दिल्ली की सड़कों पर नीट (NEET) परीक्षा पेपर लीक और छात्रों की बौद्धिक हत्या के विरोध में उबलता युवा समाज और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग एक ऐसा वातावरण तैयार कर रही थी, जिसमें सत्ता की नींव ही हिलती नजर आ रही थी। लेकिन, जैसा कि अक्सर होता है, एक आग बुझने से पहले ही दूसरी, और भी भयावह आग ने देश के सामने अपना दर्दनाक रूप खोल दिया। केंद्र की मोदी सरकार मानो एक ऐसी डूबता जहाज बन चुकी है, जिसके छेद सिर्फ ऊपर से दिख रहे हैं, जहाज के अंदर पानी भरने का काम तो इसके अपने कर्णधार कर रहे हैं। यह छेद कोई साधारण नहीं है, बल्कि सरकारी बैंकों के खजाने को लूटकर ले जाने वाले उन महा-ठगों का जाल है, जिन्होंने 12 सालों में 7.75 लाख करोड़ रुपये की ऐसी लूट मचाई है, जिसकी कल्पना करना भी एक आम भारतीय के लिए कठिन है।
संसद में केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी द्वारा दी गई यह जानकारी किसी राजनीतिक विरोधी दल का आरोप नहीं है, बल्कि सरकार खुद के द्वारा स्वीकार की गई अपनी नाकामी है। एक लिखित जवाब के जरिए सरकार ने स्वीकार किया है कि 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के कुल 1,249 कर्जदार ऐसे हैं, जो सरकारी बैंकों के डिफॉल्टर बन चुके हैं। इनका कुल कर्ज 7.75 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें से मात्र 3.10 लाख करोड़ रुपये की ही वसूली हो पाई है। बाकी की रकम का क्या हुआ? सरकार और बैंकों ने मिलकर उसे ‘राइट ऑफ’ यानी बट्टे खाते में डाल दिया।

धोखाधड़ी भरा तर्क
यहां सरकार का एक बेहद चतुर और धोखाधड़ी भरा तर्क सामने आता है। सरकार कहती है कि ‘राइट-ऑफ’ का मतलब ‘कर्जमाफी’ नहीं होता। यह एक ऐसा जुमला है, जिसे समझने के लिए किसी आर्थिक विशेषज्ञ की जरूरत नहीं होती। जब बैंक किसी रकम को बैलेंस शीट से हटा देता है, तो उसका सीधा अर्थ यही है कि अब उस रकम की वसूली की कोई उम्मीद नहीं रही। यह रकम देश के आम जनता के टैक्स और उनकी जमा पूंजी से जुटी थी। जब कोई अमीर उद्योगपति इस पूंजी को नचाकर अपनी जेबें भर लेता है और सरकार उसे बैलेंस शीट से साफ कर देती है, तो यह कर्जमाफी से कम क्या है? यही है ढकोसलेबाजी का सबसे बड़ा प्रमाण।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि ये 1,249 महा-डिफॉल्टर आखिर हैं कौन? जिन लोगों ने देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले सरकारी बैंकों को कंगाल बना दिया, उनके नाम सार्वजनिक करने से सरकार ने साफ इनकार कर दिया है। आरबीआई (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) के अधिनियम 45 का हवाला देकर सरकार यह दलील दे रही है कि यह जानकारी ‘गोपनीय’ है। यह बात सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर किसकी गोपनीयता बचाई जा रही है? क्या उन लुटेरों की प्रतिष्ठा बचाना देश के लिए इतना जरूरी है जो करोड़ों लोगों का खून चूसने के बाद भी उन्हें सरकारी छत्र दे रही है?
बैंकों का रवैया
जब कोई आम आदमी, कोई मध्यम वर्ग का व्यक्ति, कोई छोटा कारोबारी या फिर कोई मेहनती किसान अपना घर बसाने, बच्चों की पढ़ाई या खेती के लिए कुछ लाख रुपये का कर्ज लेता है, तो उसके साथ बैंकों का रवैया कितना क्रूर हो जाता है, यह छुपा नहीं है। किस्त एक दिन रुक जाए, तो बैंक के रिकवरी एजेंट घर आकर बदतमीजी करते हैं। ऑटो लोन की किस्त न चुका पाने पर सड़क पर गाड़ी छीन ली जाती है। होम लोन डिफॉल्ट होने पर कुर्की की नोटिस चिपका दी जाती है और ताले जड़ दिए जाते हैं। किसानों के मामले में तो यह क्रूरता अपने चरम पर है। बेमौसम बारिश, सूखा या फसल खराब होने पर जब किसान बैंक का कर्ज नहीं चुका पाता, तो बैंक, सरकार और समाज का त्रिकोण उसे इतना घेर लेता है कि वह आत्महत्या करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं देखता। लाखों किसानों ने इसी बेहिसाब कर्ज के दबाव में अपनी जान दी है।
तो फिर उन हजारों करोड़ रुपये के कर्ज को डकार जाने वाले अमीर उद्योगपतियों के साथ यह न्याय क्यों नहीं दिखता? उनके आलीशान बंगलों, लग्जरी कारों, विदेशी खातों और अन्य संपत्तियों की कुर्की क्यों नहीं होती? क्या कानून सिर्फ गरीबों और मध्यम वर्ग के गले में फांसी के फंदे के रूप में लटकता है? अगर कोई छोटा कर्जदार डिफॉल्टर होता है, तो बैंक अखबारों में नाम-पते के साथ उसकी फोटो छापकर उसे सामाजिक रूप से बदनाम कर देता है। लेकिन ७.७५ लाख करोड़ की लूट मारने वाले उद्योगपतियों के नाम ‘गोपनीय’ हैं! यह दोहरा रवैया भारतीय लोकतंत्र और उसकी कानून व्यवस्था पर एक कलंक की तरह है।
कानून की आंखों में अलग-अलग
एक तरफ तो सत्ताधारी दल और सरकार दिन-रात ‘समान नागरिक संहिता’ (यूनिफॉर्म सिविल कोड) जैसे मुद्दों पर देश को उलझाने का प्रयास करती है। वे ‘एक देश, एक कानून’ के नारे लगाते हैं। लेकिन जब कानून के क्रियान्वयन की बात आती है, तो यह ‘दो भारत’ का चेहरा अकूत शर्मनाक ढंग से सामने आता है। एक भारत वह है जहां गरीब के साथ अन्याय होता है और दूसरा भारत वह है जहां अमीरों को अन्याय का आशीर्वाद मिलता है। क्या यही ‘समान कानून’ है? क्या कानून की आंखों में अलग-अलग तरह के चश्मे लगे हैं, जो कर्जदार की जेब के आकार के अनुसार रंग बदल लेते हैं?
वर्ष 2014—15 से लेकर 2025—26 तक के ये 12 साल, जो मोदी सरकार के शासनकाल के रूप में जाने जाते हैं, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘अमृत काल’ नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट घरानों के लिए ‘लूट काल’ साबित हुए हैं। सत्ता में आने से पहले भाजपा और नरेंद्र मोदी बैंकों में हो रही लूट को लेकर कांग्रेस पर जमकर हमला करते थे। ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगाए जाते थे। लेकिन जब इनकी सरकार बनी, तो लूट का स्केल इतना विशाल हो गया कि पिछले सरकारों के आंकड़े भी सामने आने पर फीके लगने लगे। सरकार ने ‘वित्तीय अनुशासन’ लाने के बड़े-बड़े दावे किए। बैंकों में सख्ती बरतने की बात कही गई। लेकिन 7.75 लाख करोड़ रुपये का ‘डूबता कर्ज’ (NPA) बता देता है कि यह वित्तीय अनुशासन किसके लिए था? शायद यह अनुशासन सिर्फ गरीबों और मध्यम वर्ग को कर्ज न चुका पाने पर सजा देने के लिए था, अमीरों को बचाने के लिए नहीं।

राजनीतिक-आर्थिक पर सवाल
यहां एक राजनीतिक-आर्थिक सांठगांठ का सवाल भी उभरता है। हजारों करोड़ रुपये के ये डिफॉल्टर क्या सत्ताधारी पार्टी के महज चंदादाता हैं? क्या मोदी सरकार ने ‘चंदा दो, कर्जमाफी लो’ जैसी कोई अनौपचारिक नीति बना रखी है? पिछले कुछ वर्षों में ‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ (चुनाव बांड) के जरिए कॉर्पोरेट घरानों द्वारा राजनीतिक दलों को दिए गए अवैध और अपारदर्शी चंदे की बातें सामने आई हैं। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक ही पैदा होती है कि क्या ये कर्जमाफी या ‘राइट-ऑफ’ उन चंदों का बदला है? जनता का पैसा बैंकों से निकालकर कॉर्पोरेट्स को दिया जाता है, कॉर्पोरेट्स उस पैसे का कुछ हिस्सा चुनावी बॉन्ड के जरिए वापस सत्ता में पहुंच जाता है। यह एक खतरनाक चक्रव्यूह है, जिसमें देश की जनता और आर्थिक व्यवस्था दोनों पिस रहे हैं।
‘अथाह कर्ज लो, थोड़ा-बहुत चुकाओ और बाकी डकार जाओ’—यह प्रवृत्ति जब सरकार की मूक सहमति और कानूनी संरक्षण से संचालित होती है, तो इसे लूट के अलावा और क्या कहा जा सकता है? जब देश का वित्तमंत्री या राज्यमंत्री संसद में खड़े होकर यह घोषणा करते हैं कि ७.७५ लाख करोड़ डूब गए, लेकिन डूबाने वालों के नाम हम नहीं बताएंगे, तो यह लोकतंत्र में जवाबदेही की मौत है। संसद किसी भी लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च संस्था है। यदि जनप्रतिनिधियों को भी यह नहीं पता कि उनके निर्वाचन क्षेत्र या देश के बैंकों को लूटने वाले कौन हैं, तो फिर यह लोकतंत्र नहीं, अवधारणात्मक तानाशाही है।
आरबीआई के अधिनियम 45 का जो हवाला दिया जा रहा है, वह भी एक बहाना मात्र है। बैंकिग विनियमन कानून में गोपनीयता का प्रावधान ग्राहकों के हितों को बचाने के लिए होता है, ताकि उनकी वित्तीय जानकारी का दुरुपयोग न हो। लेकिन जब कोई व्यक्ति या कंपनी कर्ज न चुकाकर डिफॉल्टर बन जाती है, तो उसका ‘ग्राहक’ का दर्जा समाप्त हो जाता है और वह ‘खूंखार’ अपराधी बन जाता है। एक ऐसे अपराधी की जानकारी को गोपनीय रखना, उसे दोबारा कर्ज देने का रास्ता साफ करने जैसा है। सरकार को चाहिए कि वह इस कानून में संशोधन करे और उन सभी के नाम सार्वजनिक करे जिनका कर्ज 50 करोड़ या 100 करोड़ से अधिक होकर डूब गया है।
अमीरों के भविष्य को सुरक्षित करने पर बैंकों की लूट
नीट परीक्षा का पेपर लीक होना और उसमें धांधली होना भी इसी व्यवस्था का विस्तार है। एक तरफ जहां मेहनती छात्रों के भविष्य से खिलवाद किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमीरों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बैंकों की लूट को लीगल और गोपनीय किया जा रहा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर इस्तीफे का दबाव इसलिए बना है, क्योंकि जनता यह समझ चुकी है कि जब तक संरचनागत स्तर पर भ्रष्टाचार और तानाशाही को सजा नहीं मिलेगी, तब तक कोई भी मंत्री या सरकार जवाबदेह नहीं होगी। ठीक उसी तरह, वित्त मंत्रालय को भी इस ७.७५ लाख करोड़ की लूट का जवाब देना होगा।
भारत के सरकारी बैंक आम भारतीय की भरोसा की नींव हैं। गांव-गांव में जो छोटी-छोटी बचतें होती हैं, वह इन्हीं बैंकों में जमा होती हैं। जब कोई किसान अपनी फसल का पैसा, कोई मजदूर अपनी मेहनत की कमाई, और कोई सरकारी कर्मचारी अपनी पेंशन बैंक में जमा करता है, तो उसे यह विश्वास होता है कि उसका पैसा सुरक्षित है। लेकिन जब यह पता चलता है कि उनकी इस कमाई को बिना किसी डर के कुछ चुनिंदा ‘महा-ठग’ उड़ा रहे हैं और सरकार उन्हें संरक्षण दे रही है, तो बैंकिंग प्रणाली के प्रति जनता का विश्वास टूटना लाजमी है। यदि यह विश्वास टूटा, तो देश की अर्थव्यवस्था का चक्रव्यूह बुरी तरह टूट जाएगा।
देश की आम जनता को यह पूरी तरह से स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उनके खून-पसीने की कमाई को लूटने वाले ये उद्योगपति आखिर हैं कौन? क्या वे उद्योगपति जो अखबारों और टीवी चैनलों पर ‘इन्वेस्ट इन इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ के ब्रांड एम्बेसडर बनकर घूमते हैं, वास्तव में देश के सबसे बड़े डकैत हैं? क्या वे लोग जो डेवोस जैसे वैश्विक मंचों पर भारत की तारीफ करते हुए नजर आते हैं, वापस आकर भारतीय बैंकों को लूट रहे हैं?
सरकार को यह समझना होगा कि ‘अमृत काल’ का नारा लगाने से कुछ नहीं होता। असली अमृत काल वह होगा जब 1.249 डिफॉल्टरों के नाम जनता के सामने रखे जाएंगे, उनकी संपत्तियों की कुर्की होगी, उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा और जनता का हर एक पैसा वसूल कर बैंकों को लौटाया जाएगा। जब तक यह नहीं होता, तब तक नीट की तरह इस आर्थिक धांधली के खिलाफ भी देश का युवा और जनता सड़कों पर उतरेगी।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यदि इस महा-घोटाले के आरोपियों के नाम छिपाने की नीति जारी रही, तो यह सिर्फ सरकारी बैंकों की हार नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और उसकी कानून व्यवस्था की कलई खुलेगी। एक ऐसे देश में, जहां ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे दिए जाते हों, लेकिन विकास का फायदा सिर्फ कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों को मिले और उनके नुकसान का बोझ आम जनता पर थोप दिया जाए, वहां सरकार को जनता के गुस्से का सामना करना ही पड़ेगा। ७.७५ लाख करोड़ रुपये का यह अंधेरा सिर्फ आंकड़ों का अंधेरा नहीं है, यह उस सिस्टम का अंधेरा है जो गरीबों को सबक सिखाता है और अमीरों को लूटने का लाइसेंस देता है। यह डूबता जहाज तभी सही दिशा में जा सकता है, जब इसके कप्तान इन लुटेरों को समुद्र में फेंकने का साहस करेंगे, न कि उन्हें केबिन में बैठाकर जहाज को डुबोने का।























