Learn about the history of Jantar Mantar: वर्तमान में दिल्ली स्थित जंतर-मंतर लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के कारण चर्चा में बना हुआ है। आज उनके अनशन का 20वां दिन है। अगर हम भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करें, तो दिल्ली का जंतर-मंतर किसी भी बड़े प्रदर्शन या आंदोलन का ‘सिग्नेचर स्पॉट’ बन चुका है। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि आखिर इस ऐतिहासिक स्थल का असली इतिहास क्या है? इसे बनवाने वाला कौन था? और क्या दिल्ली के अलावा भारत में और भी जंतर-मंतर मौजूद हैं? आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।
जंतर-मंतर नाम के पीछे का वैज्ञानिक रहस्य
बता दें कि आज के दौर में जहां हमारे पास डिजिटल घड़ियां, एडवांस्ड स्पेस टेलिस्कोप और सुपरकंप्यूटर मौजूद हैं, वहीं 18वीं शताब्दी में भारत ने बिना आधुनिक तकनीक के खगोल विज्ञान (Astronomy) में ऐसा कमाल कर दिखाया था, जो आज भी विश्व के वैज्ञानिकों को हैरान करता है।
‘जंतर-मंतर’ शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों—’यंत्र’ और ‘मंत्र’ से मिलकर बना है। यहाँ ‘यंत्र’ का तात्पर्य किसी यांत्रिक या वैज्ञानिक उपकरण से है, जबकि ‘मंत्र’ का अर्थ किसी गणना, सूत्र या गणितीय विश्लेषण से है। यानी कि जंतर-मंतर का शाब्दिक अर्थ है—’वे विशाल और जटिल उपकरण जिनके माध्यम से आकाशीय पिंडों की गणना की जाती है। ये वास्तव में उस युग के सुपरकंप्यूटर थे, जो आकाश में मौजूद ग्रहों, नक्षत्रों, सूर्य और चंद्रमा की चाल को बेहद सटीकता से मापते थे।
किसने बनवाए जंतर-मंतर और क्या था उद्देश्य?
बता दें कि इन अद्भुत खगोलीय वेधशालाओं का निर्माण आमेर राज्य के प्रतापी शासक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। महाराजा जय सिंह को बचपन से ही गणित, भूगोल और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखते थे और उस दौरान भारत में पंचांगों और ग्रहों की गति की गणना में काफी त्रुटियां आ रही थीं।
ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही तुला, दीपावली और छठ जैसे त्योहारों की तिथियां तय होती थीं, लेकिन गलत गणना के कारण अक्सर तिथियां टल जाती थीं। इस समस्या को दूर करने, भारतीय खगोल विज्ञान को नई दिशा देने और यूरोपीय खगोल विज्ञान से भारतीय विज्ञान की तुलना करने के मुख्य उद्देश्य से उन्होंने इन वेधशालाओं का निर्माण करवाया।
भारत में कुल कितने जंतर-मंतर हैं?
महाराजा सवाई जय सिंह ने अपने शासनकाल में भारत के विभिन्न हिस्सों में कुल पांच जंतर-मंतर का निर्माण करवाया था। हालांकि, समय के साथ उनमें से एक पूरी तरह से नष्ट हो गया। आइए जानते हैं उन सभी के बारे में:
1. दिल्ली का जंतर-मंतर (पहला जंतर-मंतर)
दिल्ली स्थित जंतर-मंतर महाराजा सवाई जय सिंह द्वारा बनवाया गया सबसे पहला और सबसे पुराना जंतर-मंतर है, जिसका निर्माण सन् 1724 में हुआ था। यह मूल रूप से एक प्रयोगशाला के तौर पर बना था। इसमें मौजूद विशालकाय उपकरण जैसे- ‘मिश्र यंत्र’, ‘सम्राट यंत्र’ और ‘जय प्रकाश यंत्र’ की मदद से उस युग के विद्वान सूर्य और चंद्रग्रहण का सटीक समय, ग्रहों की दिशा और स्थानीय समय की गणना किया करते थे। आज यह भले ही धरना-प्रदर्शन का केंद्र बन गया हो, परन्तु यह भारत की प्राचीन वैज्ञानिक ऊर्जा का जीवंत प्रतीक है।
2. जयपुर का जंतर-मंतर (सबसे बड़ा और सुरक्षित)
जयपुर में स्थित जंतर-मंतर पूरे विश्व में मौजूद सबसे बड़ा और सबसे भव्य खगोलीय परिसर है। इसका निर्माण 1728 से 1734 के बीच हुआ। यहाँ मौजूद ‘सम्राट यंत्र’ दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की बनी सूर्यघड़ी है, जो मिनटों के दो हिस्सों (सेकंड) तक सटीक समय बता सकती है।
शुरुआत में यह चूने और साधारण पत्थरों सा बना था, लेकिन बाद में महाराजा माधव सिंह के समय में पंडित चंद्रधर गुलेरी और अन्य विद्वानों के मार्गदर्शन में इसे संगमरमर के खूबसूरत पत्थरों से नवीनीकृत किया गया। इसकी अद्भुत वास्तुकला और वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है।
3. उज्जैन का जंतर-मंतर
प्राचीन काल से ही मध्यप्रदेश के उज्जैन को भारतीय खगोल विज्ञान और कालगणना का सबसे पवित्र और प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। भारत का प्रारंभिक मध्याह्न रेखा उज्जैन से होकर गुजरती मानी जाती थी और कर्क रेखा भी इसी के करीब से निकलती है। इसलिए यहाँ जंतर-मंतर बनाना महाराजा जय सिंह के लिए सबसे जरूरी माना गया। यहाँ के उपकरण आज भी काफी हद तक सक्रिय हैं।
4. वाराणसी का जंतर-मंतर
यूपी के काशी यानी वाराणसी को ज्ञान और आस्था का केंद्र कहा जाता है। यहाँ गंगा नदी के किनारे मनिकर्णिका घाट के समीप सन् 1737 के आसपास इस वेधशाला का निर्माण करवाया गया। वाराणसी में इसका मुख्य काम हिंदू कैलेंडर और धार्मिक अनुष्ठानों (जैसे सूर्य और चंद्र ग्रहण) के सटीक समय का निर्धारण करना था, ताकि त्योहारों और धार्मिक कार्यों में कोई भ्रम न रहे।
5. मथुरा का जंतर-मंतर (जो अब लुप्त हो चुका है)
महाराजा सवाई जय सिंह ने पांचवां और आखिरी जंतर-मंतर मथुरा में बनवाया था। लेकिन दुर्भाग्यवश, समय के साथ यहाँ हुए विनाशकारी युद्धों, अनदेखी और शासकों के उपेक्षित रवैये के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। आज मथुरा में जंतर-मंतर के कोई मूल अवशेष या निशानी मौजूद नहीं बचा है।
बता दें कि भारत के चार सुरक्षित जंतर-मंतर आज भी हमें उस युग की बौद्धिक ऊंचाइयों की कहानी कहते हैं, जब भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना किसी आधुनिक तकनीक के केवल ज्यामिति और गणित के बलबूते पर ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने का प्रयास किया था। अगली बार जब भी आप समाचारों में दिल्ली के जंतर-मंतर का नाम सुनें, तो बस उसे एक धरना स्थल के रूप में मत देखिए; बल्कि उन महान पत्थरों को देखिए, जिन्होंने कभी आकाश की गगनचुंबी ऊंचाइयों को मापा था।


























