिस वाद्ययंत्र को आज हम अपनी संस्कृति का प्रतीक मानते हैं, उसके पीछे का सफर विदेशी मूल, सामाजिक कलंक और लंबे सरकारी वनवास से भरा हुआ है। आइए जानते हैं, कैसे एक यूरोपीय वाद्ययंत्र ने भारत में आकर ‘संगीत का शहंशाह’ बनने का दर्जा हासिल किया।
यूरोप की धरती पर जन्मा भारतीय संगीत का ‘शहंशाह’
हारमोनियम की कहानी भारत नहीं, बल्कि 17वीं सदी के यूरोप से शुरू होती है। शुरुआती दौर में यह काफी लोकप्रिय हुआ, लेकिन कुछ समय बाद ही पश्चिमी देशों में इसका चलन बंद होने लगा और यह गुमनामी के अंधेरे में चला गया। फिर साल 1840 में फ्रांस के एक व्यक्ति अलेक्जेंड्रे डेबेन ने इसे नई रूपरेखा दी और इसका पेटेंट कराया। उन्होंने ही इसे आधिकारिक रूप से ‘हारमोनियम’ नाम दिया। 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश और अन्य विदेशी व्यापारियों के माध्यम से यह यंत्र भारतीय तट पर कदम रखा।
द्वारकानाथ घोष ने बदली इसकी किस्मत
जब हारमोनियम भारत आया, तो वह आज जैसा हल्का और पोर्टेबल नहीं था। यह एक बेहद भारी और बड़ा पेटीनुमा वाद्ययंत्र था, जिसे ईसाई चर्चों में बजाया जाता था। इसे चलाने के लिए पैरों से पंप मारना पड़ता था। साल 1875 में कोलकाता की ‘द्वारकिन एंड सन्स’ कंपनी के मालिक द्वारकानाथ घोष ने इसमें एक क्रांतिकारी बदलाव किया। उन्होंने पैरों वाले पंप को हटाकर एक हाथ से चलने वाला बेलो (Bellows) लगाया और इसका आकार छोटा कर दिया। अब इसे उठाकर कहीं भी जाया जा सकता था। लेकिन तब तक इसे कोई इज्जत नहीं मिली थी। शुरुआती दौर में लोग इसे अपमानजनक लहजे में ‘पेटी’, ‘बाजा’ या सबसे निचले स्तर पर ‘तवायफखाने का दाग’ कहकर पुकारते थे।
रंगमंच ने दिए परोपकार से लोकप्रियता की बुलंदियां
द्वारकानाथ घोष के इस नए अवतार ने जल्द ही भारतीय कलाकारों का दिल जीत लिया। इसे बजाना सीखना इतना आसान था कि नए संगीतज्ञ भी इसमें घंटों में महारत हासिल कर लेते थे। 19वीं सदी के अंतिम दौर में पारसी और मराठी रंगमंच ने इसे अपनाया, तो इसकी किस्मत बदल गई। नाटकों में बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए यह सबसे बेहतरीन विकल्प बन गया। दिलचस्प बात यह है कि जिस यूरोप में यह बाजा खत्म हो चुका था, 1915 तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हारमोनियम निर्माता देश बन चुका था।
टैगोर और गांधी के विरोध ने रोकी रफ्तार
1939 के आसपास हारमोनियम के खिलाफ एक बड़ा विरोध शुरू हुआ। शास्त्रीय संगीत के पुरोधाओं का कहना था कि हारमोनियम में ‘मींड’ (स्वरों के बीच की चलाव) और शुद्ध ‘श्रुति’ नहीं निकाली जा सकती, जिससे भारतीय गायकी की बारीकियां खत्म हो रही हैं। वहीं, महात्मा गांधी के ‘स्वदेशी आंदोलन’ के दौरान इसे विदेशी उत्पाद मानकर नफरत की नज़र से देखा गया।
इस मुहिम में सबसे अहम मोड़ तब आया जब 19 जनवरी 1940 को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के कोलकाता निदेशक को एक कड़ा पत्र लिखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने शांतिनिकेतन से इसे निकाल दिया है और रेडियो पर इसके उपयोग पर तुरंत प्रतिबंध लगाना भारतीय संगीत का सबसे बड़ा सेवा कार्य होगा।
40 साल का लंबा और दर्दनाक ‘वनवास’
टैगोर और अन्य दिग्गजों के दबाव में ब्रिटिश सरकार ने 1 मार्च 1940 को एक ऐतिहासिक सर्कुलर जारी कर दिया। ऑल इंडिया रेडियो पर हारमोनियम को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया। नियम इतने सख्त थे कि कोई भी कलाकार रेडियो स्टेशन के अंदर इस बाजे से रियाज़ तक नहीं कर सकता था। स्टेशनों में मौजूद सभी हारमोनियम्स को नीलामी के लिए रख दिया गया।
सन् 1947 में भारत आज़ाद हो गया, लेकिन हारमोनियम का यह वनवास जारी रहा। 1962-63 में जब बी.जी. रेड्डी सूचना मंत्री बने, तो कलाकारों ने पुणे में उनका घेराव किया, लेकिन सरकार नहीं मानी। हालांकि, 1970 में एक समझौता हुआ जिसमें ‘टॉप ग्रेड’ के कलाकारों को रेडियो पर इसे बजाने की छूट दी गई।
जीत हुई संगीत की
लंबे संघर्ष और जनता के बीच इसके बढ़ते प्रेम को देखते हुए आखिरकार 18 अप्रैल 1980 को ऑल इंडिया रेडियो ने अपने राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन के जरिए ऐलान किया कि हारमोनियम पर से सभी तरह के प्रतिबंध हटा लिए गए हैं।
यह 40 साल का सफर हारमोनियम के लिए कठिन ज़रूर था, लेकिन इन चार दशकों में भारत की गलियों, मंदिरों और घरों में इसकी धुन कभी कम नहीं हुई। आज यह वाद्ययंत्र अपने विरोधियों को पीछे छोड़कर भारतीय संगीत की एक ऐसी पहचान बन चुका है, जिसे कोई भी अलग नहीं कर सकता।
























