Discover the secret behind Mars’ blue sunset: जब भी हम सूर्यास्त का जिक्र करते हैं, तो हमारे दिमाग में आकाश में बिखरे हुए लाल, नारंगी और गुलाबी रंगों का एक खूबसूरत नजारा उभरता है। पृथ्वी पर यह दृश्य किसी जादू से कम नहीं लगता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आप सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह पर होते, तो सूर्यास्त कैसा दिखता? अंतरिक्ष विज्ञान के लिए यह एक बेहद दिलचस्प सवाल है।
नासा (NASA) के ‘क्यूरियोसिटी रोवर’ ने जब मंगल ग्रह से सूर्यास्त की तस्वीरें भेजीं, तो वैज्ञानिकों और आम लोगों के लिए यह एक चौंकाने वाला अनुभव था। लाल ग्रह पर डूबता हुआ सूरज नीला दिखाई देता है! यह दृश्य पृथ्वी पर हमारे अनुभव का बिल्कुल उलट है। आइए विज्ञान के उस छिपे हुए राज को समझते हैं, जो मंगल के आकाश को इतना अद्भुत बनाता है।
पृथ्वी पर सूर्यास्त के रंगों का राज
मंगल को समझने से पहले, हमें अपनी धरती का भौतिकी का नियम समझना होगा। हमारा वायुमंडल मुख्य रूप से नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं से निर्मित है। ये गैस के कण प्रकाश की तरंगदैर्घ्य की तुलना में काफी छोटे होते हैं।
जब सूरज का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो ये छोटे कण एक खास प्रक्रिया का पालन करते हैं, जिसे ‘रेली स्कैटरिंग’ कहते हैं। सूरज के प्रकाश में सात रंग होते हैं। इनमें नीले रंग की तरंगदैर्घ्य सबसे छोटी होती है, जबकि लाल रंग की सबसे लंबी। छोटी तरंगदैर्घ्य वाली नीली रोशनी इन गैस अणुओं से टकराकर सबसे ज्यादा और तेजी से बिखर जाती है। दिन के समय यही बिखरी हुई नीली रोशनी हमारी आंखों तक पहुंचती है, इसलिए आकाश नीला दिखता है।
लेकिन सूर्यास्त के समय सूरज क्षितिज के करीब हो जाता है। अब प्रकाश को वायुमंडल से गुजरने का एक बहुत लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इस लंबी यात्रा में नीला रंग इतना ज्यादा बिखर जाता है कि वह हम तक नहीं पहुंच पाता। जो रोशनी बचती है, वह मुख्य रूप से लंबी तरंगदैर्घ्य वाले लाल, नारंगी और पीले रंग की होती है। इसी वजह से पृथ्वी पर सूर्यास्त लाल-नारंगी दिखता है।

मंगल ग्रह का वातावरण
अब बात करते हैं मंगल ग्रह की। यहां की कहानी बिल्कुल अलग है। मंगल का वातावरण पृथ्वी की तुलना में लगभग 100 गुना ज्यादा पतला है। लेकिन इस पतले वातावरण में गैसों की जगह कुछ और हावी है—धूल।
मंगल के आकाश में बहुत ज्यादा मात्रा में बारीक धूल के कण उड़ते रहते हैं। ये कण आकार में बेहद सूक्ष्म होते हैं और इनमें भारी मात्रा में ‘आयरन ऑक्साइड’ पाया जाता है। यही लोहा मंगल ग्रह की सतह और उसके वातावरण को लाल रंग का बनाता है, जिसे हम ‘लाल ग्रह’ के नाम से जानते हैं।
दिन में मंगल का आकाश क्यों है लाल-भूरा?
धरती पर दिन में आकाश नीला होता है, लेकिन मंगल पर दिन के समय आकाश लाल-भूरे, गुलाबी या बटरस्कॉच रंग का दिखता है। इसका कारण वही उड़ता हुआ लोहे का धूल है। यह धूल सूरज की रोशनी में मौजूद नीले रंग को अवशोषित कर लेती है या उसे इधर-उधर बिखा देती है, जिससे लाल और नारंगी रंग ही हमारी आंखों तक पहुंच पाते हैं।
अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर—आखिर यह नीला सूर्यास्त कैसे बनता है? इसके पीछे भौतिकी का एक और नियम काम करता है, जिसे ‘माई स्कैटरिंग’ कहते हैं।
जब प्रकाश किसी ऐसे कण से टकराता है जिसका आकार प्रकाश की तरंगदैर्घ्य के बराबर या उससे बड़ा होता है, तो माई स्कैटरिंग होता है। मंगल की धूल के कण पृथ्वी के गैस अणुओं से बड़े होते हैं। ये कण प्रकाश को उसी तरह बिखारते हैं जैसे कोई कार हेडलाइट में आती धूल को आगे की तरफ धकेलती है। इसे ‘फॉरवर्ड स्कैटरिंग’ कहते हैं।
नीले सूर्यास्त का अंतिम चेहरा कैसे बनता है?
जब मंगल ग्रह पर सूर्यास्त होता है, तो सूरज क्षितिज के बिल्कुल करीब हो जाता है। अब सूरज की किरणों को मंगल के धूल भरे वातावरण से एक बहुत ही लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।
इस लंबी यात्रा के दौरान धूल के कण अपना कमाल दिखाते हैं। ये कण ‘माई स्कैटरिंग’ के जरिए लाल और पीले रंग की लंबी तरंगों को आगे की दिशा में इतनी तेजी से बिखा देते हैं कि वे सूरज के ठीक चारों ओर के क्षेत्र से बाहर निकल जाती हैं।
नतीजतन, जो रोशनी सबसे अंत में सीधे हमारी आंखों तक पहुंचती है, वह मुख्य रूप से नीले रंग की होती है। क्योंकि लाल रंग धूल से टकराकर बिखर गया, और नीला रंग उस निशाने पर बना रह गया। इसी वजह से मंगल ग्रह पर डूबते हुए सूरज के चारों ओर एक अद्भुत और शांत नीली चमकदिखाई देती है।
























