Calcutta Stock Exchange Collapse Story: भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज (Calcutta Stock Exchange – CSE) का नाम बेहद गौरवशाली रहा है। आज जहां मुंबई का दलाल स्ट्रीट भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन माना जाता है, कभी पूर्वी भारत में यही भूमिका कोलकाता के लायंस रेंज (Lyons Range) निभाया करता था।
एक समय ऐसा था जब CSE देश का दूसरा सबसे बड़ा और एशिया का सबसे पुराना शेयर बाजार हुआ करता था, लेकिन आज यह बस एक बर्बाद इमारत का नाम बनकर रह गया है।आइए जानते हैं कि उस नीम के पेड़ के नीचे शुरू हुआ यह वित्तीय साम्राज्य कैसे अपने चरम पर पहुंचा और फिर किसी एक स्कैम ने इसकी नींव कैसे खोखली कर दी।
नीम के पेड़ से लेकर लायंस रेंज तक का सफर
कोलकाता में शेयरों की खरीद-फरोख्त की शुरुआत 1830 के दशक में एक नीम के पेड़ के नीचे हुई थी। उस दौर में ब्रोकर्स यहां अनौपचारिक तौर पर इकट्ठा होते थे। धीरे-धीरे इस कारोबार का विस्तार हुआ और ब्रोकर्स ने एक संगठन का रूप ले लिया। मई 1908 में ‘कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज एसोसिएशन’ का गठन हुआ, जिसका मुख्यालय चाइना स्ट्रीट में स्थापित किया गया और इसमें 150 सदस्य थे।
1980 में भारत सरकार ने इसे इक्विटी कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के तहत स्थायी मान्यता प्रदान की। लायंस रेंज से संचालित होने वाले इस एक्सचेंज में चाय बागानों, जूट मिलों और शिपिंग कंपनियों के शेयरों की बोली लगती थी। ब्रोकर्स की चीख-पुकार और लकड़ी के कारोबारियों की गतिविधियां इसे पूर्वी भारत का सबसे व्यस्त वित्तीय केंद्र बनाती थीं।
नई सरकार की पुरानी उम्मीद
हाल ही में पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दास गुप्ता ने विधानसभा में बजट भाषण के दौरान एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज को दोबारा शुरू करने का पूरा समर्थन करेगी। सरकार का मानना है कि इसे फिर से चालू करने से पूर्वी भारत की कंपनियों को फंड जुटाने में आसानी होगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
हालांकि, यहां सच्चाई यह है कि कागजों पर प्रस्ताव बनाना और एक बर्बाद हो चुके एक्सचेंज को वास्तविकता में उभारना में आसमान और जमीन का अंतर है। आखिर CSE बंद हुआ ही क्यों?
2001 का केतन पारेख स्कैम
CSE के पतन की सबसे बड़ी वजह साल 2001 का भयानक ‘केतन पारेख स्कैम’ था। केतन पारेख एक शेयर ब्रोकर था, जिसने 1999 से 2001 के बीच अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बाजार में एक ऐसा खेल रचा जिसने पूरे सिस्टम को चौपट कर दिया।
उसने टेलीकॉम, आईटी और मीडिया जैसे तेजी से बढ़ते सेक्टर के लगभग 10 शेयरों को चुना। बाद में इन्हें ‘K-10 शेयर्स’ के नाम से जाना गया। केतन पारेख ने सर्कुलर ट्रेडिंग का सहारा लिया। यानी, उसके गुर्गे ही एक-दूसरे से इन शेयरों को खरीदते और बेचते। इसका असर यह हुआ कि इन शेयरों का वॉल्यूम और कीमतें कृत्रिम रूप से आसमान छूने लगीं।

भोले-भाले आम निवेशकों को लगा कि ये शेयर अच्छा रिटर्न दे रहे हैं और उन्होंने भी ब्लाइंडली पैसा लगाना शुरू कर दिया। इस पूरे खेल के लिए केतन ने ‘मधवपुरा मर्केंटाइल कोऑपरेटिव बैंक’ सहित कई बैंकों से नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों का कर्जा लिया।
गिरते प्याज की तरह ढह गया एक्सचेंज
मार्च 2001 में जैसे ही केंद्र सरकार ने नया बजट पेश किया, बाजार में ठंडी हवाएं चलने लगीं। जैसे-जैसे मार्केट नीचे गिरने लगा, केतन पारेख के K-10 शेयरों की कीमतें आधी से भी कम हो गईं।
जैसे ही बैंकों को इस बात का अहसास हुआ, उन्होंने ब्रोकर्स से गिरवी रखे शेयरों के बदले अपना कर्जा वापस मांगना शुरू कर दिया। ब्रोकर्स के पास कैश नहीं था, जिससे उन्हें जबरदस्ती शेयर बेचने पड़े। इससे भयंकर बिकवाली (Panic Selling) हुई और कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज एकदम से धराशायी हो गया। लाखों निवेशकों की पूंजीी डूब गई और एक्सचेंज में लिक्विडिटी (नकदी) पूरी तरह सूख गई।
SEBI ने खींचा आखिरी प्लग
2001 के इस घोटाले ने CSE की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। 2005 से 2012 के बीच इसका डेली ट्रेडिंग वॉल्यूम 90 प्रतिशत से ज्यादा गिर गया। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि भरोसा टूटने के बाद यहां लिस्टेड कंपनियां अपने शेयरों को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में शिफ्ट करने लगीं।
निवेशकों का भरोसा जीतने में विफल रहने और बेहद कम ट्रेडिंग वॉल्यूम को देखते हुए, बाजार नियामक संस्था SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) ने अप्रैल 2013 में CSE पर ट्रेडिंग को पूरी तरह से बंद करने का आदेश दे दिया।






















