PM Modi’s Dussehra message:विजयादशमी के अवसर पर दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन में आयोजित रावण दहन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान राम के आदर्शों, राष्ट्रहित और विकसित भारत के लक्ष्य पर बात की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि कठिनाइयां कितनी भी बड़ी हों, दृढ़ संकल्प, अपनी क्षमता पर भरोसा और सामूहिक प्रयास से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा है कि समुद्र सामने था, लंका दूर थी, लेकिन संकल्प अडिग था। उनके मुताबिक, भगवान राम ने जनशक्ति को एकजुट किया, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया और जनभागीदारी को अपनी ताकत बनाया। यही सफलता का मूलमंत्र है—अपनी शक्ति पर विश्वास, सामर्थ्य पर भरोसा, संसाधनों का उचित इस्तेमाल और लक्ष्य के प्रति अटूट संकल्प।
राम के जीवन से मिलती है कठिनाइयों का सामना करने की सीख
‘सियावर रामचंद्र की जय’ के उद्घोष के साथ संबोधन शुरू करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत में हजारों वर्षों से भगवान राम की उपासना की जाती रही है। राम का महत्व केवल रावण पर विजय तक सीमित नहीं है; उनका जीवन मानवता को आदर्श और मर्यादा का मार्ग भी दिखाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भगवान राम ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन सत्य और नेकी का रास्ता नहीं छोड़ा। उनके अनुसार, राम ने राजपाट मिलने पर अहंकार नहीं किया और वनवास मिलने पर अपना धर्म नहीं छोड़ा। हर संकट के बीच उन्होंने मर्यादा का पालन किया और सत्य की स्थापना के लिए काम किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रसंग को आज के जीवन से जोड़ते हुए कहा कि चुनौती सामने आने पर दूसरों के भरोसे बैठने के बजाय व्यक्ति को अपना सामर्थ्य पहचानना चाहिए। अपने संसाधनों पर विश्वास और लगातार परिश्रम से समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए।
रामराज्य का अर्थ: न्याय, समान अवसर और जनकल्याण
अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामराज्य को सुशासन का आदर्श बताया। उन्होंने कहा कि राम के अयोध्या लौटने के बाद स्थापित शासन आज भी अच्छे प्रशासन की कसौटी माना जाता है। उनके मुताबिक, रामराज्य का अर्थ ऐसा शासन है जहां किसी के साथ भेदभाव न हो, सभी को न्याय मिले और हर व्यक्ति को आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हों।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि सत्ता का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनकल्याण होना चाहिए। इस विचार को स्पष्ट करते हुए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई—“दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज नहीं काहुहि व्यापा”—का उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता को जनार्दन मानने और “नागरिक देवो भवः” की भावना से काम करने की बात कही। उन्होंने गरीब और वंचित वर्ग की सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का संदेश भी दिया।
जनभागीदारी को बताया सफलता की ताकत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन का प्रमुख संदेश यह रहा कि किसी बड़े लक्ष्य को पाने के लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं होती। उसके लिए योजना, उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग और लोगों की भागीदारी जरूरी है। रामायण में समुद्र पार करने की चुनौती का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम ने जनता की सामूहिक शक्ति को जगाया और सबको एक उद्देश्य से जोड़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि रास्ते की कठिनाइयां यात्रा को रोक नहीं सकतीं, यदि संकल्प मजबूत हो। यह संदेश उन्होंने देश के वर्तमान लक्ष्यों से भी जोड़ा। उनके अनुसार, भारत के सामने विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य है। जनशक्ति को जनकल्याण से जोड़ते हुए लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना देश की प्राथमिकता होनी चाहिए।
राष्ट्र प्रथम और एकता का आह्वान
अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रहित के लिए राजनीतिक दलों और नागरिकों से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश के मान-सम्मान को चोट पहुंचाने वाली ताकतें, समाज को बांटने वाले लोग और भारतीय संस्कृति से नफरत करने वाली मानसिकता देश के लिए चुनौती हैं।
उन्होंने विजयादशमी के अवसर पर लोगों से मां भारती के शत्रुओं को पहचानने, उनका सामना करने और “राष्ट्र प्रथम” के संकल्प के साथ आगे बढ़ने का आग्रह किया। अपने संबोधन के समापन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान व्यक्त “राम से राष्ट्र और देव से देश” की संकल्पना का उल्लेख किया। उन्होंने विश्वास जताया कि देश इस विचार को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दशहरा भाषण का संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दशहरा भाषण का केंद्रीय विचार भगवान राम के जीवन से प्रेरणा लेकर कठिन परिस्थितियों में भी लक्ष्य पर टिके रहना था। उनके संदेश में संकल्प, आत्मविश्वास, सुशासन, जनभागीदारी और राष्ट्रहित जैसे विषय प्रमुख रहे। समुद्र और लंका के प्रसंग के जरिए उन्होंने बताया कि बड़ी चुनौती का समाधान सामूहिक प्रयास, उपलब्ध साधनों के सही इस्तेमाल और अडिग इच्छाशक्ति से निकल सकता है।
























