Mumbai BMC News: महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में सत्ता के गलियारों में एक बार फिर से सनसनीखेज राजनीति देखने को मिली है। जब पूरा शहर सो रहा था, तब सीएम देवेंद्र फडणवीस के फोन पर एक ऐसी कॉल आई जिसने राज्य के सियासी समीकरणों को हिला कर रख दिया। यह कॉल थी शिवसेना (यूबीटी) के गढ़ ‘मातोश्री’ से। देर रात हुई इस बातचीत ने न केवल बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) में होने वाले एक बड़े बदलाव को रोक दिया, बल्कि शिंदे गुट की मंशा पर भी पानी फेर दिया। इस पूरे घटनाक्रम में पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे की चतुर राजनीति और पर्दे के पीछे चल रही ‘ठाकरे-फडणवीस’ की नई जुगलबंदी की चर्चा जोरों पर है।
मातोश्री से वर्सा तक की सीक्रेट कॉल
दरअसल, मामला BMC की ‘सुधार समिति’ (Improvements Committee) के उन प्रस्तावों का है, जिन्हें पारित कराने की कोशिश शिंदे गुट कर रहा था। खबरों के मुताबिक, आदित्य ठाकरे को जैसे ही इसकी भनक लगी, उन्होंने तत्काल अपने करीबी और शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता मिलिंद नार्वेकर को सक्रिय किया। आधी रात में मातोश्री से सीएम फडणवीस को फोन करके नार्वेकर ने पूरे मामले की जानकारी दी।
बताया जा रहा है कि इस कॉल में आदित्य ठाकरे की ओर से सीएम को बताया गया कि कैसे शिंदे गुट BMC की संपत्तियों और मुंबई की प्रीमियम जमीनों पर कब्जा जमाने की साजिश रच रहा है। इस ‘मिडनाइट इनपुट’ के बाद सीएम फडणवीस के तेवर बदल गए और उन्होंने तुरंत अपने ही दल के पार्षदों को इन प्रस्तावों पर रोक लगाने का निर्देश दे दिया।
क्या था शिंदे गुट का ‘प्लान’?
देश की सबसे अमीर नगर निगम, BMC की सुधार समिति किसी भी समिति से ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह समिति बड़े निर्माण कार्यों, सड़क सुधार, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निगम की जमीनों के इस्तेमाल पर अंतिम फैसला लेती है। शिंदे गुट की संध्या विपुल दोशी इस समिति की अध्यक्ष हैं, और उनके नेतृत्व में समिति मुंबई को लेकर चार बड़े और विवादित फैसले लेने जा रही थी।
आदित्य ठाकरे ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इन चारों प्रस्तावों का खुलासा किया था। इनमें सबसे प्रमुख था सेवेन हिल्स अस्पताल का निजीकरण। आदित्य का आरोप था कि सरकारी अस्पताल को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मोड के जरिए निजी हाथों में सौंपने की साजिश थी। इसके अलावा, पांच उपनगरीय ब्लड बैंकों का निजीकरण, बांद्रा रिक्लेमेशन प्रदर्शनी केंद्र और मालाबार हिल ग्रीन जोन में बदलाव जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल थे।
आदित्य ठाकरे ने साफ शब्दों में कहा था, “शिंदे कैंप इन बदलावों (डील) के जरिए मुंबई की प्रीमियम जमीनों पर कब्जा जमाना चाहता है। यह महज एक बदलाव नहीं, बल्कि बंदरबांट है।”
भाजपा का ‘म्यूट’ सपोर्ट और शिंदे का हैरानी
यह पूरा मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि बीजेपी और शिंदे गुट महाराष्ट्र में सरकार चला रहे हैं (महायुति)। आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि BMC में दोनों दल साथ मिलकर काम करेंगे, लेकिन यहां तस्वीर उलटी दिखी।
जब मिलिंद नार्वेकर ने सीएम फडणवीस को पूरी जानकारी दी, तो फडणवीस ने तत्काल बीजेपी पार्षदों से इन प्रस्तावों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। सीएम के सख्त रुख के बाद बीजेपी पार्षदों ने बैठक में ही इन प्रस्तावों को टालने का फैसला किया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि शिंदे गुट के एक पार्षद ने भी ब्लड बैंक के प्रस्ताव पर पुनर्विचार का समर्थन किया और खुलकर आदित्य ठाकरे के तर्कों के साथ सहमति जताई।
राजनीतिक समीकरणों में ‘नई उठापटक’
इस पूरे घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या शिंदे गुट के साथ भाजपा का रिश्ता वास्तव में मजबूत है या यह सिर्फ तालमेल है? क्या मुंबई की जमीन और संसाधनों को लेकर भाजपा शिंदे गुट पर भरोसा नहीं कर रही है?
विश्लेषकों का मानना है कि आदित्य ठाकरे ने इस मुद्दे को लेकर बहुत ही शातिर तरीके से शिंदे गुट को घेरा है। उन्होंने सीधे भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार और BMC प्रशासन की आंखों में शिंदे गुट के खिलाफ ‘भ्रष्टाचार’ का बीज बो दिया है। वहीं, सीएम फडणवीस ने भी अपनी साफ्छट छवि को बनाए रखने के लिए शिंदे गुट के इस ‘विवादित प्लान’ से किनारा कर लिया।
मातोश्री की वापसी?
इस ‘मिडनाइट ड्रामा’ ने साबित कर दिया है कि मुंबई की राजनीति में अभी उबाल बाकी है। आदित्य ठाकरे ने साबित किया कि वह अपने पिता और पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे की विरासत को BMC में बरकरार रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। एक ओर जहां शिंदे गुट अपनी ताकत दिखाने में लगा था, वहीं आदित्य ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस के बीच इस ‘अनदेखी समझौते’ ने शिंदे गुट को बुरी तरह से उलझन में डाल दिया है। अब देखना यह है कि इस नई राजनीतिक जुगलबंदी का असर आगामी विधानसभा चुनावों और BMC चुनावों पर कैसे पड़ता है।
























