Delhi News: दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों का आंदोलन अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है, जिसमें छात्रों ने अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और प्रशासन के रवैये के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया है। यह आंदोलन, जिसे ‘डीयू सत्याग्रह’ नाम दिया गया है, छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को सुरक्षित रखने और विश्वविद्यालय प्रशासन की नीतियों के विरोध में चल रहा है। इस प्रदर्शन का मुख्य आकर्षण यह है कि छात्रों ने जंतर मंतर जाने से रोकने के बावजूद अपने कार्यालय परिसर में ही अपना ‘जंतर मंतर’ बना लिया है, जो उनके दृढ़ संकल्प और संघर्ष को दर्शाता है।
जाने छात्रों का मुख्य आरोप
बता दें कि डूसू उपाध्यक्ष राहुल झांसला ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने से रोककर उनके लोकतांत्रिक अधिकार का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि जब छात्र अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे और पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे थे, तो उस समय विश्वविद्यालय ने उनके समर्थन में खड़े होने के बजाय, उन्हें चेतावनी जारी कर डराने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर भी विश्वविद्यालय के आधिकारिक प्लेटफॉर्म से यह संदेश प्रसारित किया गया कि छात्रों को विरोध प्रदर्शन में भाग नहीं लेना चाहिए, और यदि ऐसा किया गया तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस कदम ने छात्रों में डर का माहौल बना दिया था। झांसला ने सवाल उठाया कि आखिर विश्वविद्यालय को किसने अधिकार दिया है कि वह छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करे और उन्हें धमकाए।
जाने प्रदर्शन का अनोखा तरीका
प्रदर्शन स्थल पर छात्रों ने ‘DU का जंतर मंतर’ लिखा हुआ पोस्टर लगाकर विश्वविद्यालय प्रशासन को एक संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें जंतर मंतर जाने से रोका गया, तो उन्होंने अपने ही परिसर में ही अपना ‘जंतर मंतर’ बना लिया है। यह प्रतीकात्मक कदम छात्रों के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है कि वे अपनी आवाज को दबने नहीं देंगे। राहुल झांसला कहते हैं, “जब हमें जंतर मंतर जाने से रोका गया तो हमने विश्वविद्यालय परिसर में ही अपना जंतर मंतर बना लिया। अब यहीं छात्र अपनी आवाज उठाएंगे। अगर प्रशासन को इसे रोकना है तो सामने आएं और रोकें।” इस तरह का प्रदर्शन छात्रों की निडरता और उनके अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिचायक है।
पुलिस कार्रवाई और जूतों-चप्पलों का प्रतीक
प्रदर्शन स्थल पर रखे गए जूते-चप्पल भी इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गए हैं। राहुल झांसला ने बताया कि ये जूते-चप्पल उन छात्रों की याद दिलाते हैं जिन्होंने पुलिस की कार्रवाई में अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा। भगदड़ के दौरान कई छात्रों के पैर जूते-चप्पल से खाली हो गए थे, और इन्हीं को प्रतीक बनाकर प्रदर्शन में शामिल किया गया है। उनका कहना है कि यह प्रतीक इस बात का संकेत है कि छात्रों के साथ पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन का व्यवहार कितना असंवेदनशील और अतिरंजित रहा है। यह प्रदर्शन छात्रों की सुरक्षा और उनके प्रति प्रशासन की नितियों पर सवाल खड़ा करता है।
भूख हड़ताल और छात्रों की प्राथमिकता
पांचवें दिन पहुंची भूख हड़ताल अपने तीसरे दिन में है। राहुल झांसला ने कहा कि अभी तक कुलपति की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है। जबकि उनके कार्यालय से प्रतिनिधि आए और बातचीत का रास्ता निकालने का प्रयास किया, छात्र अपनी मुख्य मांग पर अड़े हैं। उनका कहना है कि यदि प्रशासन अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करता और छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, तो आंदोलन और तेज होगा। उनका मुख्य मुद्दा है कि कुलपति सार्वजनिक रूप से माफी मांगे और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान करे।
सार्वजनिक माफी और अधिकारों का सम्मान
छात्रों की मुख्य मांग है कि कुलपति अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से माफी मांगे और घोषणा करे कि वे छात्रों के विरोध प्रदर्शन में भाग लेने से किसी भी छात्र को नहीं रोका जाएगा। उनका मानना है कि इससे विश्वविद्यालय का सम्मान बढ़ेगा और छात्रों का आत्मविश्वास भी। वे यह भी कहते हैं कि यदि प्रशासन अपने रवैये में बदलाव नहीं करता, तो यह आंदोलन लंबा खिंच सकता है, और छात्रों का यह संघर्ष और मजबूत होगा। उनका कहना है कि यह आंदोलन छात्रों के अधिकारों के संरक्षण का प्रतीक है, और इसे दबाया नहीं जा सकता।
यह आंदोलन न केवल दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का संघर्ष है, बल्कि यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। छात्रों का यह सत्याग्रह दिखाता है कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। इस आंदोलन से यह संदेश स्पष्ट हो जाता है कि जब तक छात्रों के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। विश्वविद्यालय प्रशासन को चाहिए कि वह छात्रों की बात को सुने, उनकी मांगों को समझे और समाधान खोजे।



























