बिल्डर बचा, जनता पिसी

किसी भी भवन निर्माण की शुरुआत एक नक्शे से होती है। जब कोई बिल्डर किसी सोसायटी या बहुमंजिला इमारत का नक्शा बनाता है, तो वह खुले आम नगर नियोजन विभाग, नगर निगम या विकास प्राधिकरण के समक्ष जाता है।

बुलडोजर की ठोकर और सपनों की चिता (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • सपनों पर बुलडोजर
  • घर टूटा, भरोसा टूटा
  • अवैध निर्माण का खेल
  • भ्रष्ट सिस्टम की मार

Builder saved, public suffered: एक ईंट-ईंट जोड़कर अपना घर बनाना, किसी भी मध्यवर्गीय या निम्नवर्गीय परिवार के लिए जीवन का सबसे बड़ा और चुनौतीपूर्ण सपना होता है। यह सपना केवल सीमेंट, लोहे और ईंटों का नहीं होता, बल्कि इसमें दशकों की एकत्रित बचत, पीढ़ियों की कठिनाइयां, बैंकों के कर्जे और एक सुरक्षित भविष्य की उम्मीदें समाई होती हैं। लेकिन जब यही सपना किसी सुनियोजित राजनीतिक-प्रशासनिक षड्यंत्र और सरकारी उलझनों का शिकार होकर बुलडोजर की चपेट में आ जाए, तो धरती के नीचे दबता केवल ईंट-पत्थर नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का भरोसा, न्यायपालिका पर विश्वास और राज्य व्यवस्था की नैतिकता दफन होती है।

आज के समय में दो नंबरी (अवैध) निर्माणों को लेकर जो तस्वीरें सामने आती हैं, वे एक गंभीर और दर्दनाक विडंबना को उजागर करती हैं। यह विडंबना इसलिए भयावह है, क्योंकि इस अवैध निर्माण के जन्मदाता, उसे पालने-पोसने वाले और अंततः उसके कातिल तीनों एक ही हैं—‘सरकार और उसका प्रशासनिक तंत्र’।

नीतिगत भ्रष्टाचार

किसी भी भवन निर्माण की शुरुआत एक नक्शे से होती है। जब कोई बिल्डर किसी सोसायटी या बहुमंजिला इमारत का नक्शा बनाता है, तो वह खुले आम नगर नियोजन विभाग, नगर निगम या विकास प्राधिकरण के समक्ष जाता है। यहाँ से ही वह रिश्ते और ताकत के धंधे की शुरुआत करता है। प्रशासनिक अधिकारी, जो नियमों के रखवाले होने चाहिए, स्वयं बिल्डर के साथ मिलकर नक्शे में बदलाव को मंजूरी दे देते हैं।

जब निर्माण शुरू होता है, तो नगर निगम के इंस्पेक्टर, जोनल अधिकारी और बिल्डिंग विभाग के अफसर नियमित रूप से साइट पर आते हैं। वे देखते हैं कि अनुमित फ्लोर एरिया (FAR) से ज्यादा निर्माण हो रहा है, सेफ्टी नॉर्म्स की अनदेखी हो रही है, पार्किंग और ओपन स्पेस पर अतिक्रमण हो रहा है, लेकिन उनकी आँखें मूंद जाती हैं। यह मूंदना स्वैच्छिक नहीं होता, बल्कि इसके पीछे ‘सिस्टम’ की मौन सहमति और महीने का एक निश्चित ‘मालिशा’ (रिश्वत) काम करता है।

सबसे बड़ा कलंक तब लगता है, जब निर्माण पूरा होने के बाद बिल्डर को ‘ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट’ (OC) या ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ दिया जाता है। इसका अर्थ सीधा यह है कि सरकार का तंत्र स्वीकार कर रहा है कि इमारत सभी नियमों के अनुरूप बनी है। इतना ही नहीं, कई मामलों में देखा गया है कि सरकारें चुनाव से पहले या वोट बैंक के लालच में ‘नियमितीकरण’ (Regularization) या ‘भू-माफी’ जैसी नीतियां लाकर जानबूझकर अवैध निर्माणों को वैध करने का काम करती हैं। जब राज्य स्वयं अपने हाथों से अवैध को वैध का दर्जा दे दे, तो फिर उस घर में रहने वाली आम जनता से यह पूछना कि ‘तुमने अवैध घर क्यों खरीदा?’, सबसे बड़ा क्रूर मजाक है।

आम आदमी का फंदा

जब एक आम नागरिक, चाहे वह एक सरकारी कर्मचारी हो, निजी क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति हो, या कोई छोटा कारोबारी हो, घर खरीदता है, तो वह कानूनी और सुरक्षित रास्ते अपनाता है। वह बिल्डर से सभी दस्तावेज मांगता है। बिल्डर उसे नगर निगम या प्राधिकरण द्वारा जारी पास नक्शा, रजिस्ट्री, स्टैम्प ड्यूटी और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट दिखाता है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि आम आदमी के पास न तो किसी इमारत को मापने के उपकरण होते हैं, न ही नक्शे की जांच करने की तकनीकी समझ होती है। वह सरकारी मुहर और सरकारी दस्तावेजों पर विश्वास करता है। उसका यह विश्वास अंधा नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य के प्रति नागरिक का आधारभूत विश्वास है। वह सोचता है कि जिस सरकार ने नक्शा पास किया, जिस सरकार ने रजिस्ट्री करवाई और जिस सरकार ने बिजली-पानी का कनेक्शन देकर इमारत को चलने योग्य माना, वह घर पूरी तरह से कानूनी है।

वह अपनी पूरी जिंदगी की जमा पूंजी, प्रॉविडेंट फंड (PF) का पैसा और बैंकों से लिए गए भारी कर्जे को इस घर में लगाता है। उसका परिवार हंस-खुश उस घर में रहने लगता है। बच्चों की पढ़ाई शुरू होती है, पड़ोसियों से रिश्ते बनते हैं और एक नई जिंदगी की शुरुआत होती है। लेकिन तभी एक दिन नोटिस आता है कि यह इमारत अवैध है और इसे तोड़ा जाएगा। इस नोटिस के साथ आम आदमी की दुनिया उजड़ जाती है, लेकिन सवाल यह है कि जिस अवैधता को जन्म दिया, उसे पाला और उसे कानूनी वरदान दिया—वह सरकार कहाँ चली गई?

बुलडोजर की राजनीति

जब तोड़फोड़ की कार्यवाही शुरू होती है, तो उसे न्याय के नाम पर प्रस्तुत किया जाता है। अधिकारी और नेता मीडिया के सामने आकर कहते हैं कि “हम कानून का शासन स्थापित कर रहे हैं”। लेकिन यह कानून का शासन किसके लिए होता है?

असलियत तो यह है कि बुलडोजर का इस्तेमाल अक्सर एक मजबूत संदेश देने के लिए किया जाता है। कभी यह किसी विपक्षी नेता या उसके समर्थक बिल्डर को सबक सिखाने का हथियार बन जाता है, तो कभी न्यायालय के किसी कड़े आदेश का बहाना बन जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी क्रूरता इसमें छिपी है कि जब बिल्डर गलत काम कर रहा था, तब प्रशासन की चुप्पी मौन सहमति थी, लेकिन जब कार्रवाई होती है, तो उसका पूरा बोझ उस निर्दोष आम आदमी के कंधों पर आ गिरता है, जिसने तो सिर्फ सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा किया था।

सजा का यह खेल

इस मामले की सबसे दुखद और कुत्सित परत यह है कि सजा का आकलन कैसे होता है। जब कोई बड़ा बिल्डर किसी विशाल प्रोजेक्ट में धांधली करता है, तो उसके पीछे राजनीतिक दलों के फंडिंग नेटवर्क, बड़े अधिकारियों के कमीशन के रैकेट और प्रभावशाली वकीलों की फौज काम करती है।

जब मामला गर्माता है, तो बड़े अधिकारियों से किसी को पूछताछ के लिए नहीं बुलाया जाता। उनके तो केवल ‘कमांड’ पर काम करने वाले निचले स्तर के कर्मचारी या तो निलंबित कर दिए जाते हैं या बलि का बकरा बनाए जाते हैं। बड़े बिल्डर्स तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से एंटीसिपेटरी बेल लेकर विदेश भाग जाते हैं या फिर अपनी जमानत की शर्तों का मजा लेते हुए आराम से रहते हैं।

दूसरी ओर, जो फसते हैं, वे हैं वे लाखों आम नागरिक, जिन्होंने अपनी उम्रभर की कमाई एक छत के नीचे सुरक्षित रखने की कोशिश की थी। इसके अलावा, जो लोग इन बिल्डरों की ‘दिखावटी बोलचाल’ में आकर या सरकार के डर से उनके साथ काम करते हैं—जैसे छोटे-मोटे ठेकेदार, मजदूर, या सरकारी विभागों में बैठे वो क्लर्क जिन्हें अधिकारियों के कहने पर फाइल आगे बढ़ानी पड़ती है—वे सबसे ज्यादा पिसते हैं। एक तरफ बिल्डर और बड़े अफसर अपनी सत्ता और पैसे के दम पर बाहर बैठे अपनी चाय पीते हैं, और दूसरी तरफ आम आदमी बुलडोजर के सामने रोता हुआ अपने घर की ईंटें बीनता नजर आता है।

मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विनाश का दर्द

जब कोई घर टूटता है, तो उसके मलबे के नीचे दबती सिर्फ ईंटें नहीं होतीं, बल्कि एक परिवार की इज्जत, उसका आत्मविश्वास और उसका मानसिक संतुलन भी दबता है। एक व्यक्ति जिसे सरकार ने ठगा हो, वह इस घाटे को जीवनभर नहीं उठा पाता। बैंक का कर्ज उसके सिर पर तलवार की तरह लटकता रहता है। EMI का भुगतान करने के लिए उसे वह घर भी छोड़ना पड़ता है जिसे उसने कभी अपना समझा था।

बच्चों पर पड़ने वाला मनोवैज्ञानिक दबाव अकल्पनीय होता है। जब वे देखते हैं कि उनके माता-पिता, जो सच्चाई और कठिन परिश्रम के मार्ग पर चलकर घर बनाया, उन्हें एक ऐसी व्यवस्था ने बेघर कर दिया जिसने खुद उस घर को बनने की इजाजत दी थी, तो उनके मन में व्यवस्था के प्रति घृणा और नाराजगी पैदा होती है। यही नाराजगी कभी-कभी असामाजिक तत्वों का शिकार भी बनाती है। एक सिविल सोसायटी का निर्माण तभी संभव है जब नागरिक को यह विश्वास हो कि राज्य उसके साथ धोखाधड़ी नहीं करेगा। दो नंबरी निर्माणों को लेकर सरकार का यह रवैया लोकतंत्र की नींव को ही खोखला कर रहा है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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