P Governor Anandiben Patel On Leave: भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यपाल का पद किसी सामान्य सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के समकक्ष नहीं है। यह पद पूरी तरह से संवैधानिक होता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के अचानक 17 अगस्त से 26 अगस्त तक अपने गृह राज्य गुजरात के दौरे पर चले जाने के बाद एक विशेष सवाल ने जनमानस और राजनीतिक गलियारों में जगह बना ली—आखिर राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख को छुट्टी कौन देता है? क्या उन्हें भी किसी को आवेदन देना पड़ता है?
आइए इस पूरी प्रक्रिया को संवैधानिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से समझते हैं।
राज्यपाल को अवकाश देने वाला ‘सक्षम प्राधिकारी’ कौन है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत राज्यपाल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वहीं, अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति की ‘इच्छा’ पर पद पर बने रहते हैं। चूंकि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए केंद्रीय या राज्य सरकार का कोई भी मंत्री या अधिकारी उन्हें छुट्टी नहीं दे सकता।
राज्यपाल को छुट्टी या अवकाश देने का एकमात्र और अंतिम अधिकार भारत के राष्ट्रपति के पास होता है। बिना राष्ट्रपति भवन (Rashtrapati Bhavan) की औपचारिक मंजूरी के कोई भी राज्यपाल अपना मुख्यालय (राजभवन) नहीं छोड़ सकता है।
छुट्टी के लिए आवेदन कहां और कैसे किया जाता है?
आम नौकरशाही में जहां कर्मचारी अपने विभागाध्यक्ष को लीव आवेदन देते हैं, वहीं राज्यपाल की प्रक्रिया बेहद विशिष्ट और गोपनीय होती है। जब राज्यपाल को व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ब्रेक लेना होता है, तो इसकी प्रक्रिया इस प्रकार होती है:
- आवेदन पत्र का प्रारूप: राज्यपाल का सचिव या कार्यालय एक औपचारिक पत्र तैयार करता है, जिसमें अवकाश की अवधि, कारण और गंतव्य स्थल की जानकारी होती है।
- राजभवन से राष्ट्रपति भवन: यह पत्र सीधे तौर पर ‘भारत के राष्ट्रपति’ को संबोधित होता है। राजभवन का प्रशासनिक तंत्र इसे गृह मंत्रालय (भारत सरकार) के राज्य विभाग के माध्यम से राष्ट्रपति सचिवालय को भेजता है।
- मंजूरी: जब तक राष्ट्रपति की ओर से स्वीकृति (Approval) का औपचारिक दस्तावेज राजभवन को वापस नहीं आ जाता, तब तक राज्यपाल का यह दौरा ‘अनधिकृत’ माना जाता है। आनंदीबेन पटेल ने भी गुजरात जाने से पहले यही प्रक्रिया पूरी की थी।
क्या राज्यपालों के लिए भी छुट्टियों का कोई ‘कोटा’ होता है?
यह सवाल बहुत दिलचस्प है। केंद्रीय और राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए CASUAL LEAVE (CL), EARNED LEAVE (EL) और MEDICAL LEAVE (ML) जैसे स्पष्ट कोटा होते हैं, लेकिन ‘राज्यपाल नियमावली’ के तहत राज्यपालों के लिए छुट्टियों की कोई सीमा या वार्षिक कोटा निर्धारित नहीं है।
इसका मुख्य कारण यह है कि राज्यपाल का पद एक ‘निरंतर बना रहने वाला संवैधानिक दायित्व’ (Continuous Constitutional Obligation) है, न कि 9 से 5 की नौकरी। हालांकि, प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने के लिए राज्यपाल प्रमुखतः तीन ही परिस्थितियों में लंबा अवकाश लेते हैं:
- स्वास्थ्य लाभ: नियमित इलाज या आकस्मिक बीमारी के कारण।
- पारिवारिक और व्यक्तिगत आवश्यकता: गृह राज्य का दौरा या पारिवार में कोई विशेष अवसर।
- निजी दौरे: किसी धार्मिक या गैर-आधिकारिक स्थल की यात्रा।
राज्यपाल की गैर-उपस्थिति में राज्य का कामकाज कैसे चलता है?
संवैधानिक व्यवस्था में यह सुनिश्चित किया गया है कि राज्यपाल का पद एक पल के लिए भी ‘खाली’ नहीं रह सकता। अगर राज्यपाल बीमार हों, बाहर चले गए हों या पद से हट गए हों, तो भारतीय संविधान का अनुच्छेद 160 काम आता है।

जब राज्यपाल छुट्टी पर होते हैं, तो राष्ट्रपति भवन द्वारा एक विशेष अधिसूचना जारी की जाती है। इसके तहत राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल के अतिरिक्त कर्तव्यों का प्रभार दिया जाता है। वह विधानसभा के सत्रावसान, विधेयकों पर हस्ताक्षर या मंत्रिमंडल की सलाह पर आवश्यक प्रशासनिक निर्णय ले सकते हैं।
कई बार ऐसा भी होता है कि राष्ट्रपति किसी पड़ोसी राज्य के राज्यपाल को दो राज्यों का अतिरिक्त प्रभार सौंप देते हैं।
छुट्टी के दौरान वेतन, भत्ते और सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है?
एक सामान्य कर्मचारी की तरह राज्यपाल के वेतन या भत्तों पर छुट्टी का कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है। अवकाश के दौरान भी उन्हें उनका पूरा वेतन, निवास भत्ता और अन्य सुविधाएं बिना किसी कटौती के प्रदान की जाती हैं।
इसके अलावा, पद की सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए, राज्यपाल जहां भी जाते हैं, उनके साथ राज्य सरकार के सुरक्षा कर्मियों का एक विशेष दस्ता और अधिकारी हमेशा मौजूद रहते हैं। उनकी यात्रा और ठहरने का पूरा खर्च राज्य शासन वहन करता है।

























