A unique mill in the birds’ stomachs: अक्सर हमारी नजरें बगीचों, छतों या खेतों में चिड़ियों पर पड़ती हैं। हम देखते हैं कि वे दाने चुग रही हैं, लेकिन कुछ पल बाद अचानक उनकी नजर किसी छोटे कंकड़ या बजरी पर पड़ती है और वे उसे भी निगल जाती हैं। एक आम इंसान के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि क्या ये पक्षी भूख के मारे पागल हो गए हैं? आखिर कोई जीव पत्थर खाकर अपनी जान क्यों जोखिम में डालता है? दरअसल, यह कोई पागलपन नहीं है, बल्कि प्रकृति का एक बेहद ही सटीक और अनोखा इंजीनियरिंग का कमाल है। आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।
दांतों की कमी और प्रकृति का उपाय
सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि चिड़ियों के मुंह में दांत नहीं होते। मनुष्य या अन्य जानवर भोजन को चबाकर पचाते हैं, लेकिन पक्षी ऐसा नहीं कर सकते। उन्हें भोजन को सीधा निगलना पड़ता है। अब सवाल यह है कि बिना चबाए खाया गया दाना पेट में कैसे पचेगा? इसी समस्या के समाधान के लिए प्रकृति ने उन्हें एक विशेष अंग दिया है, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘गिट्ज़र्ड’ (Gizzard) या हिंदी में ‘पेट की चक्की’ कहा जाता है।
जाने गिट्ज़र्ड कैसे काम करता है?
चिड़ियों का पाचन तंत्र दो अहम हिस्सों में बंटा होता है पहला प्रोवेन्ट्रिकुलस (Proventriculus) यह पेट का पहला हिस्सा है। जब चिड़ी दाना निगलती है, तो वह यहां पहुंचता है। यहां पर भोजन को नरम करने के लिए एन्जाइम्स और आमाशय रस मिलते हैं। दूसरा गिट्ज़र्ड (Gizzard) नरम हुआ भोजन अब इस दूसरे और सबसे मजबूत हिस्से में आता है। यह एक गाढ़ी मांसपेशियों से बना थैलीनुमा अंग है। यहां वो छोटे कंकड़ और पत्थर आते हैं जिन्हें चिड़ी ने दाने के साथ निगला था।
अब कल्पना कीजिए कि एक चक्की के अंदर दाने पड़े हैं और ऊपर से पत्थर पड़ रहे हैं। गिट्ज़र्ड की मांसपेशियां तेजी से सिकुड़ती और फैलती हैं। इस दौरान ये कंकड़ एक दूसरे से और गिट्ज़र्ड की दीवार से टकराते हैं। इस यांत्रिक घर्षण (Mechanical Friction) से दाने पूरी तरह से बारीक पीस जाते हैं। इसके बाद यह पीसा हुआ भोजन आसानी से पच जाता है और चिड़ी के शरीर को पूरा पोषण मिलता है।
क्या पत्थर पेट में हमेशा के लिए रह जाते हैं?
नहीं, यह प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि कंकड़ों की धार और कोने धीरे-धीरे घिसकर चिकनी हो जाते हैं। जब ये पत्थर इतने छोटे और गोल हो जाते हैं कि अब भोजन को पीसने में काम नहीं आ सकते, तो चिड़ी उन्हें अपनी बलवम (पर निकालने की प्रक्रिया) के जरिए शरीर से बाहर निकाल देती है। इसके बाद उसे नए कंकड़ों की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि आपने देखा होगा कि चिड़ियां रोज नए-नए कंकड़ चुगती रहती हैं।
उड़ान भार को कम रखने के लिए दांतों से बेहतर विकल्प
अब यहां एक और दिलचस्प विज्ञान सामने आता है—आखिर प्रकृति ने चिड़ियों को दांत क्यों नहीं दिए? वैज्ञानिकों का मानना है कि आसमान में उड़ने वाले जीवों के लिए उनका वजन बहुत मायने रखता है। अगर चिड़ियों के मुंह में दांत होते और उनके जबड़े भारी होते, तो वे उड़ भी नहीं पातीं या उड़ने में बहुत ज्यादा एनर्जी खर्च होती। इसलिए उत्पर्वन (Evolution) के दौरान चिड़ियों ने भारी दांतों को छोड़ दिया और हल्की चोंच अपना ली, जबकि पचाने का काम पेट के अंदर कंकड़ों के जरिए होने लगा। दिलचस्प बात यह है कि करोड़ों साल पहले के डायनासोर (जिनसे आधुनिक पक्षी विकसित हुए) के जीवाश्मों में भी ऐसे ही कंकड़ पाए गए हैं।
अगर किसी वजह से चिड़ी अपनी जरूरत से ज्यादा या बहुत बड़े पत्थर निगल ले, तो उसका गिट्ज़र्ड ब्लॉक हो सकता है। ऐसा होने पर भोजन आगे नहीं बढ़ पाता, पाचन क्रिया रुक जाती है और चिड़ी की मौत भी हो सकती है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है, प्रकृति ने उन्हें इसके लिए भी एक शानदार इंस्टिंक्ट (स्वाभाविक बुद्धि) दी है। चिड़ियां बिल्कुल सही आकार और मात्रा में कंकड़ चुगती हैं। शोधों से पता चला है कि सर्दियों में जब भोजन मिलना कम हो जाता है, तो चिड़ियां ज्यादा मात्रा में कंकड़ खाती हैं, ताकि हर थोड़े दाने से अधिकतम पोषण निकाला जा सके।
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पालतू पक्षियों और मुर्गियों में ‘ग्रिट’ (Grit) का महत्व
अगर आप पोल्ट्री फार्मिंग से जुड़े हैं या घर पर मुर्गियां पालते हैं, तो यह जानना आपके लिए बहुत जरूरी है। अमेरिका और यूरोप के पक्षी विज्ञानियों की मानें तो मुर्गियों को सिर्फ दाना देना काफी नहीं है। उन्हें ‘ग्रिट’ (Grit) नामक छोटे पत्थरों का मिश्रण जरूर खिलाना चाहिए। बिना ग्रिट के मुर्गियां दाना पूरी तरह से नहीं पचा पातीं, जिससे उनका स्वास्थ्य खराब होता है और अंडे देने की क्षमता में भारी गिरावट आती है।
























