2029 के चुनाव से जुड़ा ‘बड़ा खेल’!

कानून ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को असरहीन बनाते हुए CJI को इस समिति से बाहर कर दिया। अब समिति में केवल प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष बचे हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि तीन सदस्यों वाली समिति में सत्ता पक्ष के पास दो वोट हैं।

सुप्रीम कोर्ट vs मोदी सरकार: चुनाव आयुक्त पर टकराव (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • 2029 से पहले सरकार की 'चाल'
  • CEC की रिटायरमेंट और 2029
  • EC की नियुक्ति पर फैसला किसके हाथ?
  • सरकार की 'देरतरफी' की रणनीति

Focus on 2029 and the political game: भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी निर्वाचन प्रक्रिया की पवित्रता और निष्पक्षता है। यह पवित्रता किसी देवी-देवता की कृपा से नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और उनकी स्वतंत्रता से आती है। इन संस्थाओं में चुनाव आयोग (Election Commission of India) की भूमिका सर्वोपरि है। लेकिन, आज यही चुनाव आयोग संवैधानिक तौर पर ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां कार्यपालिका (सरकार) और न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) के बीच की खाई चौड़ी होती दिख रही है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही गहन सुनवाई केवल किसी कानूनी तकरार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की रक्षा की जंग है। खासकर तब, जब इसके तार सीधे 2029 के लोकसभा चुनाव से जुड़े हुए हैं।

इतिहास और संदर्भ

इस विवाद को समझने के लिए हमें हाल के इतिहास पर नजर डालनी होगी। पहले चुनाव आयुक्तों (मुख्य और अन्य) की नियुक्ति केवल प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति करती थी, जिसमें विपक्ष की कोई भागीदारी नहीं होती थी। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस व्यवस्था को बदल दिया और नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष के साथ-साथ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को भी शामिल करने का आदेश दिया। अदालत का तर्क था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका की भागीदारी आवश्यक है।

हालांकि, इस फैसले के बाद मौजूदा सरकार ने संसद में ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति अधिनियम, 2023’ पास कर दिया। इस कानून ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को असरहीन बनाते हुए CJI को इस समिति से बाहर कर दिया। अब समिति में केवल प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष बचे हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि तीन सदस्यों वाली समिति में सत्ता पक्ष के पास दो वोट (प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री) हैं, जबकि विपक्ष के पास सिर्फ एक। डॉक्टर जया गुप्ता और ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) द्वारा दायर याचिका ठीक इसी बिंदु पर सवाल खड़ा कर रही है कि क्या संसद द्वारा न्यायपालिका के आदेश को इस तरह से अप्रभावी करना संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं है?

संसद की संप्रभुता और कार्यपालिका का विश्वास

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच के समक्ष सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मजबूत ढंग से अपना पक्ष रखा। उनकी दलीलों का केंद्र बिंदु संसद की संप्रभुता है। तुषार मेहता ने अनुच्छेद 324 (2) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि संविधान ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद को कानून बनाने का व्यापक अधिकार दिया है। उनका मानना है कि यह विधायी क्षेत्र का विषय है और न्यायपालिका को इसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

सरकार ने इस मामले को पांच जजों की संवैधानिक बेंच को भेजने की मांग उठाई है। उनका तर्क है कि 2023 के अनूप वर्मा मामले में पांच जजों की बेंच ने ही यह माना था कि संसद कानून बना सकती है। यदि अब कोई चुनौती है, तो उसे उसी आकार की बेंच के सामने रखा जाना चाहिए, ताकि कोई विरोधाभास पैदा न हो।

तुषार मेहता की एक और दलील काफी चर्चित रही, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के पद की पवित्रता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यपालिका के प्रमुख हैं और यह सवाल ही नहीं उठना चाहिए कि वे किसी गलत व्यक्ति की नियुक्ति करेंगे। उन्होंने न्यायपालिका के अपने आंतरिक कामकाज (जहां जज जज को चुनते हैं) का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह देश न्यायपालिका पर भरोसा करता है, उसी तरह कार्यपालिका के इरादों पर भी विश्वास किया जाना चाहिए।

संदेह का युग और विलंब की राजनीति

सरकार की इन दलीलों पर याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया और प्रशांत भूषण ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। हंसरिया ने सरकार की मंशा पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने बेंच का ध्यान उस समय की ओर दिलाया, जब मामले की सुनवाई चल रही थी। उनका कहना था कि जब मामले की 28वें दिन की सुनवाई चल रही है और अब तक सारे तथ्यों पर बहस हो चुकी है, तभी सरकार ने अचानक मामले को बड़ी बेंच में ट्रांसफर करने की मांग उठाई है। इसे उन्होंने सरकार की देरतरफी और मामले को लटकाने की रणनीति करार दिया।

लोकतंत्र में व्यक्ति की पवित्रता पर विश्वास करने के बजाय संस्थाओं की निष्पक्षता पर भरोसा किया जाता है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य सवाल यह है कि जब समिति में सत्ता पक्ष के दो वोट और विपक्ष का एक वोट है, तो नियुक्ति प्रक्रिया गैर-पक्षपाती कैसे रहेगी? CJI को हटाकर सरकार ने तटस्थ पक्ष को ही खत्म कर दिया है, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए घातक साबित हो सकता है।

2029 का कनेक्शन

इस पूरे विधिक और संवैधानिक घमासान के पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक और व्यावहारिक कनेक्शन 2029 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। यही वो बिंदु है जो इस मामले को साधारण कानूनी विवाद से निकालकर एक उच्च-दांव वाली राजनीतिक चुनौती बनाता है।

समयरेखा को ध्यान में रखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 में समाप्त हो रहा है। इसके अलावा, चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू जुलाई 2028 में रिटायर होने वाले हैं। 2029 का लोकसभा चुनाव मार्च 2029 में प्रस्तावित है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग के दो बड़े पद खाली होने वाले हैं।

अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले को तत्काल निपटाता है और CJI को वापस समिति में लाने का आदेश देता है, तो 2029 के चुनाव से पहले नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक पारदर्शी और संतुलित समिति करेगी। लेकिन, अगर सरकार की मांग मान ली जाती है और मामला पांच जजों की बेंच को चला जाता है, तो कानूनी प्रक्रिया में कई महीनों का समय लगेगा।

इस देरी का फायदा सरकार को ही मिलेगा। क्योंकि तब तक मौजूदा कानून (जिसमें CJI नहीं है) बना रहेगा। सरकार इसी कानून के तहत 2028-29 में अपनी पसंद के लोगों को चुनाव आयुक्त बना सकती है। एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद, चाहे सुप्रीम कोर्ट बाद में कोई भी फैसला क्यों न दे दे, उन नियुक्तियों को रद्द करना लगभग असंभव हो जाएगा। सरल शब्दों में, मामले को बड़ी बेंच में भेजने की रणनीति वास्तव में ‘वक्त बिताने’ (Buying time) की रणनीति है, ताकि 2029 के चुनाव के लिए अनुकूल चुनाव आयोग का गठन हो सके। यही वजह है कि विजय हंसरिया जैसे वरिष्ठ वकील सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।

न्यायपालिका की सचेतता

इस पूरे घमासान में सबसे महत्वपूर्ण और आशा जगाने वाला पहलू रहा जस्टिस दीपांकर दत्ता का रुख। जब सरकार के वकील प्रधानमंत्री की पवित्रता और उनके फैसलों पर सवाल न उठाने की बात कर रहे थे, तब जस्टिस दत्ता ने एक ऐसा सवाल पूछा जिसने पूरे तर्क को धराशायी कर दिया। उन्होंने पूछा, “क्या आप बता सकते हैं कि देश में कितने दागी मंत्री हैं?”

यह टिप्पणी बेहद गंभीर है। इससे स्पष्ट संदेश गया कि न्यायपालिका व्यक्ति के पद या व्यक्तिगत ईमानदारी पर नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन पर विचार कर रही है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी पद पर बैठे व्यक्ति की ईमानदारी को चुनौती देने का अर्थ यह नहीं है कि हम उस व्यक्ति पर अविश्वास करते हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि हम उस पद की शक्ति को तार्किक और संवैधानिक सीमाओं में बांधना चाहते हैं।

सुनवाई के अंत में जस्टिस दत्ता ने एक पुरानी और प्रसिद्ध लैटिन कहावत का जिक्र किया—”Justice must not only be done, but must also be seen to be done” (न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखना चाहिए)। उन्होंने इसे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर लागू करते हुए कहा कि पारदर्शी नियुक्ति केवल होनी भी नहीं चाहिए, बल्कि होती हुई भी दिखनी चाहिए। यदि देश को लगेगा कि चुनाव आयोग की नियुक्तियां सरकार की मर्जी से हो रही हैं, तो चुनाव प्रक्रिया के प्रति जनता के मन में जो विश्वास है, वह खत्म हो जाएगा। अदालत ने सभी पक्षों से लिखित हलफनामे मांगे हैं, जो इंगित करता है कि न्यायपालिका कोई जल्दबाजी में आया फैसला नहीं देने वाली, लेकिन सरकार की ओर से आने वाली देरतरफी की रणनीतियों को भी वह आसानी से नहीं अपनाने देगी।

लोकतंत्र का भविष्य: संतुलन की कसौटी

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला केवल तीन लोगों की नौकरी देने का मामला नहीं है। यह 130 करोड़ भारतीयों के भविष्य का फैसला करने वाली उस संस्था की स्वतंत्रता का सवाल है, जो किसी भी सरकार को बनाती है और तोड़ती है। अगर कार्यपालिका को चुनाव आयुग की नियुक्तियों में पूर्ण बहुमत हासिल हो जाता है, तो यह एक खतरनाक संकेत है।

संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र इसलिए बनाया था, ताकि चुनावों के आयोजन में सत्तारूढ़ दल का कोई दखल न हो। CJI को चयन समिति से हटाना इसी स्वतंत्रता पर प्रहार है। 2029 के चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां राजनीतिक दल अपनी विचारधारा की जगह ‘जातीय और धार्मिक समीकरणों’ पर ज्यादा निर्भर कर रहे हैं। ऐसे में एक कमजोर या सरकार के इशारों पर चलने वाला चुनाव आयोग देश को अराजकता की ओर धकेल सकता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now