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कर्नाटक में ‘सोशल जस्टिस’ की राजनीति तेज

सीएम सिद्धारमैया ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर इस फैसले की जानकारी साझा करते हुए एक विस्तृत बयान जारी किया। उन्होंने लिखा कि जब वे पहली बार (2013 में) मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने राज्य के हर समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने के लिए इस सर्वेक्षण को शुरू किया था।

सिद्धारमैया का बड़ा दांव: इस्तीफे की अटकलों के बीच जातिगत जनगणना रिपोर्ट को मंजूरी

HIGHLIGHTS

  • सिद्धारमैया के फैसले ने बदली सियासत
  • डीके शिवकुमार बनाम सिद्धारमैया
  • रिपोर्ट मंजूरी से बदले सत्ता समीकरण
  • कर्नाटक की राजनीति में नया मोड़
  • सिद्धारमैया ने चला सबसे बड़ा सामाजिक दांव

Siddaramaiah AHINDA Politics Masterstroke: कर्नाटक की सियासत इन दिनों एक अनूठे संकट और रणनीतिक दांव के बीच फंसी हुई है। एक ओर जहां राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इस्तीफे की अटकलों ने पारा चढ़ा दिया है, वहीं दूसरी ओर सिद्धारमैया ने ऐसा कदम उठाया है जो उन्हें राज्य की राजनीति में एक बार फिर ‘जननायक’ का दर्जा दिला सकता है। संभावित इस्तीफे से ठीक 24 घंटे पहले सीएम सिद्धारमैया ने कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की ‘सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण’ रिपोर्ट को सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया है। आम भाषा में इसे कर्नाटक की ‘जातिगत जनगणना’ की रिपोर्ट कहा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कोई साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक शतरंज का दांव है। जब पूरा प्रदेश यह अनुमान लगा रहा था कि क्या सिद्धारमैया नेतृत्व परिवर्तन के समझौते के तहत अपनी कुर्सी छोड़ेंगे, उस समय इस संवेदनशील और लंबे समय से लंबित मुद्दे पर मुहर लगाकर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे अभी भी राज्य की सियासत के ‘अखाड़े’ में मुक्केबाजी करने के लिए तैयार हैं।

‘अहिंदा’ का सियासी ठिकाना मजबूत करने की रणनीति

सिद्धारमैया की राजनीतिक विरासत हमेशा से सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के उत्थान से जुड़ी रही है। उनके राजनीतिक जीवन का मूल मंत्र ‘अहिंदा’ (Ahinda) रहा है, जिसका अर्थ है- अल्पसंख्यक (Minorities), हिंदू ओबीसी (OBCs) और दलित (Dalits). यह वो तिकड़ी है जो कर्नाटक की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती है। जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को मंजूरी देना, सीधे तौर पर इसी ‘अहिंदा’ वोटबैंक को साधने का एक प्रयास है।

विश्लेषकों का कहना है कि इस रिपोर्ट को स्वीकार करके सिद्धारमैया ने एक संदेश देने की कोशिश की है कि चाहे शक्ति के केंद्र में रहें या बाहर, वे पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए हमेशा खड़े रहेंगे। यह कदम उन्हें पिछड़े वर्गों के ‘सबसे बड़े चैंपियन’ के रूप में स्थापित करता है, जो भविष्य में चाहे वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहें या नहीं, उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता को बरकरार रखेगा।

सोशल मीडिया पर जारी किया गया विस्तृत बयान

सीएम सिद्धारमैया ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर इस फैसले की जानकारी साझा करते हुए एक विस्तृत बयान जारी किया। उन्होंने लिखा कि जब वे पहली बार (2013 में) मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने राज्य के हर समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने के लिए इस सर्वेक्षण को शुरू किया था। उनका उद्देश्य आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं को और वैज्ञानिक आधार प्रदान करना था।

अपनी पोस्ट में उन्होंने पिछली सरकारों (जिसमें बीजेपी का शासन भी शामिल है) पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बाद आई सरकारों ने इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। सिद्धारमैया ने कहा, “बाद की सरकारों ने रिपोर्ट को लागू करने में रुचि नहीं दिखाई, जिससे यह सर्वे, जो अब लगभग एक दशक पुराना हो चुका है, दबकर रह गया।” उन्होंने कहा कि दूसरी बार सीएम बनने के बाद उन्होंने इसे और अधिक वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से एकत्रित करने का निर्देश दिया ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।

यह रिपोर्ट क्यों है खास?

इस रिपोर्ट को लेकर पिछले कई दिनों से राज्य में उत्सुकता थी। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने बुधवार को मुख्यमंत्री को यह रिपोर्ट सौंपी थी। माना जा रहा है कि इस सर्वेक्षण में राज्य की जातिगत संरचना, उनकी आर्थिक स्थिति और शैक्षिक प्रगति का विस्तृत डेटा है। यह रिपोर्ट भविष्य में ओबीसी और अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के लिए आधार का काम करेगी।

कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की राजनीतिक ताकत के सामने छोटे ओबीसी समूहों की आवाज को बुलंद करने में यह रिपोर्ट मील का पत्थर साबित हो सकती है। सिद्धारमैया ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह रिपोर्ट ‘सोशल जस्टिस’ यानी सामाजिक न्याय को जमीन पर उतारने के लिए एक मार्गदर्शक का काम करेगी।

नेतृत्व परिवर्तन के दांवपेच के बीच यह कदम

बता दें कि कर्नाटक में कांग्रेस हाईकमान और राज्य इकाई के बीच सत्ता के समीकरण को लेकर चर्चा तेज थी। 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने घोषणा की थी कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार में से एक 2.5 साल (30 महीने) के लिए सीएम बनेंगे। अब समय सीमा पूरी होने वाली है और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को अगला सीएम बनाने की मांग उठ रही थी। ऐसी स्थिति में सिद्धारमैया दबाव में थे कि वे पद छोड़ दें।

लेकिन, इस बीच जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को मंजूरी देना साबित करता है कि सिद्धारमैया अपनी बात मनवाने और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में माहिर हैं। यह कदम पार्टी आलाकमान के लिए भी एक मुश्किल स्थिति पैदा कर सकता है। अगर अब सिद्धारमैया को हटाया गया, तो यह संदेश जा सकता है कि पार्टी ने उस नेता को हटाया जो पिछड़ों के लिए सबसे बड़ा काम कर रहा था। इससे पिछड़ा वर्ग का वोटबैंक नाराज हो सकता है, जो कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकता है।

विरासत और भविष्य की राजनीति

संक्षेप में, सिद्धारमैया का यह कदम एक तरह से ‘विन-विन’ की स्थिति पैदा करता है। अगर वे इस्तीफा देते भी हैं, तो वे एक ऐसे नेता के रूप में जाएंगे जिन्होंने पिछड़े वर्गों को एक ठोस आधार दिया। और अगर वे बने रहते हैं, तो यह रिपोर्ट उन्हें कार्यकाल को आगे बढ़ाने का एक बड़ा मुद्दा देगी। यह कदम कर्नाटक की सियासत में सामाजिक न्याय की बहस को एक नए स्तर पर पहुंचा देगा और सिद्धारमैया को अपनी विरासत को दीर्घकालिक बनाने का अवसर प्रदान करता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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