नियमों की लाश पर बिल्डरों का राज

दिल्ली में बिल्डरों की कार्यप्रणाली अक्सर एक खतरनाक खेल के रूप में सामने आती है। अधिकतम फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) का उल्लंघन करना, अनुमत संख्या से अधिक मंजिलें बनाना, सीवरेज और अग्निशमन नियमों की अनदेखी करना, और पार्किंग स्पेस को हथियाना उनके लिए एक आम प्रथा बन गई है।

अवैध निर्माण: अपराधियों का नया अड्डा (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • बिल्डर-बाबू नेक्सस: दिल्ली की बर्बादी
  • रिश्वत की ईंट, सरकार की चुप्पी
  • ईंट-पत्थर का अपराध
  • मुनाफे की दौड़, जनता की बलि

The Broken Bridge of Trust Between the Government and the Public: दिल्ली केवल भारत की राजधानी नहीं है; यह एक जीवंत, स्वप्न देखने वाले लाखों लोगों की कहानी है, जो यहाँ बेहतर जीवन, रोजगार और सम्मान की तलाश में आते हैं। लेकिन इस सपनों के शहर की जमीनी हकीकत कुछ और ही है। यहाँ की आसमान छूती इमारतें, चमचमाती मॉल्स और फैलते हुए मेट्रो नेटवर्क के पीछे एक ऐसा अंधेरा और जटिल समीकरण छिपा है, जो धीरे-धीरे शहर की नींव को खोखला कर रहा है। यह समीकरण है—रियल एस्टेट बिल्डरों की लालसा, सरकारी अधिकारियों की मूक सहमति (या सक्रिय मिलीभगत), और इस सबका शिकार बनी भोली-भाली जनता।

यह त्रिकोण केवल ईंट-पत्थर और सीमेंट का खेल नहीं है; यह कानून का मजाक उड़ाने, जनता की जान के साथ खिलवाड़ करने और शासन तंत्र की नैतिकता को तार-तार करने की एक गहरी साजिश है। आज जरूरत इस त्रिकोण को कसौटी पर कसने और इसके भयावह परिणामों पर गंभीरता से चिंतन करने की है।

लाभ की दौड़ में खतरे की इमारतें

आज के दौर में आवासीय और व्यावसायिक जरूरतें बढ़ी हैं, और बिल्डर इसका लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह विकास जिम्मेदारी के साथ हो रहा है? दिल्ली में बिल्डरों की कार्यप्रणाली अक्सर एक खतरनाक खेल के रूप में सामने आती है। अधिकतम फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) का उल्लंघन करना, अनुमत संख्या से अधिक मंजिलें बनाना, सीवरेज और अग्निशमन नियमों की अनदेखी करना, और पार्किंग स्पेस को हथियाना उनके लिए एक आम प्रथा बन गई है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि बिल्डरों के लिए ‘मुनाफा’ शब्द ‘मानवीय जीवन’ से बड़ा हो गया है। जब वे नक्शे पास कराते हैं, तो कागजों पर सब कुछ नियमों के अनुसार होता है, लेकिन जैसे ही निर्माण शुरू होता है, वास्तविकता कागजों से उल्ट हो जाती है। घटिया सामग्री का उपयोग करना, बिना स्ट्रक्चरल ऑडिट के छतों पर और फ्लोर जोड़ना आदि ऐसे कृत्य हैं जो इमारतों को ‘मृत्यु के सिलसिले’ में बदल देते हैं। जब कभी भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा आती है, या भारी बारिश होती है, तो इन अवैध और कमजोर इमारतों की असलियत सामने आ जाती है। दीवारें गिरती हैं, छतें ढहती हैं, और कई निर्दोष लोगों की जानें चली जाती हैं। क्या यह कोई दुर्घटना है? नहीं, यह सीधे-सीधे नरसंहार है, जो बिल्डरों की लालसा और लापरवाही का परिणाम है।

मूक दर्शक या सहयोगी? सरकारी तंत्र की भूमिका

अगर बिल्डर अकेले इतने बड़े पैमाने पर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, तो सवाल उठता है कि नियामक निकाय कहाँ हैं? दिल्ली में नगर निगम, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA), और अन्य सरकारी एजेंसियों की भूमिका इस मामले में अत्यंत संदिग्ध रही है। किसी भी अवैध निर्माण को अंजाम तक पहुँचने में महीनों, और कभी-कभी सालों लगते हैं। इस दौरान सरकारी अधिकारियों, जेई (Junior Engineer) से लेकर उच्च अधिकारियों तक, की नजर इन निर्माणों पर नहीं पड़ती—यह सोचना बेवकूफी होगी।

वास्तव में, बिल्डरों और सरकारी अधिकारियों के बीच एक गहरा और अदृश्य समझौता काम करता है। भ्रष्टाचार इस समीकरण का ध्रुव है। ‘मौखिक रिश्वत’ से लेकर फ्लैट्स के बदले में स्वार्थ निभाने तक की प्रथा प्रचलित है। जब अधिकारी ही नियम तोड़ने वालों के प्रोटेक्शन में लग जाएं, तो कानून का हाथ छोटा हो जाता है। अधिकारी केवल फाइलें नहीं चलाते, बल्कि अपनी चुप्पी बेचते हैं। जब शिकायतकर्ता किसी अवैध निर्माण की सूचना देता है, तो उसे नोटिस जारी करने में इतनी देरी की जाती है कि बिल्डर तय सीमा के भीतर निर्माण पूरा कर लेता है। इसके बाद कार्रवाई करना तो दूर, नियमों के जाल में फंसकर अधिकारी खुद ही बिल्डर को ‘राहत’ देने के तरीके ढूंढ लेते हैं।

अपराध और अवैध निर्माण का गठजोड़

अवैध निर्माण केवल भौतिक रूप से खतरनाक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और कानूनी व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा खतरा है। विभिन्न सर्वेक्षणों और पुलिस रिकॉर्ड्स से एक डरावना तथ्य सामने आता है कि अवैध रूप से बनी बहुमंजिला इमारतें, अनधिकृत कॉलोनियां और बिना नक्शे के बने व्यावसायिक परिसर अपराधियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गए हैं।

बिल्डर जब अवैध तरीके से इमारतें बनाते हैं, तो उन्हें उन्हें ‘कब्जा’ करवाने या उसे चलाने के लिए ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो नियम-कानून को अपनी मुट्ठी में रख सकें। इसलिए, कई बार बिल्डर स्थानीय गुंडों और अपराधियों के साथ गठजोड़ कर लेते हैं। किरायेदारों की कोई पहचान नहीं होती, पुलिस वेरिफिकेशन नहीं होता, और ऐसी इमारतों में अवैध गतिविधियाँ—चाहे वह जुआ हो, नशे का कारोबार हो, या अन्य अपराध—आसानी से चलती रहती हैं। जब कोई विरोध होता है, तो बिल्डर अपने इन ‘मजबूत’ लोगों का इस्तेमाल करके आम जनता को डराधमकाकर चुप करा देते हैं। इस प्रकार, अवैध निर्माण सीधे तौर पर दिल्ली जैसे महानगर में क्राइम रेट को बढ़ावा देने का एक माध्यम बन गया है।

बुलडोजर की राजनीति और न्याय का इंतजार

जब अवैध निर्माण की समस्या बेकाबू हो जाती है, तो न्यायालयों या उच्च अधिकारियों के आदेश पर ‘तोड़क कार्रवाई’ की जाती है। सतह पर यह कानून का राज स्थापित करने का एक साहसिक कदम लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।

तोड़फोड़ की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसका सबसे बड़ा शिकार वह आम आदमी होता है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई, पेंशन या बैंक लोन लेकर वह फ्लट या दुकान खरीदी थी। बिल्डर तो अपना मुनाफा निकालकर महीनों पहले ही फरार हो जाता है, सरकारी अधिकारी जो नक्शा पास करते हैं, वे ट्रांसफर हो चुके होते हैं, और जेसीबी (बुलडोजर) आकर उस गरीब या मध्यवर्गीय परिवार के सपनों पर पहिया चला देती है।

इसके अलावा, तोड़क कार्रवाई को लेकर राजनीतिक दलों का रवैया भी दोहरा होता है। सत्ता में आने पर एक दल तोड़फोड़ करता है, तो विपक्ष में बैठकर उसे ‘जुल्म’ करार देता है। कई बार चुनाव से पहले या वोट बैंक के दबाव में इन कार्रवाइयों को रोक दिया जाता है। यह ‘चुनिंदा’ और ‘राजनीतिक’ कार्रवाई कानून की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है। असल में, निर्माण के समय ही रोक लगाना न्याय है, न कि बनकर तैयार इमारत को मलबे में बदलना।

संसाधनों का अवैध अपहरण

अवैध निर्माण का दायरा केवल उस इमारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शहर के बुनियादी ढांचे पर भारी पड़ता है। दिल्ली में पानी की कमी एक गंभीर समस्या है। जब बिना अनुमति की बहुमंजिला इमारतें बन जाती हैं, तो उनके निवासियों को पानी देने की जिम्मेदारी जल बोर्ड पर आ जाती है, जिसके पास उतने संसाधन नहीं होते। ऐसे में वैध क्षेत्रों में पानी की कटौती होती है।

इसी तरह, सीवरेज लाइनों का अवैध जोड़ना सार्वजनिक नालों को ओवरफ्लो करता है, जिससे बरसात में भारी जलभराव और डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियां फैलती हैं। बिजली की चोरी, पार्किंग के लिए सड़कों पर अतिक्रमण—ये सब अवैध निर्माण के सीधे परिणाम हैं। एक बिल्डर जो अपनी एक इमारत बनाकर करोड़ों कमा लेता है, उसका यह ‘लाभ’ पूरे शहर के लाखों लोगों पर टैक्स और बुनियादी सुविधाओं के रूप में थोप दिया जाता है।

शासन और जनता के बीच का टूटता पुल: विश्वास का संकट

लोकतंत्र की नींव नागरिकों का राज्य पर विश्वास होता है। जनता करदाता है, और सरकार से यह अपेक्षा करती है कि उसकी जान-माल की रक्षा होगी। लेकिन जब एक आम नागरिक देखता है कि सरकारी अधिकारी और धनाढ्य बिल्डर मिलकर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, और उसकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा, तो उसके मन में निराशा और गुस्सा पैदा होता है।

यह विश्वास का संकट बहुत खतरनाक है। जब लोगों को लगता है कि ‘पैसा और ताकत ही कानून है’, तो वे भी खुद को व्यवस्था से अलग करने लगते हैं। इससे समाज में अराजकता और अव्यवस्था फैलती है। लोग अपनी सुरक्षा के लिए अवैध तरीके अपनाने लगते हैं (जैसे अतिक्रमण करना या सुरक्षा के लिए गैर-कानूनी तरीके अपनाना)। एक ऐसा माहौल बनता है जहाँ ‘शासन’ का अस्तित्व ही संदेह के घेरे में आ जाता है। यदि दिल्ली जैसी राजधानी में कानून का राज कमजोर पड़ गया, तो इसका संदेश पूरे देश में जाता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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