Find out the full cost of the government bungalow:दिल्ली के लुटियंस जोन (Lutyens’ Zone) को अक्सर शाही ठाठ-बाट और विरासत का पर्याय माना जाता है। यहां मौजूद केंद्रीय मंत्रियों के आधिकारिक आवास न केवल भारत सरकार की शान हैं, बल्कि इन्हें देश की सबसे महंगी और कीमती सरकारी संपत्तियों में गिना जाता है। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि इन बड़े-बड़े बंगलों को सही सलामत रखने के लिए सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ता है?
हाल ही में एक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन के जरिए जो जानकारी सामने आई है, वह चौंकाने वाली है। आइए बिना किसी भ्रम के डिटेल में समझते हैं कि इन मंत्री आवासों के रखरखाव पर एक साल में कितनी रकम खर्च होती है और यह खर्च इतना बढ़ क्यों रहा है।
2025-26 का रिकॉर्ड बजट: ₹92.35 करोड़
RTI से प्राप्त आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान दिल्ली में बने केंद्रीय मंत्रियों के बंगलों की मरम्मत, रेनोवेशन और अन्य रखरखाव कार्यों पर कुल ₹92.35 करोड़ खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
यह पूरा काम केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) द्वारा किया जाता है, जिसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद सरकारी भवनों और आवासीय संपत्तियों को दुरुस्त रखना है।
एक बंगले का औसत खर्च: लगभग ₹1.2 करोड़ प्रति वर्ष
अगर हम इस कुल बजट का गणित निकालें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद में आमतौर पर कैबिनेट मंत्रियों और राज्य मंत्रियों को मिलाकर कुल 70 से 72 सदस्य होते हैं। ₹92.35 करोड़ को 72 पर विभाजित करने पर पता चलता है कि प्रति मंत्री बंगले का औसत वार्षिक खर्च लगभग ₹1.2 करोड़ बैठता है।
हालांकि, यह राशि सिर्फ एक औसत है। असलियत में यह खर्च बंगले से बंगले तक काफी अलग हो सकता है। किसी आवास में सिर्फ पेंटिंग और प्लंबिंग का काम हो सकता है, तो किसी में बड़े स्तर पर स्ट्रक्चरल रिपेयर की जरूरत हो सकती है।
11 सालों का खर्च: ₹547.68 करोड़
जब हम इसे लंबे समय के लेंस में देखते हैं, तो यह आंकड़ा और भी विशाल दिखता है। वर्ष 2014-15 से लेकर 2025-26 के बीच के लगभग एक दशक के दौरान, CPWD ने इन मंत्री आवासों को मेंटेन रखने के लिए कुल ₹547.68 करोड़ खर्च कर दिए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि सरकारी खजाने पर लगातार कितना भारी बोझ पड़ रहा है।
खर्च में आई भारी बढ़ोतरी (3 गुना उछाल)
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह खर्च हर साल रिकॉर्ड तोड़ रहा है। RTI डेटा कुछ चौंकाने वाले तथ्य बयां करता है:
- 2014 से 2019 के बीच: औसत वार्षिक खर्च सिर्फ ₹26.78 करोड़ था।
- 2019 से 2024 के बीच: यह औसत बढ़कर लगभग ₹50 करोड़ प्रति वर्ष हो गया।
- 2024-25: यह आंकड़ा बढ़कर ₹71.98 करोड़ पर पहुंच गया।
- 2025-26: अब यह ₹92.35 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा है।
यदि हम 2014-15 के खर्च (लगभग ₹27 करोड़) की तुलना अब के बजट से करें, तो यह लगभग 3 गुना (300%) बढ़ चुका है।
आखिर इतना पैसा कहां और क्यों खर्च होता है?
इस भारी बजट के पीछे कई तार्किक और तकनीकी कारण हैं:
- बढ़ती उम्र और औपनिवेशिक विरासत: लुटियंस जोन में मौजूद ज्यादातर बंगले 80 से 100 साल पुराने हैं। ये इमारतें ब्रिटिश शासन के दौर की हैं। इतनी पुरानी इमारतों में ढांचागत कमजोरियां आम बात है, जिन्हें बार-बार मरम्मत की जरूरत होती है।
- नमी और दीमक का प्रकोप: दिल्ली की मौसमी नमी और बारिश इन पुराने भवनों के सबसे बड़े दुश्मन हैं। दीवारों और फर्श में घुसी नमी को सुखाना और उसे रोकना महंगा काम है। इसके अलावा, दीमक का संक्रमण इन बंगलों में तेजी से फैलता है, जो लकड़ी के दरवाजे, खिड़कियों और अन्य संरचनात्मक लकड़ी को अंदर से खोखला कर देती है। इसके लिए लगातार कीटनाशक उपचार कराना पड़ता है।
- पुरानी बिजली और पानी की लाइनें: दशकों पुरानी प्लंबिंग पाइपलाइनें अक्सर लीक हो जाती हैं और बिजली का पुराना सिस्टम आधुनिक एसी और गैजेट्स के लोड को बर्दाश्त नहीं कर पाता। इन्हें बदलना और अपग्रेड करना भारी खर्च का सौदा है।
- रोजमर्रा की टूट-फूट और फिटिंग्स: बंगलों में लगे पंखे, एलईडी लाइट्स, सैनिटरी फिटिंग्स और टाइल्स का रोजाना इस्तेमाल होता है। इनकी नियमित बदलवाटी और मरम्मत में भी करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं।
- महंगाई और बढ़ती श्रम लागत: आखिरी और सबसे बड़ी वजह है महंगाई। पिछले 10 सालों में सीमेंट, आयरन (स्टील), टाइल्स, और इलेक्ट्रिकल वायरिंग मैटेरियल की कीमतें आसमान छू गई हैं। साथ ही, मजदूरों की मजदूरी और स्पेशलिस्ट कंट्रैक्टर्स की फीस भी काफी बढ़ गई है। जो काम पहले कम दाम में होता था, वह अब दोगुने-तिगुने दाम में हो रहा है।
केंद्रीय मंत्रियों के बंगलों पर सालाना लगभग ₹92 करोड़ का खर्च सिर्फ एक आलीशान जीवनशैली का नहीं, बल्कि एक सदी पुरानी औपनिवेशिक विरासत को खड़ा रखने और उसे सुरक्षित बनाए रखने की चुनौती का प्रतीक है। हालांकि, इस बढ़ते हुए खर्च ने जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच एक बहस जरूर छेड़ दी है कि क्या इन पुरानी इमारतों को बचाने के लिए हर साल इतनी बड़ी रकम खर्च करना वास्तव में जनता के पैसे का सही इस्तेमाल है?

























