Earthquake on The Moon: धरती पर भूकंप आना एक आम स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन जब हम अंतरिक्ष की बात करते हैं, तो अक्सर यह सवाल मन में उठता है कि क्या हमारा चांद भी किसी तरह की हलचल महसूस करता है? विज्ञान के जरिए यह बात साबित हो चुकी है कि धरती की तरह ही चांद पर भी भूकंप आते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ‘मूनक्वेक’ या ‘चंद्र-भूकंप’ कहा जाता है।
लेकिन यहां एक बहुत ही दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलता है। जब अपोलो मिशन (1969 से 1972) के दौरान नासा के अंतरिक्ष यात्री चांद पर उतरे थे, तो उन्होंने वहां सीस्मोमीटर (कंपन मापने वाले उपकरण) लगाए थे। ये उपकरण कई वर्षों तक काम करते रहे और हजारों बार चंद्र-भूकंप के संकेत दर्ज करते रहे। तो आखिर ऐसा क्या कारण है कि इतनी तीव्र हलचल के बावजूद चांद पर मौजूद इंसानी उपग्रहों, रोवर्स और अन्य उपकरणों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता? आइए इस रहस्य को विस्तार से समझते हैं।
चांद पर कंपन या मूनक्वेक क्यों आते हैं?
धरती पर भूकंप आने का मुख्य कारण टेक्टोनिक प्लेट्स का आपस में टकराना है, लेकिन चांद पर इन प्लेट्स का अस्तित्व ही नहीं है। फिर यह कंपन कहां से आता है? वैज्ञानिकों ने इसके तीन मुख्य कारण बताए हैं:
- थर्मल कंट्रैक्शन (ठंडा होना): चांद जब बना था, तब वह बेहद गर्म था। लाखों सालों से वह अंदर से धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। जैसे-जैसे वह ठंडा होता है, वैसे-वैसे वह सिकुड़ता जा रहा है। इस सिकुड़न की वजह से उसकी सतह पर तनाव पैदा होता है और अचानक दरारें पड़ने से कंपन पैदा होता है।
- धरती का गुरुत्वाकर्षण (ज्वारीय बल): धरती और चांद के बीच गुरुत्वाकर्षण बल बहुत मजबूत है। ठीक वैसे ही जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा आता है, धरती का खिंचाव चांद के अंदरूनी हिस्से को भी खींचता है। इस लगातार खींचाव और छूटने की प्रक्रिया से गहराई में कंपन उत्पन्न होता है।
- उल्कापिंडों का टक्कर: चांद के चारों ओर कोई वायुमंडल (Atmosphere) नहीं है। जब अंतरिक्ष से कोई उल्कापिंड या चट्टान चांद की तरफ आती है, तो वह जलकर नष्ट नहीं होती, बल्कि सीधे चांद की सतह से टकराती है। इस भयंकर टक्कर से भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है, जो मूनक्वेक का रूप ले लेती है।
चांद का भूकंप घंटों तक क्यों चलता है?
धरती पर आने वाला भूकंप कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनटों तक ही रहता है, लेकिन चांद पर यह कंपन घंटों तक जारी रह सकता है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है चांद की भूगोलिक संरचना।
धरती की सतह में पानी, नमी और मिट्टी होती है, जो किसी भी तरह के झटके की ऊर्जा को अवशोषित कर लेती है। लेकिन चांद की सतह पूरी तरह से सूखी, टूटी-फूटी और रेगिस्तानी है, जिसे ‘रेगोलिथ’ कहते हैं। जब चांद में कंपन आता है, तो उसकी ऊर्जा को अवशोषित करने वाला कोई माध्यम नहीं होता। नतीजतन, वह ऊर्जा चांद के अंदर-बाहर एक घंटी की तरह लगातार गूंजती रहती है। अब तक दर्ज किए गए सबसे तेज चंद्र-भूकंपों की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5.5 तक रही है।
इंसानी उपग्रहों और उपकरणों को नुकसान क्यों नहीं पहुंचता?
अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर—जब कंपन इतने लंबे समय तक चलता है, तो अपोलो मिशन द्वारा छोड़े गए यंत्र, चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर, या अन्य देशों के उपग्रह सुरक्षित कैसे हैं? इसके पीछे 4 मुख्य वजहें हैं:
- तीव्रता में अंतर: धरती पर 5.5 तीव्रता का भूकंप इमारतों को हिला सकता है, क्योंकि यहां कंपन की तरंगें जमीन के जल और मिट्टी वाले माध्यम से गुजरती हैं और अपना असर बढ़ा लेती हैं। वहीं चांद पर यह तीव्रता उतनी विनाशकारी नहीं होती, क्योंकि वहां की सतह बहुत हल्की और भुरभुरी है।
- उपकरणों का मजबूत डिजाइन: अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले किसी भी उपग्रह या लैंडर को बनाते समय ध्यान रखा जाता है कि उन्हें रॉकेट के लॉन्च के दौरान जबरदस्त कंपन और तेज आवाज (Acoustic vibrations) सहन करने पड़ते हैं। वहीं इंजीनियरिंग चांद पर मौजूद रहने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है। मूनक्वेक का कंपन रॉकेट लॉन्च होने के कंपन से कहीं कम होता है, इसलिए ये यंत्र आसानी से इसे झेल लेते हैं।
- वायुमंडल का अभाव: धरती पर भूकंप से सबसे ज्यादा नुकसान इमारतों को इसलिए होता है क्योंकि जमीन से ऊपर उठी हुई इमारतें हवा और गुरुत्वाकर्षण के कारण एक दूसरे से टकराती हैं और गिरती हैं। चांद पर ना तो हवा है, ना ही गुरुत्वाकर्षण उतना मजबूत है। चांद पर रखा कोई लैंडर या रोवर अपने वजह से ही जमीन पर बैठा रहता है, उसे हवा के झोंके या झटके के कारण कोई धक्का नहीं लगता।
- कंपन की प्रकृति: मूनक्वेक के कंपन ज्यादातर गहराई में होते हैं और सतह तक आते-आते बहुत कमजोर हो जाते हैं (सिवाय उल्कापिंड टकराने के)। ऐसे में सतह पर रखे छोटे-छोटे यंत्रों पर इसका असर न के बराबर होता है।
भविष्य के लिए एक चुनौती
हालांकि अभी तक के छोटे उपकरण और लैंडर इन कंपनों से सुरक्षित रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए यह चुनौतीपूर्ण है। भविष्य में जब अमेरिका (आर्टेमिस मिशन) या भारत (चंद्रयान-4) जैसे देश चांद पर इंसानों के रहने के लिए बड़े आधार शिविर या बड़े क्रू रोवर बनाएंगे, तब यह लंबे समय तक चलने वाला ‘घंटी जैसा कंपन’ एक बड़ी समस्या बन सकता है।
एक बड़ी इमारत या संरचना अगर चांद की उस गूंजती हुई आवृत्ति के साथ कंपन करने लगे, तो वह अपने आप ही टूट सकती है। इसीलिए भविष्य के चंद्र आधारों को बनाने से पहले वैज्ञानिक ऐसे पदार्थों और डिजाइनों पर रिसर्च कर रहे हैं, जो कंपन की ऊर्जा को सोख लें और इंसानों को सुरक्षित रखें।
























