Matchstick History: खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के कारण एलपीजी (LPG) की आपूर्ति प्रभावित होने के बीच, एक ऐसे आविष्कार पर नज़रें टिक गई हैं, जो आधुनिक समय में आम ज़रूरत बन चुका है। हम बात कर रहे हैं ‘माचिस’ की। जब गैस सिलेंडर की किल्लत या सप्लाई में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, तो इंसान के इतिहास के इस सबसे आसान लेकिन असरदार आविष्कार को याद करना स्वाभाविक है। आइए, जानते हैं कि आखिर कैसे बनी थी यह छोटी सी तीली और किसकी लगन ने इसे दुनिया भर की ज़रूरत बनाया।
संयोग से हुआ था आविष्कार
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि माचिस की तीली का आविष्कार किसी भीषण विज्ञान प्रयोग या सोच-समझकर चलाए गए मिशन का नतीजा नहीं था, बल्कि यह एक इत्तेफाक (संयोग) था। सन् 1826 में ब्रिटिश केमिस्ट जॉन वॉकर (John Walker) अपनी प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि लकड़ी की एक तीली पर लगा केमिकल का मिश्रण, जब अनजाने में किसी खुरदरी सतह पर रगड़ा गया, तो उसमें अचानक आग लग गई। इसी अनपेक्षित प्रतिक्रिया ने दुनिया को पहली ‘फ्रिक्शन मैच’ (friction match) दी।
खतरनाक शुरुआत और सुरक्षा की दिशा में कदम
माचिस का यह शुरुआती रूप बहुत ही खतरनाक माना जाता था। उन तीलियों से अक्सर अचानक चिंगारियां निकलती थीं और उनसे तेज बदबू भी आती थी। कभी-कभी तो थोड़ी सी रगड़ से ही वे अनियंत्रित हो जाती थीं, जिससे आग लगने की आशंका बनी रहती थी। इस समस्या का समाधान साल 1844 में आया। स्वीडिश केमिस्ट गुस्ताफ एरिक पाश (Gustaf Erik Pasch) ने एक बड़ी सफलता हासिल की और ‘सेफ्टी मैच’ (Safety Match) पेश की।
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पाश ने एक अहम बदलाव किया। उन्होंने माचिस की तीली के सिरे पर लगे केमिकल और उसे रगड़ने वाली सतह (माचिस के डिब्बे की बाहरी सतह) के केमिकल को अलग-अलग कर दिया। इससे यह सुनिश्चित हो गया कि माचिस तभी जलेगी, जब उसे डिब्बे की उस विशेष सतह पर ठीक से रगड़ा जाएगा। इस खोज ने माचिस को काफी सुरक्षित बना दिया।
भारत में देर से पहुंची माचिस
जहां यूरोप में माचिस की तीलियां 19वीं सदी में ही आम हो चुकी थीं, वहीं भारत में इसके उत्पादन की शुरुआत काफी देर से हुई। देश में माचिस की पहली फैक्ट्री सन् 1921 में कोलकाता में लगाई गई थी। इससे पहले, भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए स्वीडन और जापान जैसे देशों से होने वाले आयात पर भारी निर्भरता के साथ जी रहा था।
बदल गया जीने का तरीका
माचिस की तीलियों ने इंसानों के आग जलाने के पारंपरिक तरीकों को हमेशा के लिए बदल दिया। इसने आग जलाने की प्रक्रिया को तेज़, साथ ले जाने लायक और आसानी से उपलब्ध बना दिया। चाहे चूल्हा जलाना हो या अंधेरे में मोमबत्तियां जलाना, यह छोटा सा आविष्कार रोजमर्रा की जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया।
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आज भी है अहम
आज के दौर में गैस लाइटर और बिजली से चलने वाले उपकरणों का आगमन हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद माचिस की तीलियां अपनी सादगी और भरोसेमंद होने की वजह से आज भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं। यह न सिर्फ सस्ती है, बल्कि बिजली या इलेक्ट्रॉनिक साधनों के न होने पर भी यह अपनी उपयोगिता साबित करती है।























