Environment and Heart Health:आज के समय में प्लास्टिक का उपयोग हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। हम बिना सोचे-समझे प्लास्टिक की बोतलों से पानी पीते हैं, प्लास्टिक बैग में अपनी जरूरी वस्तुएं खरीदते हैं और सिंथेटिक कपड़े पहनते हैं। इस सुविधा ने जीवन को आसान तो बना दिया है, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी तेजी से सामने आ रहे हैं। पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है, और अब नई रिसर्च ने हमें हैरान कर देने वाला खुलासा किया है कि प्लास्टिक के छोटे कण इंसानों के शरीर में भी प्रवेश कर रहे हैं।
प्लास्टिक का बढ़ता प्रभाव और नई रिसर्च का खुलासा
प्लास्टिक की आदत इतनी आम हो गई है कि इसकी छोटी-छोटी परतें हमारे शरीर में घुसने लगी हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि हमारे खून, फेफड़ों, दिल, यहां तक कि गर्भाशय (प्लेसेंटा) और दिमाग में भी माइक्रोप्लास्टिक (प्लास्टिक के सूक्ष्म कण) पाए गए हैं। यह पहली बार है जब इंसानी रक्त में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का पता चला है। खास बात यह है कि यह कण हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग, यानी दिल की रक्त वाहिकाओं में भी पहुंच गए हैं।
यह खतरनाक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब हम सांस लेते हैं या वातावरण में मौजूद प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण हमारे फेफड़ों तक पहुंचते हैं। सिंथेटिक कपड़ों के रेशे, टायर के घिसने से निकलने वाले प्लास्टिक के सूक्ष्म कण, और प्लास्टिक की बोतलों से निकलने वाले पार्टिकल्स हवा में मौजूद रहते हैं। ये कण इतनी बारीक होते हैं कि हम इन्हें देख भी नहीं सकते। जब कोई व्यक्ति सिगरेट का धुआं पीता है या प्रदूषित हवा में सांस लेता है, तो ये प्लास्टिक के कण फेफड़ों के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंच जाते हैं। वहां से यह कण आसानी से खून में मिल जाते हैं।
यह खतरनाक क्यों है?
हाल ही में यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित हुई एक स्टडी ने यह साबित किया है कि इंसान के हृदय संबंधी रोगों का कारण बनने वाले कई कारकों में माइक्रोप्लास्टिक का योगदान भी हो सकता है। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि स्मोकिंग करने वाले व्यक्तियों के दिल की रक्त वाहिकाओं में सूक्ष्म और नैनो प्लास्टिक कण छह गुना अधिक पाए गए हैं। यानी कि स्मोकिंग और प्रदूषण इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों के शरीर में प्रवेश का मुख्य जरिया हैं।
कौन-कौन से लोग अधिक खतरे में?
इस अध्ययन में 61 हृदय रोगियों का विश्लेषण किया गया। इन मरीजों को तीन समूहों में बांटा गया:
- हार्ट अटैक वाले मरीज: इनमें सबसे अधिक नैनोप्लास्टिक पाए गए। इनमें 84 प्रतिशत मरीजों के रक्त में सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक कण पाए गए।
- कृत्रिम धमनी रोग वाले मरीज: इन मरीजों में ये कण 40 प्रतिशत पाए गए।
- सामान्य स्वस्थ व्यक्ति: जिनकी धमनी सामान्य थीं, उनमें इन कणों की मौजूदगी सबसे कम, यानी लगभग 32 प्रतिशत थी।
इससे पता चलता है कि इन सूक्ष्म कणों का हृदय की बीमारियों से गहरा संबंध है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण और स्मोकिंग इन कणों के शरीर में प्रवेश का रास्ता आसान बनाते हैं, जो हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकते हैं।
यह अध्ययन यह भी बताता है कि प्लास्टिक के सूक्ष्म कण हमारे खून में जाकर सूजन (इंफ्लामेशन) को बढ़ावा देते हैं। यह सूजन हृदय की रक्त वाहिकाओं में फैट के जमाव को अस्थिर कर सकती है, जिससे हृदयाघात का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा, नैनोप्लास्टिक पॉलीइथिलीन जैसे प्लास्टिक का स्तर उन मरीजों में सबसे अधिक पाया गया है, जिन्होंने दिल का दौरा पड़ा था।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव
यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि हमारा पर्यावरण और हमारी जीवनशैली हमें इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों से बचाने में सक्षम नहीं हैं। सिंथेटिक वस्त्र, वाहनों के टायर घिसाव, और प्लास्टिक की बोतलें हवा में सूक्ष्म कण छोड़ती हैं। ये कण सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचते हैं, जहां से वे रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं।
स्मोकिंग और प्रदूषित वातावरण इन कणों के शरीर में प्रवेश का सबसे बड़ा कारण हैं। खासतौर पर स्मोकिंग करने वालों और प्रदूषण भरे इलाकों में रहने वालों के लिए यह खतरा दो गुना अधिक हो सकता है।
इस खतरे से खुद को बचाने के लिए हमें अपने जीवनशैली में बदलाव लाना चाहिए। धूम्रपान से बचें, एयर पॉल्यूशन से सावधानी बरतें, और स्वच्छ वातावरण में रहने का प्रयास करें। साथ ही, नियमित स्वास्थ्य जांच कराकर अपने हृदय की सेहत का ध्यान रखें। यह रिसर्च एक चेतावनी है कि हमें अपने पर्यावरण और अपनी सेहत दोनों का ख्याल रखने की जरूरत है।


























