Noida Protest: उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। नोएडा में फैक्ट्री मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारियां अब राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों और बाल अधिकारों के मुद्दे बन गई हैं। पुलिस पर सैकड़ों लोगों के साथ-साथ नाबालिग बच्चों को भी गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखने का गंभीर आरोप लगाया गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार यह मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के वकील एडवोकेट सुभाष चंद्रन के.आर. ने इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) में एक विस्तृत याचिका दायर की है।
जाने क्या है याचिका में आरोप?
बता दें कि शिकायत में स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया गया है कि नोएडा पुलिस ने विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए बिना किसी कानूनी आधार के सैकड़ों युवकों और नाबालिग बच्चों को अपनी कस्टडी में ले लिया। याचिकाकर्ता का कहना है कि नाबालिगों को हिरासत में रखना कानून का सीधा उल्लंघन है और यह उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
क्या हैं मांगें?
एडवोकेट सुभाष चंद्रन ने आयोगों से तीन मुख्य मांगें उठाई हैं:
- तुरंत रिहाई: हिरासत में लिए गए सभी लोगों और नाबालिग बच्चों को तत्काल रिहा किया जाए।
- निष्पक्ष जांच: मानवाधिकारों के उल्लंघन की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पुलिस ने बिना वारंट के नाबालिगों को किस आधार पर हिरासत में लिया।
- मुआवजा और जवाबदेही: कथित तौर पर गलत तरीके से निशाना बनाए गए लोगों को पर्याप्त मुआवजा दिया जाए और दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
पुलिस पर उठे सवाल
बता दें कि इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। याचिका में चिंता जताई गई है कि अगर ऐसे तरीके अनियंत्रित रूप से इस्तेमाल किए गए, तो यह लोकतंत्र में विरोध करने के अधिकार को कुचलने जैसा है। आयोगों से अपील की गई है कि वे तुरंत और असरदार कदम उठाएं ताकि भविष्य में इस तरह के मानवाधिकारों के हनन को रोका जा सके।
























